कार्यवाही विवरण पर प्रतिक्रया
अधिकांशतः श्री पल्लीवाल जैन पत्रिका हर माह की 28- 29 तारीख तक प्राप्त हो जाती है। इस बार श्री पल्लीवाल जैन पत्रिका अपने निर्धारित समय पर प्राप्त नहीं हो पाई, मैंने भी कोई विशेष नोटिस नहीं लिया। 4 मार्च को समाज के ही एक बंधु ने मुझे फोन पर बताया कि इस बार की पल्लीवाल जैन पत्रिका पढ़ी या नहीं? मैंने कहा अभी आई नहीं है आने पर पढूंगा। मैंने उनसे पूछा उसमें ऐसा क्या विशेष छपा है? उन्होंने कहा आपके बारे में कुछ छपा है! जिज्ञासा हुई मैंने अपने पास ही रहने वाले एक पल्लीवाल जैन बंधु से श्री पल्लीवाल जैन पत्रिका के बारे में पूछा तो उन्होंने मुझे श्री पल्लीवाल जैन पत्रिका दे– दी। मैंने उनसे कहा कि मैं इसे कुछ समय के लिए अपने पास रख लूं ? उन्होंने कहा हमेशा के लिए रखें। मैं पत्रिका उनके घर से अपने घर ले आया।
श्री पल्लीवाल जैन पत्रिका के पृष्ठ संख्या 5 पर -16 नवम्बर 2025 को आगरा में हुई तथाकथित अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा के एक कब्जाधारीजी के ग्रुप की केंद्रीय कार्यकारिणी की बैठक का कार्यवाही विवरण प्रकाशित किया गया था। मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। 26 नवम्बर 2025 को तथाकथित महासभा की कार्यकारिणी की बैठक हो और उसका कार्यवाही विवरण तीन माह बाद श्री पल्लीवाल जैन पत्रिका में प्रकाशित हो – यह अपने आप में एक आश्चर्यजनक घटना है। मैंने सोचा कि हो सकता है कि कब्जाधारीजी अपनी व्यस्तता के कारण कार्यवाही विवरण प्रस्तुत नहीं कर पाए होंगे अतः प्रकाशन में देरी हो गयी होगी।
25 फरवरी 2026 की श्री पल्लीवाल जैन पत्रिका में प्रकाशित तथाकथित महासभा की कार्यकारिणी की बैठक के कार्यवाही विवरण को बड़े गौर से पढ़ा, पृष्ठ संख्या पांच के पैरा नंबर तीन पर कब्जाधारीजी ने अपनी भावना व्यक्त करते हुए कहा कि
” महासभा के हित के खिलाफ कोई गलत कार्य न हो, इसलिए हम सब आज यहां एकत्रित हुए हैं। काल के प्रभाव से कुछ सामाजिक लोग जो महासभा से अलग चले गए हैं, उन्हें मुख्य धारा में लाना है। महासभा के टुकड़े होना दिल के टुकड़े होने जैसा है। ऐसी बातें सुनाई दे रही है कि महासभा के दो चुनाव होंगे, परंतु पूरे समाज का महासभा के प्रति अगाध प्रेम है, मेरा मानना है कि महासभा के जब भी चुनाव हो तो एक ही चुनाव होना चाहिए। “
उनकी ऐसी भावनाएं देखकर मन को बड़ा संतोष हुआ। भावनाएं वास्तविक थी या बनावटी लेकिन जो श्री पल्लीवाल जैन पत्रिका में प्रकाशित की गई उससे तो यही प्रतीत होता है कि कब्जाधारीजी के मन में बड़ी पीड़ा है। आत्मा को बड़ा सुकून मिला, क्योंकि मुझे महासभा के दूसरे ग्रुप ने भरतपुर की बैठक में अपने त्यागपत्र सहित सभी अधिकार महासभा में समन्वय करने के लिए दिये थे। इसलिए कब्जाधारीजी का बयान देखा तो आत्मिक आंनद आया।
