श्री पल्लीवाल जैन डिजिटल पत्रिका

अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

(पल्लीवाल, जैसवाल, सैलवाल सम्बंधित जैन समाज)

जैन समाज की वर्तमान स्थिति : कुछ विचारणीय बिंदु(1)

जैन धर्म के अनुयायियों की संख्या दिन प्रतिदिन कम होती जा रही है, यह जैनों के लिए चिन्ता का विषय होना चाहिए। सरकारी आंकड़ों के आधार पर सन् 2011 में जैनों की जनसंख्या मात्र 44 लाख ही थी। कुछ जैन हिन्दू संगठनों के बहकावे में आकर खुद को जैन कहलवाने के बजाय हिन्दू कहलवाने में गौरवान्वित महसूस करते हैं तथा हिन्दू / वैष्णव देवी-देवताओं की भी आराधना करने लगे हैं। यह तो और अधिक चिन्ताजनक स्थिति है क्योंकि ऐसे जैन स्वयं जैन-धर्म की जड़ें खोदने में लगे हुये हैं। कुछ साधु संत भी जैनों को हिन्दू ही मानने लगे हैं, यह बहुत ही दुःख की बात है।

आज की यह आवश्यकता है कि जितने भी जैन धर्मानुयायी बचे हैं वे सब एकजुट हों, कम से कम अजैनों के लिए तो एकजुट हों ही; कौन श्वेताम्बर हैं, कौन दिगम्बर या कौन बीसपंथी हैं, या कौन तेरहपंथी, यह हम आपस में निर्णय करते रहेंगे। इसके बावजूद भी हमें एकता का परिचय देना होगा। जहाँ-जहाँ मुकदमे चल रहे हैं-चाहे श्वेताम्बर या दिगम्बर के बीच हों या चाहे तेरहपंथ और बीसपंथ के बीच, इन्हें अविलम्ब समाप्त कर देना चाहिए। ऐसा न हो कि हम लोगों के आपसी झगड़े के कारण कोई तीसरा हमारे तीर्थों को हड़प ले। दोनों पक्षों में जो भी मुकदमे में सरैण्डर करेगा, मेरी दृष्टि में यह उसकी जैन धर्म के प्रति एक सच्ची सेवा होगी। वह हारा नहीं है बल्कि बड़े दिलवाला है और जैन तीर्थ बचाने के लिए आगे आया है। मेरी दृष्टि में वह अधिक सम्मान का हकदार है।नित नये तीर्थों का निर्माण हो रहा है. अच्छी बात है लेकिन इनका निर्माण हमारे पुराने तीर्थों की कीमत पर नहीं होना चाहिए। हमारी जनशक्ति तो सीमित है ही, धनशक्ति भी सीमित है। अतः इस बात को ध्यान में रखकर ही नये तीथों का निर्माण होना चाहिए। पुराने तीर्थ हमारी संस्कृति और श्रद्धा के प्रतीक हैं, अतः पहले पुराने तीर्थों की रक्षा के बारे में सोचें. बाद में नये तीर्थों का निर्माण हो।

जब तक जैन धर्म के मानने वाले रहेंगे तथा जब तक हमारी संस्कृति और श्रद्धा के प्रतीक हमारे प्राचीन तीर्थ सुरक्षित रहेंगे तभी तक जैन धर्म भी रहेगा। यदि जैन धर्म मानने वाले ही नहीं बचेंगे तो जैन धर्म कैसे बचेगा। इन्हीं बातों को ध्यान में रखकर निम्न बिंदुओं की ओर मैं जैन समाज व जैन संतों का ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ, वैसे और भी अनेक बिंदु हो सकते हैं। हम सभी जैन संगठित हों तो शायद हम जैनधर्म का और अधिक प्रचार कर सकते हैं। जैन धर्म की यह एक सच्ची सेवा होगी।

