जीवन में भूलें हर मनुष्य से होती हैं, किन्तु जो भूल को भूल समझता है वह उसमें सुधार कर सकता है। जो भूल को भूल नहीं मानता है वह कभी भूल को दूर करने में सक्षम नहीं हो पाता है। कुछ भूलें असावधानी के कारण होती हैं, कुछ भूलें अज्ञान के कारण होती हैं तथा कुछ भूलें भूलों को भूल नहीं मानने पर होती हैं। कुछ भूलों का परिणाम भयंकर होता है तथा कुछ भूलें मामूली परिणाम देती हैं। भूलों का होना मानव का स्वभाव नहीं, अपितु दोष है। इन भूलों या दोषों का परिणाम दुःख के रूप में भोगना ही पड़ता है। हमारे जीवन में हम अनेक भूलें करते हैं, उन सभी भूलों की चर्चा करना सम्भव नहीं है। यहाँ पर कुछ भूलों की चर्चा की जा रही है । प्रयत्न करने पर इनमें सुधार सम्भव है।
हमारी सबसे बड़ी भूल यह होती है कि हम श्रेय की अपेक्षा प्रेय के प्रति आकर्षित होते हैं। हमारे लिए क्या कल्याणकारी या श्रेयस्कारी है, इसको हम जान नहीं पाते हैं तथा प्रिय लगने वाली, किन्तु अन्त में दुःखद परिणाम देने वाली वस्तुओं, परिस्थितियों या व्यक्तियों के प्रति आकर्षित होते हैं। यह व्यक्ति मुझे प्रिय है, यह मेरी फेवरिट डिश है, यह रंग मुझे फेवरिट है, अमुक गाना पसन्द है, अमुक फिल्म पसन्द है, अमुक रेस्टोरेण्ट का लजीज खाना मुझे बहुत प्रिय है। इस प्रकार पसन्द की वस्तुओं के पीछे आकर्षित होकर उनकी प्राप्ति के लिए तत्पर रहते हैं तथा नापसन्द व्यक्ति, डिश, रंग, गाने आदि से घृणा एवं द्वेष करते हैं। यह मनुष्य की भीतरी वृत्ति है जो उसे ऐसा अनुभव कराती है। कभी रूप-रंग में पसन्द की गई लड़की के साथ दाम्पत्य जीवन का कुछ समय बिताने के पश्चात् उससे घृणा होने लगती है। इसका तात्पर्य है कि हमारे चयन या पसन्द में हम हमारा हित नहीं देखते, मात्र बाह्य रूप, गन्ध, स्वाद आदि के पीछे दीवाने होते हैं। खाद्य पदार्थों में हम उन पदार्थों को पसन्द करने लगते हैं जो स्वास्थ्य को हानि पहुँचाते हैं तथा रोगी बनाते हैं। स्वाद के आधीन होकर यह नहीं सोचते कि यह स्वास्थ्य के लिए कितना हानिकारक है। हम इसका निर्णय विवेक से न कर इन्द्रिय-जन्य सुख के आधार पर करते हैं और धोखा खाते हैं। कड़वा लगने वाला करेला भी, कषैला लगने वाला आँवला भी स्वास्थ्य के लिए अच्छा होता है और मीठी लगने वाली मिठाई भी स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होती है। अतः हर इन्द्रिय-विषय का सेवन करने से पूर्व किसी भी वस्तु के प्रति अत्यधिक लालायित होने, उसका अधिक सेवन करने की अपेक्षा उसकी हितकारिता या श्रेयस्कारिता पर विचार करना चाहिए ।
यदि एक शराबी यह जानता है कि शराब उसके लिए हानिकारक है, फिर भी वह उसको छोड़ नहीं पाता, तो यह उसके संकल्प शक्ति की कमी है। अगर वह शराब को अपने स्वास्थ्य के लिए अच्छा समझकर अधिकाधिक पीता है तो यह उसका अज्ञान है।
