श्री पल्लीवाल जैन डिजिटल पत्रिका

अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

(पल्लीवाल, जैसवाल, सैलवाल सम्बंधित जैन समाज)

मृत्यु में दिखती आत्मा

मृत्यु बोध हो जाने के बाद आत्म दर्शन होते है। आत्मा-धर्म चक्षुओं से नहीं दिखती क्योंकि अरुपी है। कोई सोचे दूरबीन से देखूँ High magnification power वाला दूरबीन भी नहीं देख सकता क्योंकि चर्म नेत्र पुद्गल को देखते है। आत्मा को नहीं। एक सज्जन बोले- महाराज बहुत प्रयत्न किया परन्तु आत्मा नहीं दिखी मैंने कहा- दिखेगी भी नहीं उन्होंने कहा क्यों? मैंने कहा आप जिन नेत्रों से देखना चाहते हो वे देखने में सक्षम नहीं और जो देख सकता है उनसे देखते नहीं। तभी दूसरे सज्जन भी आ गये बोले महाराज! मुझे तो आत्मा दिखती है मैंने कहा – अच्छा वह कैसी होती है वह बोले करोड़ों सूर्य की तरह प्रकाशमान है ज्योति पुंज रुप दिखाई देती है। मैंने कहा जो प्रकाश व ज्योति दिख रही है वह आत्मा हो नहीं सकती क्योंकि जो आँखों से दिखे वह मूर्तिक है और आत्मा तो अमूर्तिक है चर्म चक्षुओं से दिखना संभव ही नहीं है क्योंकि रुप आत्मा का होता नहीं जहाँ रुप दिखता है वहाँ स्वरुप दर्शन संभव नहीं, उसमें जो आत्मा जैसी दिख रही है वह क्या है? मैंने कहा भ्रम मात्र है। जैसे रेगिस्तान में पडी रेत पर जब धूप पड़ती है तो वह पानी का भ्रम उत्पन्न करती है ठीक वैसे ही ज्योति पुंज रुप दिखने वाली आत्मा नहीं आत्माभाष है। कोरी मिथ्या कल्पना है। भगवन् ! फिर मृत्युबोध में होने वाला आत्मदर्शन कैसा होता है?

दीक्षा के पूर्व ही तीर्थंकर तत्त्वान्वेषण करते थे चिन्तन गहराई लेता था और मृत्युबोध होते ही संसार क्षणभंगुर नजर आता है और मोह के बंधन ढीले पड़ जाते है। ठीक उसी प्रकार जैसे बालक को 10 का नोट दिखाओं तो 5 का दे देता है। अधिक मूल्यवान वस्तु के मिलने पर कम वस्तु अपने आप छूट जाती है। बस ठीक इसी प्रकार तीर्थंकरों को जब मृत्युबोध होता है तो असीम आत्म वैभव नजर आने लगता है। तीन लोक की संपदा भी जिस वैभव के समक्ष फीकी है। ऐसी बहुमूल्य आत्मा को पाने के बाद बाह्य वैभव तृण के समान दिखने लगता है और उसे छोड़कर तीर्थंकर वन की ओर विहार कर देते है। साधक जब अपने क़दमों को मुक्ति पथ पर बढ़ाते है। सारे धन-दौलत, कुटुम्ब परिवार का परित्याग कर देते हैं। फिर स्वप्न में भी उसको याद नहीं करते और यदि कभी याद आ भी गई तो निंदा, गर्दा, आलोचना करता है। दुःखित होता है। प्रतिक्रमण में गणधर देव कहते है – भावियं ण भावेमि अभावियं भावेमि। जिसे अभी तक नहीं देख उसे देख लो जिसे देखा है उसे देखना बन्द कर दो। पुद्‌गुलों को अनंतों बार देखा है अब तो परद्रव्य को छोड़ निजात्मा को निहार लो।

व्यक्ति चिंतन, विचारों में उतरे मेरी गति किस दिशा में चल रही है। मेरे कष्ट कैसे दूर हो? कष्ट दूर इतनी आसानी से नहीं होते अथक परिश्रम करना पड़ता है। आप भगवान से प्रार्थना करते है कि हे भगवन् ! सिर दर्द न हो? भगवान् कहते है तथास्तु ! एक बीमारी गई दूसरी आई, दूसरी गई तीसरी आई। आ. कहते है –

विपद भव पदावर्ते पदिके वाति बाह्यते।
यावद् तावाद भवत्यन्या प्रचुराः विपदः पुरः ।। (इ.प.)

अर्थात् जीवन विपत्तियों का आलय है एक के बाद एक विपत्ति आती ही रहती है। परन्तु विपत्ति आई कहाँ से? विपत्तियों के बीज तो हमने ही बोये है। 24 घण्टों में से 1/2 घंटे धर्म में बीते है। तो 23-1/2 घंटे तो अशुभास्रव ही चला और 1/2 धर्म ध्यान चला, शुभास्रव चला बस वही 1/2 घंटा हमारा है उसी समय आत्मबोध होता है। हे भगवान् ! मैं कहाँ हूँ। आमदनी तो बहुत कम हो रही है। खर्चा ज्यादा है अब पुण्य का खाता जमा कैसे हो? bank balance कैसे बने? और जीवन परिवर्तित होता है। छोटे बच्चों को मन्दिर जाने बिस्किट, टॉफी का लालच देते है परन्तु धीरे-धीरे स्वयं ही चलना पड़ता है।

आचार्य हे भव्य ! आत्मा को थोड़ा तो निहारों दौलतराम जी कहते है –

“दौल समझ सुन चेत सयाने काल वृथा मत खोवे।
यह नरभव फिर मिलन कठिन जो सम्यक नहीं होवें” ।।

करोंगे तो पाओंगे। नहीं करोंगे नहीं पाओगे, सुख के बीज बोओगे, सुख पाओगे। मृत्युबोध होने पर भविष्य दिखने लगता है रास्ता नजर आने लगता है दिशा बदलती है और दिशा change होते ही दशा भी बदलती है। फिर न दुःख रहता है दुःख की मंजिल। मिलता है शाश्वत सुख जो मिलकर फिर छूटता नहीं।

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