इस संसार में लाखों जीव हैं, लेकिन बोलने की शक्ति केवल मनुष्य के पास है। यद्यपि बोलने की क्षमता हर व्यक्ति में होती है, परंतु बोलने की कला कुछ ही लोगों के पास होती है। यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि हमें जो वचन-शक्ति प्राप्त हुई है, उसका हम किस प्रकार उपयोग करते हैं। इसी बोलने की कला से हमारे जीवन का विकास होता है।
यदि हम मधुर वचनों का प्रयोग करते हैं, तो हमारा जीवन सुगंधित हो उठता है; लेकिन यदि हम बिना सोचे-समझे बोलते हैं, तो वही वचन हमारे जीवन को प्रभावित कर सकते हैं।
बोलने के महत्व पर अनेक दोहे भी प्रचलित हैं—
“बोली एक अनमोल है, जो कोई बोले जानि,
हिय तराजू तौल के, तब मुख बाहर आनि।”
“शब्द-शब्द सब एक हैं, शब्द के हाथ न पाँव,
एक शब्द औषधि बने, एक शब्द करे घाव।”
सही ढंग से बोले गए शब्द हमारे संबंधों को मजबूत बनाते हैं और हमारी प्रतिष्ठा बढ़ाते हैं, जबकि गलत तरीके से बोले गए शब्द संबंधों को बिगाड़ देते हैं और हमारी छवि को नुकसान पहुँचाते हैं।
इसलिए हमेशा ध्यान रखें:
1. क्या बोलना
बोलते समय यह अवश्य विचार करें कि हमें क्या कहना है। बिना कारण इधर-उधर की निरर्थक बातें नहीं करनी चाहिए। औचित्य, सादगी और सहजता से कही गई बात सभी को प्रिय लगती है।
2. कब बोलना
जो व्यक्ति सही समय पर बोलता है, उसकी बातों का महत्व होता है। जो हर समय बोलता रहता है और यह नहीं समझता कि कब बोलना चाहिए, उसकी बातों का मूल्य कम हो जाता है। इसलिए समय का ध्यान रखना आवश्यक है।
3. कितना बोलना
मनुष्य को हमेशा नाप-तौल कर बोलना चाहिए। कुछ लोग अत्यधिक बोलते हैं, जबकि कुछ सोच-समझकर सीमित शब्दों में अपनी बात रखते हैं। जो व्यक्ति संतुलित और सोच-समझकर बोलता है, उसकी बातों को लोग ध्यान से सुनते हैं।
4. कैसे बोलना
यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि बात को किस प्रकार प्रस्तुत किया जाए। हमेशा उपयुक्त और शिष्ट शब्दों का प्रयोग करना चाहिए। यदि सही बात को भी गलत तरीके से कहा जाए, तो उसका महत्व समाप्त हो जाता है। इसलिए सही बात को सही तरीके से कहना अत्यंत आवश्यक है।
अंत में, यह कहा जा सकता है कि मनुष्य बोलना तो बचपन में ही सीख जाता है, लेकिन क्या और कैसे बोलना है, यह सीखने में समय लगता है। जो व्यक्ति बोलने की कला में निपुण हो जाता है, वह सभी के हृदय में स्थान बना लेता है और सभी को प्रिय लगता है।
महेंद्र कुमार जैन (लारा)
अलवर