लोभ के कारण गलत कार्यों में फँसना भी श्रेय की अपेक्षा प्रेय को अधिक महत्त्व देना है, जिसका परिणाम अत्यन्त दु:खद होता है। हिंसा, झूठ, चोरी, व्यभिचार, परिग्रह आदि सारे पाप मनुष्य को प्रिय तो लग सकते हैं, किन्तु वे उसके लिए श्रेयस्कारी नहीं हैं। उनका परिणाम अन्ततः दुःखरूप ही होता है।
दूसरी भूल यह है कि हम सुख की खोज बाह्य पदार्थों, परिस्थितियों एवं व्यक्तियों में कर रहे हैं तथा उन्हें अनुकूल बनाने में लगे रहते हैं, जबकि कमी स्वयं के सोच में होती है, जिस पर हमारी दृष्टि नहीं जाती। अपना सोच बदलने पर प्रतिकूल परिस्थिति भी अपने विकास में सहायक बन जाती है। इसी प्रकार प्रतिकूल व्यक्ति कदाचित् हमारे अहंकार का विनाश करने में तथा सकारात्मक सोच को विकसित करने में सहायक बन सकते हैं। सुख बाहर नहीं भीतर में अनुभव होता है। किसी वस्तु में न सुख होता है और न दुःख, सुख-दुःख हमारी मान्यता में हैं।
तीसरी भूल हमारी यह है कि हम दूसरों के दोष देखकर प्रसन्न होते हैं, उनकी चर्चा करते हैं, उनकी निन्दा करते हैं, उनसे द्वेष करते हैं, किन्तु उनका दोष दूर करना हमारे हाथ में नहीं होता है। इसके विपरीत हम हमारे दोष नहीं देखते हैं, दोष दिख जाएँ तो उन्हें दोष नहीं मानते हैं, इससे दोषों का निवारण सम्भव नहीं होता, अपितु दूसरों के दोष देखने से अपने में दोषों की वृद्धि होती है। मनोविज्ञान का यह नियम है कि दूसरों के गुण देखने से अपने में गुणों की वृद्धि होती है तथा दूसरों के दोष देखने से अपने में दोषों की वृद्धि होती है। हम हमारे गुणों को देखते हैं तथा उनकी प्रशंसा सुनना चाहते हैं । वही हमें अच्छी लगती है । किन्तु कोई हमारी निन्दा करे तो वह हमें तनिक भी नहीं रुचती । जो हमारी निन्दा करता है उसके प्रति हमारे चित्त में द्वेष उत्पन्न होता है, फिर भला हम दूसरों की निन्दा करके यह कैसे आशा रख सकते हैं कि वह निन्दित व्यक्ति हमारे से द्वेष नहीं करेगा एवं बड़ा प्रसन्न होगा । यदि सही सोच विकसित हो जाए तो हम दूसरों से हमारी निन्दा या बुराई सुनकर उसमें से अपने लिए कुछ ग्राह्य शिक्षा ढूँढ़कर उसका उपकार मान सकते हैं। हो सकता है उसके द्वारा कृत निन्दा हमारे अहंकार के विनाश का निमित्त बन जाय या अपने दोषों के निराकरण का हेतु बन जाए।
दूसरों के दोष हमें दिख जाना अलग बात है, किन्तु उनके दोषों को देखने में रुचि लेना भयंकर दोष है। हाँ, उनके दोषों को दूर करने में हम निमित्त बन सकें, स्नेहपूर्वक दोष दूर करने की प्रेरणा कर सकें तो उपयोगी हो सकता है।
चौथी भूल यह है कि संसार में जिन अचेतन और चेतन पदार्थों का संयोग हमें प्राप्त हुआ है, यदि वह अनुकूल है तो उस संयोग को स्थायी बनाने एवं समझने का दोष करते रहते हैं। इसके विपरीत अनिष्ट वस्तुओं एवं व्यक्तियों के संयोग को शीघ्र दूर करने के लिए प्रयत्नशील रहते हैं । हम यह नहीं सोचते कि इष्ट एवं अनिष्ट दोनों प्रकार के संयोग नश्वर हैं। किन्तु इष्ट वस्तुओं एवं व्यक्तियों के साथ कभी-कभी इतना घनिष्ठ सम्बन्ध हो जाता है कि इनका वियोग असह्य लगता है। हम इस सत्य की उपेक्षा करते हैं कि जिसका संयोग हुआ है उसका वियोग निश्चित है । यदि इस सत्य का भान हो जाए कि संयोग अनित्य होता है, शाश्वत नहीं होता, वह सदा नहीं रहता तथा जो मिला वह नहीं रहेगा तो हम इष्ट के वियोग में समता एवं प्रसन्नता का अनुभव कर सकते हैं। प्रतिकूल एवं अनुकूल दोनों परिस्थितियाँ हमारे लिए हितकारी हो सकती हैं। प्राप्त वस्तु, व्यक्ति एवं परिस्थिति को अपने लिए हितकारी मानकर हमें उसका सदुपयोग कर लेना चाहिए। जिन व्यक्तियों का संयोग मिला है उनको उचित सम्मान एवं सौहार्द प्रदान कर उनके साथ प्रेमभाव से रहना चाहिए।
पाँचवीं भूल यह है कि हम देखादेखी जीते हैं, अपने विवेक से निर्णय करके नहीं जीते हैं। देखादेखी जीने में भटकाव की सम्भावना अधिक रहती है। दूसरे के पास बड़ा बंगला है, मेरे पास भी होना चाहिए, दूसरे के पास तीन महँगी कारें हैं, मेरे पास भी होनी चाहिए, दूसरे के पास महँगा मोबाइल है, मेरे पास भी होना चाहिए, इस प्रकार की देखादेखी की जीवनशैली दुःख का कारण बनती है । देखादेखी से व्यसन एवं फैशन हमें घेर लेते हैं। इसके विपरीत अपनी आवश्यकता की पूर्ति एवं प्रसन्नता के सूत्रों को सीख कर निजी जीवनशैली को प्रशस्त किया जा सकता है । हमारे जीवन का मॉडल या आदर्श बनाने में हमारे से चूक हो जाती है। संसार में ऐसे भी लोग हैं जो सादा जीवन उच्च विचार की जीवनशैली से जीकर सुखी एवं प्रसन्न हैं। उनको भी आदर्श बनाया जा सकता है। कभी बाहर से सुख-सुविधा सम्पन्न दिखाई देने पर भी अधिकांश लोगों का जीवन अनेक दुःखों से भरा होता है। अतः उनको आदर्श बनाने पर हम भी दुःखों के सागर में ही डूबने का मार्ग पकड़कर बड़ी भूल करते हैं ।
छट्ठी भूल यह है कि हम बुरा करके भी अच्छा फल चाहते हैं। उसके लिए भगवान से एवं देवी-देवताओं से याचना करते हैं। कभी गुरुओं की शरण में भी जाते हैं । कर्म के इस सिद्धान्त को भूल जाते हैं कि जैसा अच्छा या बुरा कर्म किया है, उसके अनुसार ही फल प्राप्त होगा । नीम का बीज बोकर नीम ही प्राप्त किया जा सकता है, आम नहीं। यदि आम का बीज बोया है तो आम प्राप्त होगा। पूर्व पुण्य कर्म के कारण कदाचित् पाप करते हुए भी उसका फल अनुभव न हो, किन्तु पूर्व पुण्य की हानि होने पर पाप का फल भी भोगना ही पड़ता है । पाप का फल कभी तत्काल भी मिलता है तो कभीविलम्ब से भी प्राप्त होता है। इसलिए सदैव बुरे कार्य करने से बचकर ही अपने सदभाग्य का निर्माण किया जा सकता है। गुरुओं से लब्ध ज्ञान एवं स्वाध्याय से प्राप्त ज्ञान हमें दु:खद परिस्थितियों में सन्मार्ग की रोशनी देता है।