कब्जाधारीजी ने पुत्र विवाह के शुभ अवसर पर आमंत्रित करने के लिए फोन किया था तब मैंने उनसे भी निवेदन किया था कि महासभा के मेंटर को कैसे निबटाना है, इसके लिए समय निकालें, तब उन्होंने मुझसे कहा कि ‘चाचा‘ विवाह का कार्य निबट जाने दो फिर इसी काम को सेटल करना है।
ऐसा आश्वासन पाने के बाद उनका पत्रिका में उनके द्वारा दिये गये प्रथमदृष्टया बयान से मन का प्रफुल्लित होना स्वाभाविक था सो हम हुए।
दूसरा बयान समाज के जाने–माने विघ्नसंतोषी जी का था, जिसमें उन्होंने अपनी आत्मिक भावनाओं का प्रदर्शन कुछ इस प्रकार किया –
“अभी दूसरे ग्रुप ने भरतपुर मीटिंग में एक व्यक्ति को इस ग्रुप से बात करने के लिए अधिकृत किया गया, ऐसा समाज के व्हाट्सएप ग्रुपों पर आया था, पर अभी तक उस व्यक्ति ने महासभा के किसी भी पदाधिकारी से इस विषय पर कोई चर्चा नहीं की है।” मतलब उनकी ओर से कोई पहल नहीं है। हम भी किसी को नियुक्त कर दें और वह उस ग्रुप से कोई भी चर्चा नहीं करें तो कोई काम नहीं हो पाएगा। इस ग्रुप ने कभी भी कोई गलत काम नहीं किया, उसके बावजूद भी हम सकारात्मकताक बात कर रहे हैं। जिसका मतलब है कि हम समाज में एकता चाहते हैं“।
इन श्रीमान जी का चाल चरित्र और चेहरा समाज के अधिकांश लोग पहचानते हैं, फिर यह विभाजित महासभा के किसी ग्रुप के कोई पदाधिकारी भी नहीं हैं।
भरतपुर बैठक में वार्ता के सभी अधिकार प्राप्त करने के बाद मैंने अलवर निवासी श्री पवन चौधरी, जो विघटित महासभा के एक पदाधिकारी हैहें, और रणनीतिकार भी हैं, उनसे बात की। उन्होंने बहुत ही सीधे सरल तरीके से बताया कि हमारे ग्रुप के सभी अधिकार प्राप्त व्यक्ति, महासभा के भूतपूर्व अध्यक्ष श्री देवकीनंदन जी हैं। इस संबंध में आप उनसे वार्ता करें तो अच्छे रिज़ल्ट आएंगे। उन्होंने यह भी कहा कि मैं तो यह चाहता हूं कि यह झंझट जल्दी खत्म हो, हम भी अपने काम–धंधे से लगे। आप तो अंकल देवकीनंदन जी से बात करके इस झंझट को निपटवाओ।
उनकी सलाह से ही मैंने श्री देवकीनंदन जी से लगभग पांच–छह बार फोन पर बात की, दो बार उनके निवास स्थान पर गया, उनके आश्वासन पाने के बाद जने–जने से बात करने का कोई औचित्य नहीं था।
इस लिए श्री पल्लीवाल जैन पत्रिका में प्रकाशित कब्जाधारीजी महासभा के गुट–ग्रुप की तथाकथित कार्यकारिणी की बैठक का कार्यवाही विवरण धूर्तता पूर्ण झूठा और भ्रामक है।
पत्रिका के पृष्ठ संख्या 6 पर यही कब्जाधारीजी कहते हैं – “दूसरे ग्रुप ने अभी जो भरतपुर में मीटिंग की थी उसका एक मैसेज व्हाट्सएप ग्रुप पर आया था, कि उन्होंने श्री अशोक कुमार जैन रामद्वारा को बात करने के लिए अधिकृत किया है, पर जिनका महासभा पर विश्वास नहीं है और जिन्होंने महासभा की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दिया हुआ है वो महासभा की भलाई के लिए क्या और कैसे कर पाएंगे? सकारात्मकता के लिए प्रथम बात है कि जो उन्होंने गलत प्रक्रिया आरंभ की है पहले उसे सही कर के बाल हमारे पाले में डालें“।
