श्री पल्लीवाल जैन डिजिटल पत्रिका

अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

(पल्लीवाल, जैसवाल, सैलवाल सम्बंधित जैन समाज)

कहानी सबसे सुहानी

संयम

संयम-समता तथा प्रसन्नता का पथ

एक बार की बात है एक संत थे, एक व्यक्ति ने उनके प्रवचन सुने, तो वह उनसे अत्यन्त प्रभावित हुआ और उनके शिष्यत्व को स्वीकार कर लिया। तथा गुरुदेव से बोला- गुरुदेव ! आप मुझे संयम प्रदान कर उपकृत करें। उसने संयम तथा मनुष्य पर्याय की दुर्लभता के विषय में कहा, तो गुरुदेव बोले-बेटा, अभी तुम अभ्यास करो १ साल बाद आना। शिष्य ने कहा-ठीक है गुरुदेव । और वह १ साल बाद पुनः आया। गुरुदेव से पुनः प्रार्थना की। गुरुदेव ने कहा- जाओ पहले तुम नदी पर स्नान करके आओ । शिष्य नदी पर स्नान करने के लिये गया उधर गुरुदेव ने आश्रम की सफाई करने वाली जमादारिन से कहा कि जैसे ही वह नहाकर आये, तो तुम झाडू लगाने लगना। आज्ञाकारिणी जमादारिन ने वैसा ही किया। शिष्य को बहुत जोर से गुस्सा आ गया बोला- दिखाई नहीं देता, कि मैं स्नान करके आ रहा हूँ, सारी धूल मेरे शरीर पर चिपक गई। तुरंत जमादारिन ने जाकर गुरुदेव को जानकारी दी। शिष्य उधर गुरुदेव के पास पहुँचा, तो गुरुदेव ने पूछा-बेटा, स्नान करके आ गये । शिष्य बोला-हाँ, गुरुदेव जी। अब मुझे संयम प्रदान कर मेरे जीवन का कल्याण करें । गुरु ने कहा-बेटा! अभी पुनः अभ्यास करो और १ वर्ष बाद आना । उसे अपनी गलती समझ में आ गयी। वह पुनः घर गया अभ्यास बनाया, १ वर्ष बाद पुनः आया। गुरु ने पुनः स्नान करने के लिये जाने को बोला, और जमादारिन से कहा-अब की बार झाडू लगाना, साथ ही पुरानी बात को दोहराना कि वैराग्य कैसा है ? समता कैसी है? गाली देने लगना। उसने वैसा ही किया। शिष्य बोला-चुप हो जाओ नहीं तो मैं तुम्हारा मुख तोड़ दूँगा। वह बोली-तोड़ के देखो। शिष्य ने उसके मुख पर तमाचा मार दिया। पश्चात् सारी बात गुरु के पास पहुँची। गुरु ने पूछा-बेटा, स्नान कर आये। उसने कहा-हाँ गुरुदेव, अब आप मुझे संयम प्रदान करें। गुरु ने कहा-पुनः अभ्यास करो और १ साल बाद आना। वह पुनः १ साल के बाद आया। पुनः गुरु आज्ञा से स्नान करने गया। स्नान करके लौटा, तो जमादारिन ने गुरु आज्ञा से उसके ऊपर कचरे की टोकरी पलट दी। अब वह आश्रम में पहुँच कर गुरु को अनेक बातें सुनाता है कि ऐसी है, वैसी है, देखती नहीं, कैसी को रखा है, कुछ काम की नहीं, निकाल दो आदि-आदि। गुरु ने कहा-बेटा १ साल बाद आना, पुनः अभ्यास करो। वह पुनः १ साल बाद आया लेकिन उसे हर बार अपनी गलती का एहसास होता था। लेकिन इस बार जब वह स्त्रान करके लौटा तो जमादारिन ने उसे झाडू मार दी फिर भी उसने कुछ नहीं कहा और वह पुनः स्नान के लिये चला जाता है। वह पुनः झाडू मार देती है जिससे वह पुनः स्नान करने चला गया। इस प्रकार वह ३ बार स्नान करने गया लेकिन अब उसके अंदर क्रोध नहीं प्रसन्नता थी कि यदि यह झाडू नहीं मारती, तो मुझे भी इतने बार स्नान करने का अवसर प्राप्त नहीं होता । तू सदैव खुश रहे। इस प्रकार उसने उससे कहा, और गुरु के पास आ गया। शिष्य के आने के पूर्व ही सारी जानकारी गुरु को प्राप्त हो गई गुरु ने कहा-बेटा, अब तेरा समय आ गया है । क्योंकि संयम समता तथा प्रसन्नता का पथ है। अब की बार तुमने जाप तथा मंत्र स्नान किया है ।

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असंयम

असंयम का फल क्या होगा ?

एक नगर में एक राजा था उस की एक दासी थी, वह राजा की सेवा में सदैव तत्पर रहती थी, उसे राजा की पसंद तथा नापसंद का भी पता था। राजा को फूलों के सेज पर सोना बहुत पसंद था, वह गुलाब के फूलों को ही पसंद करता था तथा फूल ताजे होना चाहिए, सुगंधित होना चाहिए। वह रोज ही सेज तैयार करती थी, रोज की भाँति एक दिन उसने राजा की सेज को तैयार किया, तथा सोचा कि राजा तो, रोज ही इस सुंदर सेज पर सोता है, आज मैं भी इस पर सो कर के देखूँ, क्योंकि अभी राजा को अपनी सेज पर आने में देर है, तब तक मैं सोकर के उठ जाऊँगी और वह फूलों की सेज पर सो गई। वह सेज बहुत कोमल थी और दासी को लेटते ही नींद आ गई, इतने में राजा आ गया, उसने देखा कि आज मेरी सेज पर यह दासी सो रही है और उसे क्रोध आ गया, उसने तुरंत ही एक चामकोड़ा मँगाया और उसके शरीर पर जोर से मारता है। जिससे उसके शरीर की चमड़ी निकल आई और वह चीख कर के उठी तो अपने सामने राजा को देखा और राजा ने दूसरा कोड़ा भी उसको मार दिया, राजा ने जैसे ही दूसरा कोड़ा मारा, दासी को हँसी आ गई । राजा ने पुनः तीसरा कोड़ा मारा दासी और जोर से हँसने लगी अंत में राजा को विवेक जागृत हुआ और वह सोचने लगा, कि मैं इसको मार रहा हूँ फिर भी यह दासी हँस रही है. क्या बात है ? राजा ने दासी से पूछा कि तुम इतने कोडे खाने के बाद भी हँस रही हो । दासी बोली- हे राजन! भगवान ने मेरा विवेक जागृत कर दिया, तुम्हारे कोडे ने मुझे शिक्षा दे दी. कि जब एक बार इस फूल के सेज पर सोने से इतने कोडे खाने पड़े, तो जो रोज-२ इस सेज पर सोता है उसे कितने कोडे खाने पड़ेंगे। इतना सुनतेही राजा चिंतन की गहराई में उतर गया। और उसे वैराग्य हो गया कि एक दिन के असंयम में रहने का इतना फल है तो जो हमेशा असंयम में रहता है, उसको क्या फल मिलेगा ? अतः हमें असंयम को छोड़ संयम को घारण करना चाहिये ।

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संकलित

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