(1) कसार – इन्हें अजैन होने से बचा लें

पिछली जनगणना के आधार पर जैनों की सबसे अधिक जनसंख्या महाराष्ट्र में है। साथ ही यह भी सही है कि सबसे अधिक गरीब व पिछड़े जैन भी इसी राज्य में हैं। यहाँ की अति गरीब जैन जातियों में कसार, चतुर्थ, पंचम व श्री श्रीमाल हैं। श्री श्रीमाल जाति के लोगों की जनसंख्या लगभग दस हजार है। कसार जाति के जैन लोगों की जनसंख्या पहले अस्सी हजार थी, लेकिन वर्तमान में कसार जैन लगभग 20 हजार ही रह गये हैं। जहाँ तक इनके व्यवसाय की बात है, इनमें से अधिकतर दिहाड़ी मजदूरी करते हैं। नांदेड के डॉ. शरदचन्द्र जी ने बताया कि चतुर्थ व पंचम की स्थिति अपेक्षाकृत ठीक है। इन जाति के लोग खेत मजदूरी करते हैं इससे इनका काम चल जाता है। लेकिन कसार जाति के लोगों की स्थिति इतनी अच्छी नहीं है। ये लोग हाथ-लारी में या सिर पर रखकर बर्तन बेचते हैं, कुछ लोग चूड़ी बेचने का काम भी करते हैं। कुछ वर्षों पूर्व तक कसार जाति के लोगों की संख्या लगभग 80 हजार थी। इनकी गरीबी का लाभ उठाकर कुछ हिन्दू संगठनों ने इन्हें अपनी और आकर्षित किया, कुछ आर्थिक मदद भी की और उन्हें वैष्णव बना लिया। इस प्रकार लगभग 50 हजार लोगों को वैष्णव बना लिया गया है। जो कसार अब भी जैन हैं उन्हें निरन्तर वैष्णव बनने के लिए लुभाया जाता है। नित नए प्रलोभन दिए जाते हैं वैष्णव धर्म अपनाने के लिए। चूँकि कसार वैष्णव पहले से कुछ अच्छी स्थिति में हो गये हैं, अतः कसार जैनों का इस ओर आकर्षित होना स्वाभाविक है।

डॉ. शरदचन्द्र जी ने बताया कि कुछ जैन-कसारों ने अब छोटा-मोटा निजी व्यवसाय – दुकान आदि करना शुरू कर दिया है। ये लोग मिलकर कसार जैनों के लिए कुछ-कुछ करते रहते हैं, लेकिन वह काफी नहीं है यदि भारतवर्ष की जैन समाज ने कसार जैनों की ओर ध्यान नहीं दिया तो कुछ समय बाद इन बचे हुये जैनों का वैष्णव बनना तय है।

हम जैन संतों के नेतृत्व में प्रतिवर्ष करोड़ों रुपये धार्मिक आयोजनों, भवन निर्माणों पर खर्च करते हैं, वह भी प्रभावना के नाम पर। क्या कोई जैन संत / महात्मा या धर्मात्मा कसार जैसी जैन जातियों के स्थितिकरण और उत्थान करने के लिए आगे आयेगा?

(2) नवरात्रि महोत्सव और जैन

नवरात्रि महोत्सव पूरे देश में जोर-शोर से चल रहा है। माँ अंबे और माँ दुर्गा की मूर्तियाँ जगह-जगह स्थापित की गई हैं। गरबा डांस की धूम है। नव-युवक तथा नव-युवतियों रंग-बिरंगे कपड़ों में सजे-धजे इन कार्यक्रमों को और अधिक मनमोहक बना देते हैं। इस चकाचौंध में हमारे जैन युवक-युवतियां भी आकर्षित हुये बिना नहीं रहते हैं तथा वे भी पूरे जोर-शोर से इनमें हिस्सा लेते हैं। यदि प्रतिभागी कीतरह किसी प्रतियोगिता में हिस्सा लेते हैं, वहाँ तक तो ठीक है, लेकिन नवरात्रि में देवी-देवताओं की आराधना, उनके नाम पर उपवास तथा शुभकामना संदेश आदि एक दूसरे को भेजना उचित नहीं है। अधिक अफसोस तो तब होता है जब कुछ जैन संत भी नवरात्रि पर्व मनाने की सलाह दे देते हैं। क्या यह धीरे-धीरे अजैन बनने की प्रक्रिया नहीं है? क्या साधु-संत व विद्वान् नवयुवकों व युवतियों को इस प्रकार का उपदेश देंगे जिससे वे अजैन न बनें।

(3) उदयगिरि खण्डगिरि – इन्हें बचा लो

उड़ीसा की राजधानी भुवनेश्वर के निकट उदयगिरि-खण्डगिरि के नाम से प्रसिद्ध एक अति प्राचीन जैन तीर्थ है। इस क्षेत्र का संबंध कलिंग नरेश खारबेल से पहले का है। यहाँ की गुफा में णमोकार मंत्र के दो पद लिखे हुये हैं। यहाँ का कुछ हिस्सा पुरातत्व विभाग के अधीन है। कई हिस्सों में हिन्दू साधुओं ने कब्जा कर रखा है। मैं यहाँ लगभग दो वर्ष पूर्व गया था। यहाँ की प्रायः सभी गुफाओं में जैन तीर्थंकरों की मूर्तियाँ हैं। मैं यह देखकर हैरान रह गया कि एक गुफा पर तो हिन्दुओं ने पूरा कब्जा कर रखा है। तीर्थंकर मूर्ति को देवी का रूप दे दिया गया है। अन्य गुफाओं में भी तीर्थंकर मूर्तियाँ हैं। इनमें से कई को हिन्दू साधुओं ने अपनी धर्मशाला बना लिया है। यहाँ जैनों की संख्या बहुत कम है। अतः इन तीर्थों की रक्षा का दायित्व किसी राष्ट्रीय नेतृत्व को लेना होगा। मैंने यह महसूस किया कि यहाँ की स्थिति इस प्रकार से नहीं बिगड़ी है जिस प्रकार गिरनार की बिगड़ गई है। यहाँ अपेक्षाकृत गरीबी भी बहुत है। यदि यहाँ के पण्डों को कुछ धन दिया जाय तो वे इस क्षेत्र को खाली भी कर सकते हैं। मेरे हिसाब से अभी स्थिति को नियंत्रण में लिया जा सकता है। हम सभी को इस तीर्थ को बचाने के लिए यथायोग्य प्रयास करना चाहिए। ध्यान रहे यह तीर्थ ईसा पूर्व का है तथा यह ही एक मात्र प्राचीनतम स्थल है जहां णमोकार मंत्र का शिलालेख है।

