श्री पल्लीवाल जैन डिजिटल पत्रिका

अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

(पल्लीवाल, जैसवाल, सैलवाल सम्बंधित जैन समाज)

श्रद्धा बनाती है Zero को Hero

जानना अलग बात है, मानना अलग बात है। जानकारी तो होती है परंतु मान्यता मन तक नहीं पहुँचती। ज्ञान तब तक सही नहीं जब तक हृदय तक न पहुँचे, ज्ञान हृदय तक पहुँचना चाहिए।

ज्ञान के अनेक प्रकार है-

(1) एक ज्ञान कान तक ही पहुँच पाता है। दूसरे कान से बाहर।

(2) एक ज्ञान कान से अंदर पहुँचता है पर मुख से निकल जाता है।

(3) एक ज्ञान कान से अंदर प्रवेश करता है और हृदय में पहुँच जाता है।

उदाहरण– तीन मूर्तियाँ मार्केट में बिकने आयी तीनों एक जैसी थी परंतु तीनों की कीमत अलग-अलग थी। पहली 250 की, दूसरी 500 की, तीसरी 750 की थी। पूछा गया Material एक ही use हुआ है फिर अंतर क्या है। मूर्तिकार ने धागा लिया कान में डाला तो दूसरे कान से निकल गया इसलिए कीमत 250 है। दूसरी मूर्ति के कान में धागा डाला तो वह मुख से निकल गया इसकी कीमत 500 रु. है, तीसरी मूर्ति के कान में धागा डाला वह बाहर नहीं निकला अंदर ही अंदर चला गया, उसकी कीमत 750 थी। बस जानने वाले, सुनने वाले भी इन तीन quality के होते हैं। लोग कहते हैं महाराज का प्रवचन बहुत अच्छा हुआ क्या हुआ पता नहीं बस आपकी कीमत 250 रु. की है। कुछ प्रवचन सुनने वाले ध्यान से सुनते हैं और घर-परिवार वालों को सुना देते हैं कि आज इस-इस विषय पर प्रवचन सुना तो कीमत आपकी 500 की हो गई। कुछ लोग प्रवचन सुनते भी है, ध्यान भी रखते हैं और चिंतन, मंथन कर जीवन में उतार लेते हैं। और उसे चारित्र रूप में ढालनें तैयार होते हैं ऐसे श्रमणों की कीमत 750 है। क्योंकि जो जाना है उसे आत्मसात कर लिया है।

आप कितना जानते हैं इसकी कीमत कम है आप कितना मानते हैं यह महत्त्वशाली है। मानना यानि श्रद्धा। यदि श्रद्धा से 1 बार भी दर्शन किया तो मोक्षमार्ग के खाते में गिनती है अन्यथा zero के zero ही रहोगे। दर्शनों की गिनती, कीमत श्रद्धा से होती है। क्योंकि बिना श्रद्धा के मोक्षमार्ग प्रारंभ नहीं होता। ज्ञान व चरित्र के पहले गिनती श्रद्धा की है। विश्वास अंक है ज्ञान, चरित्र zero है। व्रत, जाप, तप, संयम, स्वाध्याय सब zero है। यदि अंक है तो zero की बहुत बड़ी कीमत होती है। अंक बिना कितने भी zero लगाते जाओ वे Hero नहीं बन पाते। Hero तभी बनेंगे जब साथ अंक का हो। 10 जीरों में और भी कितने जीरो plus करो equal 0 ही आता है।

उसी प्रकार जीवन में सम्यग्दर्शन आते ही सम्यग्ज्ञान आ जाता है अब इसके पीछे व्रत, तप, त्याग, संयम, नियम आदि के zero लगाते जाइए कीमत बढ़ती जाएगी। और सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान के साथ सम्यक्चारित्र जुड़ जाएगा तथा रत्नत्रय प्राप्ति के अनंतर मुक्ति की साधना सहज होगी। पर बिना सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान के किये गए व्रत, तप चारित्र निष्फल है। जैसा कि कहा है-

जं अण्णाणी कम्पं खवेदि भवसहस्स कोड़ीहिं।
तं णाणी तिहि गुत्ती खवेरि उच्छास मेत्तेण ।।

