सम्यक्त्व का स्वरूप
विभिन्न दृष्टियों से सम्यक् दर्शन के विभिन्न लक्षण बताये हैं। यथा –
1. परमार्थभूत, देव, शास्त्र और गुरु पर तीन मूढ़ता और आठ मदों से रहित तथा आठ अंगों से युक्त होकर श्रद्धा करना।
2. तत्त्वों पर श्रद्धा करना
3. स्व पर का श्रद्धान करना
4. आत्मा का श्रद्धान करना
इन लक्षणों में तत्त्वार्थ श्रद्धान रूप लक्षण सभी में दृष्टिगोचर होता है, क्योंकि जीव की शुद्ध अवस्था ही देव है। सच्चे गुरु तो साक्षात् संवर निर्जरा की प्रतिमूर्ति हैं। शास्त्र रत्नत्रय रूप सच्चे धर्म का अधिष्ठान हैं। सच्चा धर्म अजीव, आस्रव और बन्ध इन तत्वों से हटकर जीव के संवर और निर्जरा तत्त्वों की ओर झुकने का नाम है। इसका फल मोक्ष है। अतः सच्चे देव, शास्त्र व गुरु की श्रद्धा व सात तत्त्वों की श्रद्धा एक ही बात है।
जीव, अजीव, आस्रव, बन्ध, संवर, निर्जरा और मोक्ष ये सात तत्त्व हैं। जिनमें जीव स्व तत्त्व है। अजीव, आस्रव और बन्ध ‘पर’ हैं। संवर और निर्जरा स्व के साधन मोक्ष जीव का स्वाभाविक रूप है। अतः स्व-पर का श्रद्धान रूप लक्षण भी इन सात तत्त्व वाले लक्षण में समाहित हो जाता है। आत्मा का श्रद्धान रूप लक्षण का अर्थ है। आत्मा के समस्त अजीव, आस्रव, बन्ध आदि वैभाविक भावों से रहित अवस्था का श्रद्धान करना। उसमें भी सात तत्त्वों वाला लक्षण गर्भित हो जाता है।
सम्यक् दर्शन के साधन
सम्यक् दर्शन के होते ही ऐसी भेदक दृष्टि प्राप्त हो जाती है जिससे तत्त्वों की श्रद्धापूर्वक शरीर से आत्मा की पृथक् सत्ता का भान होने लगता है। आत्मसत्ता की आस्था और स्वरूप विषयक दृढ़ निश्चय हो जाने से मैं कौन हूँ? क्या हूँ? इसका प्रतिभास होने लगता है। जड़ चेतन की इसी पारखी दृष्टि को भेद-विज्ञान कहते हैं। जब तक ऐसी दृष्टि प्राप्त नहीं होती तब तक यह जीव मिथ्यात्वी कहलाता है। अनादि काल से यह जीव मिथ्यात्व से ग्रसित है। शरीर की उत्पत्ति से ही अपनी उत्पत्ति तथा शरीर के विनाश को ही अपना विनाश समझता आ रहा है। इस देहात्म बोध के छूटने पर ही सम्यक्दर्शन का प्रादुर्भाव होता है। आत्मबोध की इस प्रक्रिया को ग्रन्थि भेद कहते हैं, जो सांसारिक प्रवाह में कभी किसी समय पर विविध कारणों के मिलने पर उत्पन होता है। किन्हीं जीवों को यह अकस्मात् ‘घर्षण घोलन-न्याय’ से प्राप्त हो जाता है। (जिस प्रकार प्रवाह पतित पाषाण-खण्डों के परस्पर घिसते रहने से नाना प्रकार के आकार यहाँ तक कि देव मूर्ति बन जाती है।) कुछ जीवों को विशिष्ट निमित्त के मिलने से सम्यक् दर्शन की प्राप्ति हो जाती है। सम्यक् दर्शन प्राप्ति के प्रमुख हेतु इस प्रकार हैं-‘
1. जातिस्मरण – पूर्व के जन्मों का स्मरण ।
2. वेदनानुभव – तीव्र-दुःख संवेदन।
3. धर्मश्रवण – निर्ग्रन्थ मुनियों एवं सत् शास्त्रों के श्रवण से उत्पन्न तत्त्व-बोध।
4. जिन बिम्ब दर्शन – वीतरागी मुनियों तथा जिनबिम्ब दर्शन।
5. जिनमहिमा दर्शन – धर्म महोत्सवों का दर्शन।
