श्री पल्लीवाल जैन डिजिटल पत्रिका

अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

(पल्लीवाल, जैसवाल, सैलवाल सम्बंधित जैन समाज)

त्याग दान

त्याग से उन्नति

एक दिन की बात है कि अकबर और बीरबल के बीच चर्चा चल रही थी। अकबर ने बीरबल से कहा, कि बीरबल तुम मेरे एक प्रश्न का उत्तर दो । क्योंकि उसके विषय में कुछ भी समझ में नहीं आ रहा और शायद किसी से समझा भी नहीं जा सकता था। बीरबल ने कहा हुजूर क्या प्रश्न है? अकबर ने कहा- लोगों की हथेली में बाल क्यों नहीं होते ? बीरबल ने कहा

हुजूर उत्तर बहुत सुगम है लेकिन आप पहले इस प्रश्न को राजसभा में उपस्थित सभी लोगों से पूछ लें, नहीं तो लोग कहेंगे कि अगर बीरबल से ही पूछना था, तो फिर प्रश्न सभी के बीच क्यों पूछा। अकबर ने कहा-ठीक है, लेकिन राजसभा में उपस्थित मंत्रीगण इसका जवाब देने में असमर्थ रहे। तब बीरबल ने कहा-जहाँपनाह, कुछ लोग इतना दान करते हैं कि दान देते-देते हथेली के बाल घिस गये। तब अकबर ने कहा कि अभी उत्तर पूरा नहीं हुआ। तब बीरबल ने कहा-जहाँपनाह, कुछ लोग ऐसे होते हैं जो इतना दान लेते हैं कि दान लेते लेते हथेली के बाल घिस गये। अकबर ने कहा-जो न दान लेते है और न दान देते हैं फिर भी उनकी हथेली में बाल नहीं होते । तब बीरबल ने कहा-जहाँपनाह । तीसरे प्रकार के वे व्यक्ति होते हैं, जो देने वाले को और लेने वाले को देखते हैं और अपने दोनों हाथों को मलते रहते हैं जिससे उनकी हथेली के बाल घिस गये। इस प्रकार त्याग से ही मुक्ति मिलती है यानि उन्नति होती है।

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त्याग व्यक्ति को उठाता

एक बार की बात है एक राजा था, उसके उद्यान में एक साधु विहार करते हुये आये। वह राजा आस्थावान था, जब उसे पता चला तो वह उनके दर्शन करने के लिये अपनी सेना के साथ उद्यान में गया। राजा ने एक तोते को पाल रखा था राजा उस तोते को बहुत प्यार करता था तथा उसने उसकी सब प्रकार की व्यवस्था की थी, ताकि उसे कोई परेशानी न हो। उसके पिंजड़े में सोने-चांदी की कटोरी रखी गई थी उन कटोरियों में काजू, किसमिस से बनी खीर, अनेक प्रकार के व्यंजन तथा मीठे फल-फूल रखे गये थे पिंजडा भी सोने का बनाया गया था तथा गर्मी से बचने के लिये दो सेवक नियुक्त किये गये थे जो पंखा किया करते थे, ठंडी के दिनों में ठंडी से बचने के लिये गर्मी की व्यवस्था की गई थी, उसे सोने के लिए मखमल के बिस्तर तथा आसन था, लेकिन तोता तो सोच रहा था कि कब मौका मिले और मैं इस बंधन से मुक्त हो जाँऊ, मुक्त होने के लिये वह बेचैन था। एक बार मुनिराज, राजा की प्रार्थना करने पर नगर में उपदेश देने के लिये आये, उनके उपदेश को उस तोते ने भी सुना। उन्होंने कहा- जो प्राणी संसार से भयभीत होता है-वह हमेशा मुक्त होने का प्रयास करता है, वह संसाररूपी जेल से छूटने का प्रयत्न करता है, वह शरीर से रहित होने का प्रयास करता है। तथा त्याग से ही मुक्ति मिलती है । यह बात जब तोते ने सुनी, तो वह आतुर हो गया मुक्त होने के लिए, उसे समझ में आ गया कि यह आत्मा और शरीर दोनों अलग- अलग हैं। उसने सोचा आज मैं उपवास करूँगा और उसने खाना-पीना छोड़ दिया । जब राजा ने उसे खाने के लिए भोजन रखा, तो उसने उसकी तरफ नजर उठा के भी नहीं देखा और शांति से लेटा रहा। राजा तथा अन्य सभी ने उसको देखा, कि वह कुछ भी नहीं खा-पी रहा है आज क्या बात हो गई है ? स्वास्थ्य ठीक नहीं है क्या? दिखाने के लिए राजा ने हकीमों को बुलाया और उसे दिखाया, दवाई भी दी लेकिन उसने उस दवाई को भी नहीं खाया और वह चुपचाप लेटा रहा। सभी लोग चिंतित थे क्या करें ? उन्होंने सोचा चलो इसके लिए कुछ समय तक पिंजड़े के बाहर खुले आकाश में छोड़ दें ताकि यह, ठीक हो जाये, मन बहल जायेगा। राजा को डर था कि कहीं तोता पिंजड़े में ही न मर जाये। क्योंकि उसने सब कुछ त्याग दिया था। राजा की आज्ञा से मंत्रियों ने उसे पिंजड़े से बाहर कर दिया। तोता तो यही चाहता था कि कब पिंजड़े का दरवाजा खुले और हम स्वतंत्र हो जायें। पिंजड़े का दरवाजा खोला गया और वह पिंजड़े के बाहर हो गया और जाकर के पेड़ की डाल पर बैठ गया, जैसे कुछ भी नहीं हुआ हो। यह था त्याग करने का प्रभाव । उसने प्रवचन को उपयोग के साथ सुना था सुनने के बाद चर्या में उतार लिया था। राजा ने भी सुना था, लेकिन उसे उसका रहस्य समझ में नहीं आया था । जबकि तोते को वह रहस्य समझ में आ गया था तो वह मुक्त होने के लिए प्रयास करने लगा। तोते ने स्वाध्याय को जीवन में साकार रूप दिया । क्योंकि वह मुक्त होना चाहता था। अतः त्याग व्यक्ति को उठाता है।

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