“जियो और जीने दो” भगवान महावीर के उपदेशों का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और सारगर्भित सिद्धांत है। यह केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक श्रेष्ठ कला और मानवता का मूल आधार है। इस सिद्धांत का अर्थ है स्वयं भी शांति और स्वतंत्रता से जीवन जीना और दूसरों को भी उसी अधिकार के साथ जीने देना। यह हमें सिखाता है कि हम किसी भी प्राणी को कष्ट न पहुँचाएँ, चाहे वह मनुष्य हो या कोई अन्य जीव। यही विचार जैन धर्म के प्रमुख सिद्धांत अहिंसा का मूल है।
आज के समय में जब समाज में हिंसा, द्वेष और असहिष्णुता बढ़ती जा रही है, “जियो और जीने दो” का सिद्धांत और भी अधिक प्रासंगिक हो जाता है। यदि हर व्यक्ति इस विचार को अपने जीवन में उतार ले, तो आपसी झगड़े, विवाद और युद्ध जैसी समस्याएँ काफी हद तक समाप्त हो सकती हैं।
यह सिद्धांत केवल शारीरिक हिंसा से बचने तक सीमित नहीं है, बल्कि मानसिक और वाणी की हिंसा से भी दूर रहने की प्रेरणा देता है। किसी को बुरा कहना, अपमान करना या किसी के अधिकारों का हनन करना भी इस सिद्धांत के विरुद्ध है।
प्रकृति के संदर्भ में भी यह विचार अत्यंत महत्वपूर्ण है। हमें पर्यावरण, पशु-पक्षियों और सभी जीवों के प्रति दया और करुणा रखनी चाहिए। जब हम “जियो और जीने दो” का पालन करते हैं, तो हम न केवल मानवता की रक्षा करते हैं, बल्कि पूरे पर्यावरण का संतुलन भी बनाए रखते हैं।
अतः “जियो और जीने दो” केवल एक धार्मिक उपदेश नहीं, बल्कि एक सार्वभौमिक संदेश है, जो हमें शांति, सहिष्णुता और प्रेम का मार्ग दिखाता है। यदि हम इस सिद्धांत को अपने जीवन में अपनाएँ, तो समाज में सद्भाव और सुख-शांति का वातावरण स्थापित किया जा सकता है।
“श्रेष्ठ मानवता हेतु – पाँच महाव्रत”
भगवान महावीर ने मानव जीवन को श्रेष्ठ और पवित्र बनाने के लिए पाँच महान सिद्धांतों का उपदेश दिया, जिन्हें पंच महाव्रत कहा जाता है। ये सिद्धांत आज भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं, जितने हजारों वर्ष पहले थे। आइए इन पाँच सिद्धांतों को विस्तार से समझते हैं:
1. अहिंसा (Ahinsa)
किसी भी जीव को कष्ट न देना। अहिंसा भगवान महावीर का सबसे प्रमुख सिद्धांत है। इसका अर्थ है कि हम किसी भी प्राणी को मन, वचन और कर्म से हानि न पहुँचाएँ। यह केवल शारीरिक हिंसा से बचने तक सीमित नहीं है, बल्कि बुरे विचार और कटु वाणी भी हिंसा मानी जाती है।
2. सत्य (Satya) – हमेशा सच बोलना
सत्य का अर्थ है हर परिस्थिति में सच्चाई का साथ देना। भगवान महावीर ने सिखाया कि ऐसा सत्य बोलना चाहिए जिससे किसी को ठेस न पहुँचे। सत्य जीवन में विश्वास और सम्मान बढ़ाता है।
3. अस्तेय (Asteya) – चोरी न करना
अस्तेय का मतलब है जो वस्तु हमारी नहीं है, उसे बिना अनुमति के न लेना। यह केवल चोरी तक सीमित नहीं, बल्कि किसी का अधिकार छीनना या धोखा देना भी इसमें शामिल है।
4. ब्रह्मचर्य (Brahmacharya)
इंद्रियों पर नियंत्रण ब्रह्मचर्य का अर्थ है अपने मन और इंद्रियों पर संयम रखना। यह सिद्धांत हमें अनुशासन, आत्मसंयम और शुद्ध जीवन जीने की प्रेरणा देता है।
5. अपरिग्रह (Aparigraha)
अधिक संग्रह न करना अपरिग्रह का मतलब है आवश्यकता से अधिक वस्तुओं का संग्रह न करना। यह हमें लोभ, लालच और मोह से दूर रहने की शिक्षा देता है और सादगीपूर्ण जीवन जीने का मार्ग दिखाता है।
“निष्कर्ष” :-
भगवान महावीर के ये पाँच सिद्धांत केवल धार्मिक नियम नहीं, बल्कि एक आदर्श जीवन का आधार हैं। यदि हम इन्हें अपने दैनिक जीवन में अपनाएँ, तो न केवल हमारा जीवन सुखी और शांतिपूर्ण बनेगा, बल्कि समाज में भी प्रेम, सद्भाव और नैतिकता का विकास होगा। अतः जियो और जीने दो के साथ यह पंच महाव्रत एक बेहतर, संतुलित और श्रेष्ठ मानवता का मूल आधार है।
श्रमणी आर्या अर्हंश्री माताजी

सारस्वत कवि डॉ. श्रमणाचार्य श्री 108 विभव सागर जी महाराज की सुशिष्य सम्यक्त्ववर्धिनी भक्तामर साधिका श्रमणी आर्यिका रत्न श्री 105 अर्हम् श्री माता जी के दिक्षा दिवस का भव्य कार्यक्रम 26 अप्रैल 2026 को सामुदायिक केंद्र, सेक्टर 11, प्रताप नगर, जयपुर में आयोजित किया जा रहा है
माताजी का जयपुर में प्रवेश 8 फरवरी 2026 को हुआ था और वर्तमान में जैन मंदिर, सेक्टर 8, प्रताप नगर में प्रवास है।