यह बात बिल्कुल सही है, वर्तमान महासभा के दोनों ग्रुपों पर मेरा बिल्कुल भी भरोसा नहीं है। इस लिऐ ही मैंने अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा की साधारण सदस्यता से त्यागपत्र दे दिया था। भरोसा भी कैसे हो जिन लोगों की बुनियाद ही झूठ फरेब और षड्यंत्रों पर टिकी हो उन पर मैं तो क्या कोई भी समझदार व्यक्ति भरोसा नहीं करेगा। समाज–जन विचार करें, महासभा के दोनों ही गुटों ने चुनाव लडने से पूर्व अपने– अपने घोषणापत्र जारी किए थे कि हम जीतने के बाद यह करेंगे – वह करेंगे,पर उनके दिमाग में यह नहीं आया कि अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा के विधान के अनुसार कार्यकारिणी की अनुमति / संस्तुति के बिना महासभा में कुछ भी करना संभव नहीं है। इनके लिए अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा के विधान का कोई महत्व ही नहीं है।साम दाम दण्ड भेद से जीता जाने वाले चुनाव की अभिलाषा ने इनको इतना मतिभ्रष्ट कर दिया कि एतिहासिक धर्मस्थल हस्तिनापुर की गरिमा को इनके क्रिया– कलापों ने नष्ट–भ्रष्ट कर, पल्लीवाल जैन समाज को देश भर के दिगम्बर जैन मतावलम्बियों में पथभ्रष्ट जैन धर्मावलंबियों के रुप में स्थापित कर दिया। इनके कारनामों ने टीवी चैनलों और समाचार पत्रों में खूब नाम कमाया। पूज्य ज्ञानमती माताजी जो दो बार हस्तिनापुर में पल्लीवाल जैन समाज को सम्बोधित करने के लिए पधारी, उन्हीं पूज्य माताजी को दूसरे दिन प्रायश्चित के रुप में अन्न–जल का त्याग कर मौन धारणा करना पड़ा।
मैं उसी समय यह समझ गया था कि ऐसे संस्कारित पदाधिकारी जीतने के बाद अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा की गरिमा को कितना अक्षुण्ण रख पाएंगे, यह मेरे लिए तो विचारणीय था। इस लिए मैंने अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा की साधारण सदस्यता से त्यागपत्र देना ही उचित समझा।
आप सभी समाज–जनों को पूरे तीन वर्ष महासभा के इन धर्मनिष्ठ, विवेकवान महान समाज सेवीयों के कर्म–कांडों को देखने समझने और झेलने का सोभाग्य प्राप्त हुआ, जिसकी व्याख्या करना भी मैं उचित नहीं समझता।
कब्जाधारीजी की महासभा की कार्यकारिणी के सह मंत्री श्री पवन जैन चौधरी अलवर का उद्बोधन भी विचारणीय है।वे कहते हें – “इस तरह के लोगों को समाज से निकाल देना चाहिए इनके साथ एका नहीं हो सकता। हम सब ने मिलकर के अयोध्या में फंड इकट्ठा किया परंतु उन्होंने उसका खाता ही बंद करवा दिया, आप कभी भी चुनाव करवाएं 90% समाज के लोग आपके साथ हैं। अभी कुछ दिनों पहले अशोक कुमार जी रामद्वारा से बात हो रही थी उनका फोन मेरे पास आया था काफी देर उनसे बात हुई उन्होंने स्पष्ट किया कि हम समिति के लिए जो नाम देंगे उनमें पवन जैन चौधरी एवं जितेंद्र जैन आगरा का नाम नहीं होना चाहिए। फिर भी मैं कहना चाहता हूं कि चुनाव एक साथ ही होने चाहिए।“