ये सम्यक् दर्शन के बाह्य हेतु हैं। सम्यक्त्त्व का अन्तरङ्ग हेतु दर्शन मोहनीय और अनन्तानुबन्धी कषाय का क्षय, उपशम या क्षयोपशम है, जो कि मोह-ग्रन्थि भेद की प्रक्रिया द्वारा सम्पादित होता है।
सम्यक् दृष्टि की प्रवृत्ति
सम्यक् दृष्टि विषय भोगों से निर्लिप्त रहता है। उसकी वृत्ति कमल के समान होती है। जैसे जल के बीच रहने वाला कमल जल से सदा निर्लिप्त रहता है, उसी प्रकार सम्यक् दृष्टि भोग और विषयों के मध्य रहते हुए भी उनके प्रति गहन आसक्ति नहीं रखता। वह संसार, शरीर और भोगों से उदासीन रहता हुआ सच्चे देवशास्त्र और गुरु को अपने जीवन का आदर्श मान, उनके प्रति सच्ची श्रद्धा रखता है। सच्चे देव, शास्त्र और गुरु की उपासना से सम्यक्त्त्व में निर्मलता आती है। इसलिए सम्यक्त्त्व की उत्पत्ति के लिए सच्चे देव, शास्त्र और गुरु के प्रति सच्ची श्रद्धा की बात की जाती है। प्रत्येक मुमुक्षु को सच्चे देव, सच्चे शास्त्र और गुरु की पहचान कर उन पर सच्ची श्रद्धा रखनी चाहिए। अतः उनके स्वरूप का ज्ञान होना भी आवश्यक है।
देव-शास्त्र और गुरु का स्वरूप
देव- सच्चे देव की तीन विशेषताएँ हैं। सर्वज्ञता, वीतरागता और हितोपदेशिता।’ अतः जिनके अन्दर-बाहर, राग-द्वेष और मोह का लेशांश भी न हो वे ही हमारे देव हैं। वीतरागी होने से अस्त्र, शस्त्र, वस्त्र और अलंकरण से रहित परम शान्त मुद्रा ही सच्चे देव का स्वरूप है। राग-द्वेष मोह का समूलोच्छेद हो जाने के कारण उनके विकारों का सर्वनाश हो जाता है। वे सर्वज्ञ और सर्वदर्शी हो जाते हैं। सर्वज्ञ और वीतरागी होने के कारण वे जो उपदेश देते हैं, वह सबके कल्याण के लिए होता है। उनका उपदेश किसी वर्ग विशेष के लिए न होकर प्राणिमात्र के लिए होता है। इसलिए उन्हें परम हितोपदेशी कहते हैं। इस प्रकार वीतरागता, सर्वज्ञता और हितोपदेशिता ही सच्चे देव का स्वरूप है। ये ही तीर्थंकर, अरिहन्त और परमात्मा कहलाते हैं।
शास्त्र– आज लोक में अनेक प्रकार के शास्त्र प्रचलित हैं। अलग-अलग विषयों के अलग-अलग साहित्य-भण्डार हैं। अब प्रश्न उठता है इस विपुल भण्डार में कौन से शास्त्र हैं जो हमारे हित के कारण हैं तथा जिन्हें सत्यशास्त्र कहा जा सके ? सत्य को उपलब्ध व्यक्ति द्वारा रचित शास्त्र ही सत् शास्त्र हो सकते हैं। राग-द्वेष और मोह से ग्रसित प्राणी असत्य वाणी का प्रयोग करता है। असत्यवाणी हमारे लिए हितकर नहीं है। अतः राग-द्वेष से रहित व्यक्ति द्वारा रचित शास्त्र ही सत् शास्त्र की कोटि में आते हैं। इसलिए सम्यक् दृष्टि साधक आप्त-वीतरागी पुरुषों द्वारा रचित शास्त्रों को ही सत् शास्त्र मानता है। कहा भी गया है। “वक्तुः प्रामाण्याद् वचन-प्रामाण्यम्” अर्थात् वक्ता की प्रामाणिकता से वचनों में प्रामाणिकता आती है। क्या बोला जा रहा है? यह उतना महत्त्वपूर्ण नहीं है जितना कि कौन बोल रहा है, यदि वक्ता अप्रामाणिक है तो वह मिश्री में जहर की तरह अपनी मीठी वाणी में अहितकर उपदेश भी दे सकता है। वक्ता के प्रामाणिक होने पर किसी प्रकार का अविश्वास नहीं रहता। इसे निम्न उदाहरण से समझा जा सकता है-
