कांपिल्य नगर में ‘रत्नप्रभ’ राजा-सुन्दर और गुणवती ‘विद्युत प्रभा रानी तथा जिनधर्म पर गाढ़ श्रद्धा रखने वाला योग्य आचार-विचार से युक्त ‘जिनदत्त नामक सेठ रहता था।
इसी नगर में करोड़ों मुद्राओं का धनी एक ‘पिण्याकगन्ध’ नाम का सेठ भी रहता था किन्तु वह बड़ा मूर्ख, लोभी और कृपण था। न स्वयं खाता, पहिनता न दूसरों को खिलाता किन्तु वह अपने भोजन में तेल निकली खली खाता था। उसकी सुन्दर स्त्री और विष्णुदत्त नामक लड़का था। एक दिन राजा के तालाब को खोदते वक्त ‘उडु’ नाम के एक मजदूर को सोने की सलाइयों से भरी लोहे की सन्दूक मिल गई। ‘उड्डु’ ने एक सलाई लाकर जिनदत्त सेठ को लोहे के भाव बेची। उसको साफ करने पर पता चला की ये सोने की है अतः चोरी की समझ जिनदत्त सेठ ने उसे घर में न रखकर जिन प्रतिमा बनवा ली। सच है धर्मात्मा पुरुष पाप से डरते हैं। चोरी का माल समझ दुबारा उसने नहीं खरीदी। पिण्याक गंध सेठ जानबूझ कर खरीदता गया। बेचारे ‘उडु’ को उनकी कीमत मालूम नहीं थी। पिण्याक गंध पुत्र को सलाई खरीदने के लिए कहकर बहिन के कहने पर भानजे की शादी में दूसरे गांव चला गया। दूसरे दिन ‘उड्ड अंतिम सलाई बेचने आया तो उसके पुत्र ने नहीं खरीदी। बल्कि किसी व्यक्ति ने उसे देख लिया और सिपाही को बता दिया जिससे सिपाही ने उसे छुड़ा लिया और उससे अन्य सलाइयों के बारे में पूछा। तब उडू ने सारी बात सिपाही को बता दी ‘जिनदत्त’ ने अज्ञानता से एक सलाई खरीदी है और प्रतिमा बनवाकर मंदिर में विराजमान कर दी यह जानकर राजा ने उसका वस्त्राभूषण से सम्मान किया। किन्तु ‘पिण्याकगंध’ के घर पर नहीं मिलने से राजा ने घर के लोगों को कैद खाने में डाल दिया। विवाह के बाद घर आये पिण्याकगंध ने सब हाल जानकर पैरों को दोषी ठहराते हुये अपने पैर तोड़ लिये इस प्रकार संक्लेश परिणामों से मरकर नरक में चला गया। इस कथा से यह शिक्षा मिलती है कि हमें अनीति का कारण पाप को बढ़ाने वाले लोभका त्याग करना चाहिए ।