अन्य दर्शन क्रियाकांड की बात करते है जबकि भगवान महावीर आत्म हित के हेतु प्रेरित करते हैं, वे कहते है – हे भव्य जागो! सावधान हो जाओ ! कुंभकरण तो कम से कम 6 महिने ही सोता था। परन्तु जिसने अपनी आत्मा को नहीं जाना वह तो वर्षो वर्ष तक सोता ही रहता है। एक-एक दिन करके वर्ष और वर्षों-वर्ष करके भव के भव निकल जाते है। और 1-1 भव करके अनादि काल अनंत काल निकल जाता है! और आत्मा जाग ही नहीं पाती, सोती ही रह जाती है। अतः दयालु आचार्यगण बड़े वात्सल्य भाव से मां की तरह समझाते है कि बेटा! कब तक मिथ्यात्व की गहरी निंद्रा में सोते रहोगे, उठो – जागो ! देखो सम्यक्त्व का सूर्योदय हो गया है आत्म जागरण करो और बढ़े चले मुक्ति पथ की ओर। वे बाह्य में महाव्रतों को धारण करने की प्रेरणा देते है और अंतरंग के स्वरुप स्थितिकरण की प्रेरणा देते है कि अपनी आत्मा को निहारो और उसी में स्थिर हो जाओ। बाहर की दुनियाँ की सैर तो तुमने अनादि काल से बहुत की है। अब अन्दर की दुनियाँ में भी प्रवेश करो। बाहर ही घूमते रहोगे तो अन्दर के द्वारों में प्रवेश संभव नहीं। जो बाहर की उपेक्षा कर देता है और दृष्टि को अंतर में रखता है वह अंतर के द्वारों से प्रवेश कर आत्मस्वरुप में पहुँच जाता है। फिर बाहर की यात्राएँ स्थगित हो जाती है और अंदर की सैर प्रारम्भ हो जाती है और आत्मा अनंत गुणों का उद्भावन कर लेती है।
जीवन का हर क्षण मूल्यवान है, कीमती व दुर्लभ है। हर प्राणी जीवन जीता है क्षुद्र से क्षुद्र प्राणी जीवन जी लेते है। परन्तु खाना-पीना, सोना-रोना, कमाना-धमाना मात्र इतना ही पर्याप्त नहीं। क्योंकि ऐसा तो हर प्राणी कर लेता है मनुष्य जीवन मिला है तो कुछ अच्छा कार्य करना चाहिए। एक सज्जन बोले महाराज ! मेरे पास तो फुर्सत ही नहीं घर, गृहस्थी, दुकान मकान में व्यस्त हूँ और समय बचा तो ताश के पत्ते है। मैंने कहा समय बिताना या व्यस्त रहना मात्र महत्वशाली नहीं अपितु अच्छे कार्यों को कितना किया परमात्मा की भक्ति, पूजन, जप किया कि नहीं। मात्र लौकिक कार्य सच्चे सुख को पाने पर्याप्त नहीं। आम का फल चाहिए तो बीज भी आम के बोने पड़ेगे। बबूल के बीजों से काटे ही मिलेगे फूल नहीं। ताश के पत्ते दुःख ही देगे। सुख नहीं। यदि सुख चाहिए तो भगवत् भक्ति करना ही होगी। इसीलिए माँ को कहा जाता है हे माँ! तू अपने बच्चे को अच्छे संस्कार दे दे ताकि वह एक अच्छा इंसान ही नहीं अपितु भगवान भी बन जाये क्योंकि –
“A Good mother is better than Hundered teachers.”
एक अच्छी संस्कारवान माँ 100 टीचर्स से बड़ी है। बालकों की प्राथमिक पाठशाला माँ की अंगुली है जिसके सहारे चलकर वह मन्दिर के द्वारे तक पहुँचता है। जीवन की ABCD माँ से सीखता है माँ कहती है बेटा अपने से बड़ो के पैर छूना चाहिए, श्री व जी का प्रयोग करना चाहिए। आप कहकर बोलना चाहिए। माँ लोभ भी देती है तू मेरी बात मानेगा तो लड्डू दूंगी। बेटा लड्डू के लालच में सब स्वीकार लेता है। बेटा, माँ के दिये लालच में आकर स्कूल जाना सीख जाता है। और एक बार सुसंस्कार आ जाता है तो बच्चा बिना कहे ही पढ़ता-लिखता है। और ऐसा संस्कार वान बालक बड़ो के नाम के आगे बिना कहे ही आदरवाचक शब्दों का प्रयोग करता है। जहाँ संस्कार विहीनता हो वहाँ श्री, जी की जगह Hi, Hello, चलता है। और पाश्चात्यता की ओर झुकती संस्कृति उस संस्कार विहीनता की संस्कृति को स्वीकारती जा रही है। यदि ऐसा ही चलता रहा तो माता-पिता का सम्मान गिर जायेगा और नौकरो जैसी अवस्था आपकी हो जायेगी। अतः समय रहते ही जागिये! आँखों पर पड़े पाश्चात्यता के चश्में को उतारिये और भारतीय संस्कृति की आँखों से भारत को निहारिये। तब तो संस्कृति सुरक्षित रह सकती है अन्यथा संस्कृति खतरे में पड़ जायेगी। एक पुण्यानुबंधी पुण्य होता है पुण्य के उदय से सुन्दर संस्कृति में जन्म लिया और पुण्य को पुण्य में लगाना यानि संस्कृति को कायम रखना। संस्कारवान देश में जन्म लिया तो उन संस्कारों को कायम रखिये। यही संस्कारों को पाने की उपलब्धि है।