सातवीं भूल यह है कि हम कामनाओं की उत्पत्ति एवं पूर्ति में सुख मानते हैं, किन्तु जब तक यह धारणा रहेगी तब तक दु:ख का विनाश नहीं हो सकता। क्योंकि एक कामना पूरी होने पर नई कामना जन्म ले लेती है। मनोवैज्ञानिकों की यह धारणा है कि जीवन को संचालित करने के लिए इच्छाओं का होना आवश्यक है । अर्थशास्त्रियो की भी यह मान्यता है कि उपभोक्ताओं में निरन्तर नई-नई इच्छाओं को जन्म देकर ही आर्थिक विकास सम्भव है । किन्तु यह सुख का मार्ग नहीं है । अनावश्यक इच्छाओं एवं कामनाओं पर नियंत्रण करके ही सुखी हुआ जा सकता है। जीवन के संचालन के लिए जिन इच्छाओं या कामनाओं का होना आवश्यक हो, उनके अतिरिक्त इच्छाओं का त्याग कर लेना सुख का मार्ग है। इच्छाएँ तो आकाश के समान अनन्त होती हैं। वे बढ़ती चली जाती हैं। जिसको जितना अधिक प्राप्त है वह उससे भी अधिक इच्छाओं को लेकर चल रहा है। अतः उसका दुःखी होना स्वाभाविक है। हमारे जीवन को सन्मार्ग पर ले जाने वाली सद्इच्छाओं के अतिरिक्त इच्छाओं का हमें त्याग कर देना चाहिए । इसी में सुख एवं शान्ति निहित है।
आठवीं भूल यह है कि हम जीव की अपेक्षा निर्जीव पदार्थों को अधिक महत्त्व देते हैं। इससे अपनी चेतन आत्मा एवं अन्य जीवों का तिरस्कार होता है तथा बुद्धि, मन एवं इन्द्रियाँ अजीव पदार्थों के संग्रह एवं भोगोपभोग में संलग्न हो जाती हैं। आत्मा पर ध्यान दिए बिना अपना पूर्ण कल्याण सम्भव नहीं है। अन्य जीव भी हमारे सदृश चेतनाशील हैं। अत: उन्हें अपने समान समझकर उनकी हिंसा करने एवं उन्हें पीड़ा देने से बचना चाहिए । अचेतन पौद्गलिक पदार्थों को महत्त्व देने पर हम शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य से भी वंचित होते हैं। शरीर को भोगों का साधन समझकर उसे साधना का साधन न समझने की भूल करते हैं। शरीर द्वारा अनावश्यक एवं अहितकारी पदार्थों का सेवन कर उसे रोगग्रस्त बनाते हैं। इसी प्रकार मन भी साधना का साधन होता है, किन्तु उसे भी अहितकारी चिन्तन में संलग्न रखते हैं तो उसका परिणाम भी दुःखरूप में भोगना पड़ता है। जीवन में हम अपनी प्राथमिकताओं में सन्तुलन का निर्धारण नहीं कर पाते हैं। जीवन के लिए धन भी महत्त्वपूर्ण एवं आवश्यक है, क्योंकि उससे जीवन-यात्रा सरल होती है, किन्तु दिन-रात उसी के लिए लगे रहना शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करता है। लोग यह सोचते हैं कि धन होगा तो हम हर समस्या का समाधान कर लेंगे, किन्तु शरीर जब असाध्य रोगों से ग्रस्त हो जाता है तो धन भी उसे नहीं बचा पाता है। धन-संग्रह के भाव से मनुष्य अधिकाधिक तनाव में जीता है जिसका परिणाम मानसिक स्वास्थ्य का गड़बड़ होना है। तब स्वभाव में चिड़चिड़ापन, क्रोध, अहंकार, अमानवीय व्यवहार आदि दोषों का आक्रमण हो जाता है । एक दोष के साथ अनेक दोष उत्पन्न होने लगते हैं।
धन से अधिक महत्त्व धर्म का है। वह आत्मिक एवं मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा करता है तथा शरीर को भी स्वस्थ रखने का मार्ग प्रशस्त करता है। अतः धर्म को जीवन में समुचित स्थान देकर अपनी भूलों को सुधारा जा सकता है।
डॉ. धर्मचन्द जैन