श्री पल्लीवाल जैन डिजिटल पत्रिका

अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

(पल्लीवाल, जैसवाल, सैलवाल सम्बंधित जैन समाज)

संगठन में ही शक्ति है

हम बचपन से सुनते आए हैं—“संगठन में ही शक्ति है।”
लेकिन इस छोटी-सी पंक्ति के पीछे जीवन का बहुत बड़ा सत्य छिपा हुआ है।

एक अकेली लकड़ी को आसानी से तोड़ा जा सकता है, लेकिन जब वही लकड़ियाँ एक साथ बंध जाती हैं, तो उन्हें तोड़ना कठिन हो जाता है। यही संगठन की ताकत है—अकेले हम मजबूत हो सकते हैं, लेकिन साथ मिलकर हम शक्तिशाली बन जाते हैं।

संगठन केवल लोगों की भीड़ का नाम नहीं है। संगठन का अर्थ है—एक उद्देश्य, एक विचार और एक-दूसरे के प्रति विश्वास के साथ आगे बढ़ना। जहाँ लोग अपने छोटे-छोटे स्वार्थों को पीछे रखकर सामूहिक हित को प्राथमिकता देते हैं, वहीं सच्चे संगठन का निर्माण होता है।

आज हमारे समाज में सबसे बड़ी आवश्यकता इस बात की है कि हम एक-दूसरे की कमियाँ गिनाने के बजाय एक-दूसरे की ताकत बनें। मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन मनभेद नहीं होना चाहिए। विचार अलग हो सकते हैं, रास्ते अलग हो सकते हैं, लेकिन मंजिल यदि एक है, तो हमें साथ चलना सीखना होगा।

एक व्यक्ति किसी समस्या को देखकर परेशान हो सकता है, लेकिन संगठित समाज उसी समस्या का समाधान खोज सकता है। एक व्यक्ति की आवाज शायद अनसुनी रह जाए, लेकिन जब वही आवाज हजारों लोगों की सामूहिक आवाज बन जाती है, तो उसे नजरअंदाज करना आसान नहीं होता।

संगठन हमें केवल शक्ति नहीं देता, बल्कि सुरक्षा, सहयोग, सम्मान और आत्मविश्वास भी देता है। सुख के समय साथ खड़े होना आसान है, लेकिन किसी के कठिन समय में उसके साथ खड़ा होना ही संगठन की असली पहचान है।

हमें यह भी समझना होगा कि संगठन को कमजोर करने वाली सबसे बड़ी चीज बाहर की कोई ताकत नहीं, बल्कि आपसी अहंकार, ईर्ष्या, स्वार्थ और अविश्वास है। यदि हम एक-दूसरे को नीचे खींचने के बजाय आगे बढ़ाने लगें, तो हमारी सामूहिक शक्ति कई गुना बढ़ सकती है।

इसीलिए जीवन में चाहे परिवार हो, समाज हो, संस्था हो या राष्ट्र—हर जगह सफलता का आधार एक ही है—
“जहाँ एकता है, वहाँ शक्ति है;
जहाँ संगठन है, वहाँ सफलता निश्चित है।”

महेंद्र कुमार जैन (लारा)
अलवर

Leave a Reply