(4) टीवी पर आपसी विरोध के स्वर

जब से टेलीविजन का जमाना आया है एक क्रांति सी आ गई है। जहाँ एक और इसके कई लाभ हैं वहीं कुछ हानि भी हैं। जैन प्रोग्रामों का लाभ घर बैठे मिल जाता है। जैन संतों की वाणी सुनने को मिल जाती है। धर्म की बहुत प्रभावना होती है लेकिन लाइव प्रोग्राम में एक दिक्कत यह रहती है कि उसे एडिट नहीं किया जा सकता है। जो कुछ बोला जाता है, तुरन्त प्रसारित हो जाता है।

हम सभी जानते हैं कि जैन धर्म में अनेकों सम्प्रदाय हैं। प्रत्येक की अपनी-अपनी मान्यताएं हैं। आपस में कई सैद्धान्तिक विरोध भी हैं। मेरा निवेदन संतों से है कि वे कृपया लाइव टेलीकास्ट में कुछ भी ऐसा न बोलें जिससे अजैनों के बीच यह संदेश जाय कि जैन आपस में लड़ते रहते हैं। और फिर वे इस बात का फायदा उठाकर अपने तीर्थों को हथियाने लगें।

हमारे आपस में कितने भी सैद्धान्तिक मतभेद हों, पब्लिक में, अजैनों के बीच तो हम एक दिखें। यदि हम ऐसा नहीं करते हैं तो निश्चित ही जैन धर्म का बहुत नुकसान हो जायेगा। यह ध्यान रखें कि कहीं प्रभावना की जगह अप्रभावना न हो जाय। विरोधी स्वरों के कारण युवा जैनों में भी धर्म के प्रति अरुचि होने लगती है। वे सोचते हैं कि टी.वी. पर या तो संत एक दूसरे की बुराई करते रहते हैं या फिर क्रियाकांड दिखाया जाता है।

(5) चुनावी मौसम

सन् 2029 में लोकसभा के चुनाव होने वाले हैं। कुछ राज्यों के चुनाव भी आने वाले हैं। अतः आमजन को लुभाने के लिए सभी पार्टियों के नेता व उम्मीदवार हमारे संतों के चक्कर लगाने लगेंगे। हमारे संत भी आशीर्वाद तो सब को देते ही हैं। लेकिन जो लोग नेताओं को जैन संतों का आशीर्वाद प्राप्त कराने लायें उनसे एक निवेदन है कि वे लोग इन नेताओं से एक प्रश्न अवश्य पूछें कि हम जैनों के हित में अबतक क्या किया है और आगे क्या करने की योजना है। क्या ये नेता लिखित में देंगे कि वे गिरनार और शिखर जी को अजैनों से मुक्त करवाएंगे? उन्होंने अब तक क्या प्रयास किये हैं? शाकाहार के प्रचार के लिए उनके पास क्या योजना है? अन्यथा राजनेताओं का संतों से मिलना दिखावा मात्र ही माना जायेगा।

प्रायः देखा गया है कि जब भी चुनाव आते हैं एक नया कत्लखाना खुलने की घोषणा हो जाती है। अभी हाल में whatsapp पर एक पेपर की कटिंग देखी थी। उसके अनुसार भोपाल में एक कत्लखाना प्रस्तावित है। इससे पहले एक कत्लखाना चित्तौड़गढ़ में खुलने की बात भी थी। मांस निर्यात दिन-प्रतिदिन यूँ ही नहीं बढ़ रहा है। उसके लिये योजनाबद्ध कार्यक्रम हैं, ऐसा प्रतीत होता है। इस बात का भी हमें ध्यान रखना चाहिए।

जैन बचेंगे, जैन तीर्थं बचेंगे तभी जैन धर्म भी सुरक्षित रहेगा। उचित कार्यवाही के लिए शीघ्रता करें, कहीं देर न हो जाय।

डॉ. अनिल कुमार जैन
जयपुर
Mob: 9925009499

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