विश्व का प्रत्येक प्राणी सुख चाहता है परन्तु सुख की सच्ची परिभाषा नहीं समझ पाता, सुख को जाने बिना सुख की चाहत अधूरी है। हमारी सोच, विचार, चिंतन संकीर्ण है इसलिये भगवान से वह नहीं मांग पाते जो मांगना चाहिए। क्योंकि सुखाभास को ही आप ने सुख मान रखा है। भूखे से सुख की परिभाषा पूछेंगे तो कहेगा – पेट भर भोजन मिले तो सुखी हो जाऊँ, प्यासा कहता है थोड़ा ठंडा, मीठा जल मिल जाए तो सुखी हो जाऊँ, अंधे को दो आँखे, बहरे को सुनने की शक्ति, पंगु को पैर मिल जाए तो वही उसके लिये सबसे बड़ा सुख है। निर्धन को धन मिल जाए तो अपने को सुखी मानता है। जिसके पास छत भी न हो और मकान मिल जाए खाने के लाले पड़े हो और दुकान मिल जाये, विद्यार्थी 1st class पास हो जाये युवक को रोजगार मिले, बस सुखी हो जाता है। कुछ भक्त तो भगवान को वैद्य बना लेते है और पहुँच जाते है भगवान के पास प्रार्थना प्रारंभ होती है हे भगवन्! मेरा सिर दर्द हो रहा है जल्दी ठीक हो जाए। भगवान प्रार्थना सुन लेते है सिर दर्द ठीक हुआ लेकिन पेट दर्द चालू, कहने का तात्पर्य है दुःख से पीछा छुड़ाना कठिन है। क्योंकि एक के बाद एक विपत्ति आती ही रहती है। इष्टोपदेश में आचार्य पूज्यपाद महाराज कहते है –
विपद् भव पदावर्ते पदिके वाति बाह्यते।
यावत्तावद् भवंत्यन्याः प्रचुरा विपदः पुरः ।।
एक विपत्ति दूर होने नहीं पाती और जीवन में दूसरी विपत्ति आ जाती है। विपत्तियों की रहट चलती ही रहती है। एक गई नहीं कि दूसरी आ गई।
इसलिये आचार्य कहते हैं, हे भव्य ! तुम किस-किस दुःख से बचोगे, किस-किस विपदा से बचोगे। हम दुःख के उन्मूलन को ही सुख का मार्ग मानते है। परन्तु दुःख की सच्ची परिभाषा हमने नहीं समझी, जिन शारीरिक व मानसिक कष्टों को हम दुःख मानते है। वह वास्तविक दुःख नहीं। अपितु आत्मा का विभाव रुप परिणमन होना ही वास्तविक दुःख है तथा स्वभाव रुप दशा को पा लेना ही सच्चा सुख है। हम बाह्य लौकिक उपलब्धियों को सुख मान लेते हैं। परन्तु यह वास्तव में सुख नहीं अपितु सुखाभास है। गर्मी के मौसम में कूलर मिल जाये, A.C. मिल जाए, घूमने कार मिल जाऐ तो आप अपने को सुखी मानते हैं। यह इन्द्रिय विषयों की प्राप्ति से होने वाला संवेदन वास्तविक सुख नहीं अपितु सुखाभास है और इन्द्रियों से प्राप्त सुख क्षणिक ही होता है। शाश्वत नहीं होता है क्योंकि इन्द्रियों के पराधीन है। जबकि आत्मा से उत्पन्न वास्तविक सुख पराधीन नहीं है। वह तो आत्मा से ही उत्पन्न होता है लेकिन आप शरीर के सुख को ही सुख मानने की भूल कर देते हैं।
एक बार की बात है- एक कंजूस सेठ जी थे बड़े भाग से एक दिन उनका निमंत्रण आया, निमंत्रण पाकर खुश हो गये सोचा मुझे रसगुल्ले बड़े पसन्द है अतः आज तो निमंत्रण में मुझे रसगुल्ले ही रसगुल्ले खाने है रोटियाँ तो रोज खाता हूँ। बंधुओं! सेठ जी ने रसगुल्लों में सुख की कल्पना कर रखी थी। अतः चल पड़े निमंत्रण में सुख पाने के लिये। बड़े खुश मन से चले जा रहे थे जैसे ही पहुँचे देखा वफे system है। तरह-तरह के Item टेबिल पर सजे थे परन्तु सेठ जी की निगाहे तो रसगुल्लों को खोज रही थी, जैसे ही रसगुल्ले पर दृष्टि गई सेठ जी के कदमों में गति आ गई और पहुँचे सीधे रसगुल्ले के कटोरे के पास। पहले सेठ जी ने नजरे यहाँ-वहाँ घुमायी कोई देख तो नहीं रहा सब लोग भोजन कर रहे थे। बस सेठ जी ने रसगुल्ले पर धावा बोल दिया। क्योंकि वफे system में तो जितना चाहो उतना खाओ। दो, चार, दस खा लिये परन्तु तृप्ति नहीं हुई तो सेठ जी खाते ही गये और पूरा बड़ा कटोरा सेठ जी ने देखते ही देखते खाली कर दिया सेठ जी बड़े प्रसन्न हो रहे थे, पूरे हफ्ते भर का काम करके आया हूँ। बस 2 घंटे ही सेठ जी शान्ति से बैठ पाये होगे कि बस पेट दर्द चालू जितना रसगुल्ले खाने में सुख मिला उससे चौगुना दुःख हो रहा है। सेठ जी को पेट दर्द के साथ-साथ loose motion प्रारम्भ हो गये और जाते-जाते तो सेठ जी की कमर ही टेडी हो गई। पूछा गया- क्या बात है तो वे बोले रसगुल्ले कभी न खाना।
उनकी सुख की परिभाषा बदल गई जो रसगुल्ले सुख दे रहे थे वे दुःख के हेतु बन गये। इससे सिद्ध हो जाता है कि जिन पौद्गलिक पदार्थों में हम सुख खोजते है वे सुख नहीं अपितु दुख रूप ही है इन पौद्गलिक पदार्थों से परे स्वरुप की ओर जाने से सुख मिलता है और वह सुख उन महामुनीश्वरों को मिलता है जो आत्म ध्यान में लीन हो जाते है उनके असीम सुख के बारे में पण्डित दौलत राम जी कहते हैं –
यों चिन्त्य निज में थिर भये तिन अकथ जो आनंद लहयो।
सो इन्द्र नाग नरेन्द्र वा अहमिन्द्र के नाहीं कह्यों ।।
जो आत्म ध्यान में तल्लीन हो जाते है अध्यात्म की गहराइयों में उतर जाते है उन मुनीराजों को जो सुख होता है वह इन्द्र, नागेन्द्र, चक्रवर्ती व अहमिन्द्रों को भी नहीं हो पाता, वह अनुपम व शाश्वत सुख होता है। वही वास्तविक सुख है।
इसीलिये पहले सच्चे सुख की परिभाषा को समझ लीजिए तभी आपके कदम उस सच्चे सुख को पाने आगे बढ़ सकते है। आप उस सच्चे सुख को पाने का प्रयत्न करें आपका यही सम्यक् पुरुषार्थ होगा।