ओम अर्हम नम:
महावीर का पुनर्जन्म
नैतिकता का आधार- नानात्व का बोध
जिज्ञासा और समाधान— ये दो तत्व हैं । इनके द्वारा चिंतन और दर्शन का विकास हुआ है । शिष्य और गुरु– यह एक युगल माना जाता है । इसका दूसरा युगल भी बन सकता है जिज्ञासा शिष्य है और समाधान गुरु है । दर्शन के विकास में आश्चर्य कुतूहल बहुत बड़ा हेतु बना है ।
एक शिष्य के मन में जिज्ञासा उभरी वह गुरु के पास पहुंचा । वन्दना कर बोला गुरुदेव ! मैं मनुष्य हूं और इस दुनिया में केवल मैं ही नहीं हूं । आकाश में देखता हूं बहुत सारे पक्षी उड़ रहे हैं । भूमि पर देखता हूं तो बहुत सारे अलग-अलग जीव जन्तु और विभिन्न तरह के पेड़ पौधे खड़े हैं आपने मुझे बताया था कि सब जीव समान हैं, आत्मा आत्मा में को॓ई अंतर नहीं है फिर भी नानात्व कैसे बना ? यह भेद कैसे आया ? कोई मनुष्य है, को॓ई पशु पक्षी है और कोई वनस्पति है । इस प्रकृति के प्रांगण में अनेकता है कहीं एकरुपता नहीं है । यह क्यों ?
यूनान के कुछ दार्शनिक आत्मा- आत्मा में भेद मानते थे । उनकी दृष्टि में सब आत्माएं समान नही हैं । पशु पक्षी की आत्मा अलग है, वनस्पति की आत्मा अलग है और मनुष्य की आत्मा अलग है । वे आत्मा के तीन भेद मानते हैं
किन्तु जैन दर्शन में कहा गया – सब जीव समान हैं । उनमें कोई भेद नहीं फिर यह नानात्व कैसे आया ? इसका हेतु क्या है ?
आचार्य ने इस प्रश्न का समाधान दिया – वत्स! सब जीव समान हैं। जीवो में को॓ई अंतर नहीं है किन्तु समान होने पर भी नानात्व का एक कारण है–
अस्त्यात्मा शाश्वतस्तेन गतिचक्र प्रवर्तते
अस्ति पुण्यं च पापं च नानात्वं च गतेस्तते
आत्मा शाश्वत है । व्यक्ति के मरने के बाद भी आत्मा की मृत्यु नहीं होती । गति का एक चक्र चलता रहता है । मनुष्य विभिन्न गतियों में जाता है इसका हेतु है पाप और पुण्य।
दुनिया में नानात्व है अनेकरुपता है । चार गतियां बताई गई हैं – नरक, तिर्यंच, मनुष्य और देव । मनुष्य और तिर्यंच ये दो गतियां प्रत्यक्ष हैं । नरक और देव ये दो गतियां परोक्ष हैं । इनमें दो इन्द्रिय ज्ञान का विषय हैं और दो अतीन्द्रिय ज्ञान का । परोक्ष को जानना आसान नहीं है । प्रत्यक्ष मनुष्य के सामने है । मनुष्य और तिर्यंच में बहुत बड़ा अंतर है । मनुष्य ने बहुत विकास कर लिया किन्तु पशु आज भी वैसा का वैसा है जैसे हजारो साल पहले था ।
आत्मा की अमरता है, गति का चक्र है और अपना अपना पुण्य और पाप है, इसलिए यह गति का भेद हो रहा है । इस गतिभेद की पृष्ठभूमि में अपना अपना किया हुआ शुभ अशुभ कर्म, पुण्य और पाप कारण बन रहा है । यही धार्मिक और नैतिक जीवन जीने का बहुत बड़ा आचार शास्त्रीय आधार बनता है ।
“श्रमण महावीर (आचार्य महाप्रज्ञ) से चुनी हुई
🙏🏽🙏🏽विनीत 🙏🏽🙏🏽
हरीश मधु जैन बक्शी (हरसाना)