अज्ञानी जितने कर्मों को सहस्त्र करोड़ वर्षों में क्षय करते हैं ज्ञानी तीन गुप्ति के द्वारा उच्छवास मात्र में उतने कर्मों का क्षय कर देता है।

पंडित दौलतरामजी, छहढ़ाला-

कोटि जन्म तप तपे ज्ञान बिन कर्म झरे जे।
ज्ञानी के छिन माँहि, त्रिगुप्ति ते सहज टरे ते।।

मूल्यांकन करने वाला अंक है। अंक के साथ लगाया zero, हीरो बन जाता है। 1 के आगे zero लगाया तो कीमत दस गुनी बढ़ गई। 10, दो zero लगाये तो 100 हो जायेगा गुणित क्रम से कीमत बढ़ती जाती है। यदि कोई bank में जाए cheque में zero लिखा हो तो कुछ नहीं निकाल पाओगे। Exam में zero मिले तो Next class में नहीं पहुँच पाता। बिना श्रद्धा के कितना कुछ भी करते जाओ zero के zero बने रहोगे यदि Hero बनना चाहते हो तो जीवन में श्रद्धा को जगा लीजिए। 750 की कीमत के न बन सको तो कम से कम 500 की कीमत के बन जाओ क्योंकि सुनना भी महत्वशाली है। आज जो सुना है वह पूरा आचरण में न भी आ पाये तो भी भव भवान्तरों में देशना लब्धि का हेतु बनता है। अतः अवश्य प्रवचन सुनना चाहिए। एक सज्जन बोले- महाराज। मैं प्रवचन में नहीं आता, मैंने कहा- क्यों? जब आचरण में न आ पाये तो सुनने से क्या लाभ? मैंने कहा- गलत। सुनना तो अवश्य चाहिए। सुनोगे तो memory में fit हो जायेगा और memory में पड़ा ज्ञान कभी न कभी अवश्य काम में आता है। महाराज लोग प्रवचनों में आ-आकर नींद निकालते हैं तो प्रवचन सुनने से क्या लाभ? मैंने कहा- तो भी लाभ है हो सकता है जब जब नींद खुले तब तक कुछ प्रभु देशना कान में पड़ेगी वह आत्महित में साधक बनेगी।

कुछ लोग कहते हैं महाराज सुनते तो है पर भूल जाते हैं सुनने से क्या लाभ? मैंने कहा- सुनना तो अवश्य चाहिए क्योंकि यदि 500 की कीमत के नहीं बन पाओ तो कम से कम 250 की कीमत के तो बन ही जाओ। सुना है भूल गये परन्तु । क्रोध शब्द याद रह जाए तो भी आत्महित में हेतु बनता है। उपदेश हमारी स्मृति में आता है और श्रद्धा का हेतु बन जाता है। हो सकता है तात्कालिक लाभ न हो परंतु परंपरा से लाभ अवश्य मिलेगा। जैसे- नरकों में पड़े नारकी। पूर्व भव में गुरुओं के उपदेश सुने थे पर गुरु की बात नहीं मानी परिणाम नरकों में जाना पड़ा। नरकों में जब तन में असहाय वेदना होती है।

तहा भूमि परसत दुःख इसो बिच्छु सहस डसे नहीं तिसो।

हजारों बिच्छुओं के डसने से जितना कष्ट होता है उतना कष्ट नरकों में नारकियों को पैर रखने मात्र से कष्ट होता है। शीत ऊष्ण की भीषण बाधायें सहना होती है। जब असहाय वेदना होती है उस वेदनानुभव के कारण सम्यग्दर्शन उत्पन्न हो जाता है कि भगवन् । मुझे मेरे गुरु ने उपदेश दिया था, माता-पिता ने समझाया था पर मैंने मिथ्यात्व के उदय होने पर गुरुवाणी पर श्रद्धान नहीं किया था। इसीलिए, दुःख, वेदना भोगना पड़ी।

अतः यदि तुमने अपनी कीमत 250 रु. की भी बना ली तो भी कल्याण हो जाएगा। अतः सुनना भी श्रेष्ठ है। जीवन में सुनिये, समझिये, आचरण में लाइए। आचरण में न भी आ पाये तो कोई बात नहीं जिनवाणी पर श्रद्धान तो जमा ही लो। वह अनंत संसार से तुम्हारी रक्षा करेगा।

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