श्री पल्लीवाल जैन डिजिटल पत्रिका

अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

(पल्लीवाल, जैसवाल, सैलवाल सम्बंधित जैन समाज)

अण्डा : क्या यह अहिंसक है ?

अण्डे दो प्रकार के होते हैं: एक वे, जिनसे बच्चे निकल सकते हैं, तथा दूसरे वे, जिनसे बच्चे नहीं निकलते। दूसरे प्रकार के अण्डों को ‘कुड़क-अण्डा’ भी कहते हैं। मुर्गी यदि मुर्गे के संसर्ग में न आये तो भी वह जवानी में अण्डे दे सकती है। इन अण्डों की तुलना स्त्री के रजःस्राव से की जा सकती है। जिस प्रकार स्त्री के रजोधर्म (मासिक धर्म) होता है, उसी तरह मुर्गी के भी यह धर्म अण्डों के रूप में होता है; अतः यह अण्डा मुर्गी की आन्तरिक गन्दगी (मैल) का ही परिणाम है। आजकल इन्हीं अण्डों को अहिंसक, शाकाहारी, वेज आदि कई भ्रामक नामों से पुकारा जाता है। इस प्रकार के अण्डे पाने के लिए देश में हजारों-हजार ‘उत्पादन केन्द्र’ स्थापित किये गये हैं। सरकार भी इस कार्य को प्रोत्साहित करती है तथा इसके लिए धन उपलब्ध कराती है। विभिन्न उत्पादन केन्द्रों (पौल्ट्री फार्मों) में इन अण्डों के उत्पादन की जो प्रक्रिया होती है, उसी का वर्णन हम यहाँ कर रहे हैं।

सर्वप्रथम मुर्गी का बच्चा जैसे ही अण्डे से बाहर निकलता है, नर तथा मादा बच्चों को अलग-अलग कर लिया जाता है। इस प्रकार अलग किये गये मादा बच्चों को एक खास प्रकार की खुराक दी जाती है, ताकि ये शीघ्र जवान हो जाएँ। इन्हें बल्ब के प्रकाश में चौबीसों घण्टे रखा जाता है, जिससे ये सो न पायें तथा रात-दिन खाते ही रहें। इस तरह इन्हें बहुत कम आराम मिल पाता है।

जैसे ही मुर्गी अण्डा देने लायक हो जाती है, या यूं कहें कि जैसे ही वह रजःस्राव करने लगती है, उसे ज़मीन के बदले तंग पिंजरों में रख दिया जाता है। एक पिंजरे में कई-कई मुर्गियाँ रखी जाती हैं। यहाँ इन्हें इतनी कम जगह मिलती है कि ये पंख भी नहीं फड़फड़ा सकतीं। तंग जगह में रहने से वे गुस्सा करती रहती हैं तथा आपस में ही चोंचें मारती रहती हैं। कभी-कभी इन्हें गहरे घाव भी हो जाते हैं और वे मर भी जाती हैं। इनकी चोंचों में छेद पड़ जाते हैं। जब मुर्गियाँ अपनी चोंचें पिंजरे की जाली से बाहर निकालती हैं, तब चोंचें उनमें फँस जाती हैं। इससे उन्हें बहुत कष्ट होता है।

जमीन के बदले मुर्गी को जाली (पिजरे) में रखने का मुख्य कारण यह है कि अण्डा जाली में से किनारे पड़ कर अलग हो जाता है। मुर्गी की प्राकृतिक भावना इन अण्डों को सेने की होती है। ऐसा करने देने से उन्हें अगला धर्म-स्राव देर से होता है, यानी अण्डा देर से पैदा होता है, किन्तु यदि वह अण्डा नहीं सेती है तो वह अगला अण्डा जल्दी देती है; अतः अधिक अण्डे पाने की लालसा से मुर्गी को अण्डे सेने का मौका नहीं दिया जाता है; इस प्रकार मुर्गी जिंदगी-भर पिंजरे में कैद रहती है। वह उस तंग पिंजरे में जरा भी चल-फिर नहीं सकती है; परिणाम स्वरूप उसकी टांगों में दर्द बना रहता है तथा कई बार वे बेकार हो जाते हैं। प्राकृतिक रूप से मुर्गी जितने अण्डे (धर्म-स्राव) देती है, उससे अधिक अण्डे पाने के उद्देश्य से उसे ख़ास किस्म का आहार दिया जाता है, जिसमें सामान्यतः पिसी हुई सुखी मछलिया, संगमरमर,खडिया के छोटे छोटे टुकडे तथा खराब किस्म की घुन वाली मकई (मक्का) आदि होती हैं। जब मुर्गी कम अण्डे देने लगती है, तब उसकी उपयोगिता भी घट जाती है। तब उसे कत्लखाने में भेज दिया जाता है। इस प्रकार क्रूरतापूर्ण तरीके से मुर्गियों को विभिन्न यंत्रणाएँ देने के बाद जो अण्डे प्राप्त होते हैं, उन्हें भला अहिंसक कैसे कहा जा सकता है? जिन्हें पाने के लिए मुर्गियों को जबरन मछलियां खिलायी जाती हैं, वे शाकाहार कैसे हो सकते हैं? जो लोग इन अण्डों की अहिंसक, या शाकाहारी कहते हैं वे आम जनता को तो भ्रमित करते ही हैं, स्वयं की भी धोखा देते हैं।

ध्यान रहे, अंडा कोशिय संरचना है, चाहें वह निषेचित हो या अनिषेचित। पचेंद्रिय जीव के किसी भी कोशिय अंश का भक्षण करना मांस खाने के तुल्य है।

डॉ. अनिल कुमार जैन
D-197, मोती मार्ग, बापू नगर, जयपुर
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Ph: 9925009499

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