इस वक्तव्य में सारी ही बातें विरोधाभासी है।कैसे लोगों को समाज से निकाल देना चाहिए? इसका अर्थ है कि जो उनके मनोनुकूल नहीं है उन्हें समाज से बहिष्कृत कर देना चाहिए।क्या भारतीय संविधान और न्याय व्यवस्था उनके मनोभावों की अनुमति देती है? कोई भी पंचायत किसी व्यक्ति को समाज से बहिष्कृत करके तो देखे भारतीय दंड व्यवस्था उस पंचायत और उन पंचों का क्या हश्र करती है , उन्हें मालूम पड़ जायेगा। दूसरा वक्तव्य उनका बहुत ही शरारतपूर्ण है। जब उन्होंने सभी निर्णय और वार्ता के लिए माननीय श्री देवकीनंदन जी को पूर्णतया अधिकृत बताया तो में उनसे किसी भी प्रकार की समिति की बात क्यों करने लगा? श्री चौधरी जी को मैं स्मरण कराना चाहता हूं कि आज कल हर व्यक्ति स्मार्टफोन रखता है उसमें एक फीचर काल रिकार्डिंग का भी होता है। वे बहुत ही होशियार समझदार और फितना व्यक्ति है। हाँ, काल रिकार्डिंग को सार्वजनिक करना एथिक्स के खिलाफ है। यदि उनकी भावना किसी के मन में किसी के प्रति दुर्भावना पैदा करने की है तो यह ठीक नहीं है।
देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था है. पल्लीवाल जैन समाज में भी लोकतांत्रिक व्यवस्था प्रफुल्लित है, किसी को भी कुछ भी कहने का अधिकार है, पर यह न समझा जाए कि उनकी बातों का जबाब नहीं दिया जा सकेगा।
सभी समाज जनों के संज्ञान में एक बात और लाना चाहता हूं, कि मेरा जन्म 1952 में श्री रामजी लाल जैन के यहां आगरा में हुआ था। श्री रामजी लाल जैन पल्लीवाल जैन थे और आगरा के पास ग्राम बरारा के रहने वाले थे। मेरे पास मेरे कुनवे–खानदान का तीन सौ साल पुराने दस्तावेज हैं। उन दस्तावेजों के अनुसार मेरा खानदान तीन सौ वर्षों से पल्लीवाल जैन समाज से ही है। इस लिए मैं जन्मजात पल्लीवाल जैन हूं। मेरी पूरी आस्था पल्लीवाल जैन समाज के प्रति है। अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा पल्लीवाल जैन समाज का एक संगठन (संस्था) है। इस संगठन की स्थापना जिन उद्देश्यों के लिए हुई वर्तमान में वह अपने उद्देश्यों में पूर्णतः असफल साबित हुई है। पल्लीवाल जैन समाज के कुछ विचारवान महानुभावों ने समाज में प्रेम–सोहार्द और सहकारिता के विकास के लिए अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा का गठन किया था। वर्तमान में स्थित महासभा के मूल सिद्धान्तों के बिल्कुल विपरीत है। महासभा से अगाध लगाव होंने के कारण ही में महासभा के एकीकरण के लिए अग्रसित हुआ था यदि मेरे आगे आकर प्रयास करने से किन्हीं समाज बन्धुओं को परेशानी है,तो वे निश्चिंत रहें।
अंत में—
परखना मत परखने में कोई अपना नहीं रहता
किसी भी आईने में देर तक चेहरा नहीं रहता।।
अशोक कुमार जैन
2बी, रामद्वारा कालोनी, महावीर नगर, जयपुर
बहुत सही बात
श्री अशोक जी द्वारा जो बाते लिखी गई है, सत्य हैं ।
सच्चाई को लिखना बहुत आवश्यक है आपने इसको जिसके लिए आपका शुक्रिया सत्य को लिखना हर किसी के लिए हिम्मत नहीं होती शुक्रिया