मान लीजिए एक सज्जन ऐसे जंगल में फँस गये जहाँ कोई मार्ग नहीं सूझता हो। सोचकर निकले किसी गाँव तक पहुँचने का, पर बीच में ही भटक गये। अनेक पगडंडियाँ फूटी हैं। असमंजस की स्थिति में खड़े हैं कि किधर चलें? तभी देखते हैं कि सामने से घुटनों तक मैली-कुचैली धोती पहने, अर्द्धनग्न बदन, बिखरे बालों वाला, काला-कलूटा, भीमकाय व्यक्ति चला आ रहा है। देखते ही मन भयाक्रान्त हो उठता है। फिर भी जैसे-तैसे साहस बटोरकर उससे पूछा भी, तो उसने ऐसा कर्कश उत्तर दिया मानो खाने को ही दौड़ता हो। ‘रास्ता भूल गया है…. मार्ग नहीं जानता था तो क्यों आया यहाँ पर…. तेरे बाप का नौकर हूँ क्या? चला जा अपनी दायीं ओर….!’ आप ही बतायें उसके बताये मार्ग पर उस सज्जन के कदम कभी भी बढ़ेंगे? वे रात्रि वहीं बिताने को तैयार हो सकते हैं, मगर उस व्यक्ति के द्वारा इंगित दिशा पर एक कदम भी चलने का साहस नहीं कर सकेंगे।
अब वे सज्जन निराश खड़े हैं। तभी देखते हैं कि सामने से भव्य आकृति वाला मनुष्य चला आ रहा है। धोती दुपट्टा पहने, हाथ में कमण्डल लिये, माथे पर चन्दन का तिलक लगाये, मुख से प्रभु के गीत गुनगुनाता, वह दूर से ही कोई भद्र पुरुष प्रतीत हो रहा है। पास आने पर उन्होंने उसे नमस्कार किया, प्रत्युत्तर में उसने भी नमस्कार किया। मार्ग पूछने पर उन्होंने कहा, ‘बड़े भाग्यवान् हो पथिक ! जो अब तक सुरक्षित बचे हो। यह वन ही ऐसा है। यहाँ अनेक पथिक प्रतिदिन भटक जाते हैं। खैर, घबराने की कोई बात नहीं अभी दिन ढलने में समय शेष है, तुम्हारा गाँव भी ज्यादा दूर नहीं। दांयी ओर जाने वाली इस पगडंडी से निकल जाओ। करीब एक मील आगे जाने पर एक नाला पड़ेगा, उसे पार करके उसके दांयी ओर मुड़ जाना, करीब आधा मील और चलोगे तो तुम्हें खेत दिखाई पड़ने लगेंगे। उन खेतों के बगल से बायीं ओर एक पगडंडी जाती है, उसे पकड़कर सीधे चले जाना, करीब एक मील चलने पर अपने गाँव पहुँच जाओगे। कल्पना कीजिए क्या इस व्यक्ति की बात पर आपको विश्वास नहीं होगा? सहज ही आप उसकी बात का विश्वास कर लेंगे तथा उसे धन्यवाद ज्ञापित करते हुए आपके कदम अनायास उस दिशा में बढ़ जाएँगे। कही तो दोनों ने एक ही बात थी। पर पहले व्यक्ति के अप्रामाणिक होने से उसके वचनों पर विश्वास नहीं हुआ तथा दूसरे की प्रामाणिकता ने सहज ही उस पर विश्वास उत्पन्न करा दिया। इसलिए कहा गया है कि वक्ता की प्रामाणिकता से वचनों में प्रामाणिकता आती है।
सत्य शास्त्र आप्त प्रणीत होने के साथ-साथ उनमें कुछ और भी विशेषताएँ होती हैं। यथा वह पूर्वापर विरोध से रहित हो। दूसरों की युक्तियों एवं तर्कों से उसका मूलभूत सिद्धान्त अखण्डनीय हो। प्राणि-मात्र का हितकारी हो। प्रयोजन भूत बातों का कथन हो तथा वह उन्मार्ग का नाश करने वाला हो, तभी वह सत्य शास्त्र की कोटि में आ सकता है। इसके विपरीत रागी द्वेषी व्यक्तियों द्वारा लिखे जाने वाले शास्त्र कुशास्त्र की कोटि में आते हैं।’
गुरु – गुरु का मोक्ष-मार्ग में महत्त्वपूर्ण स्थान है। गुरु हमारे मार्गदर्शक हैं। देव आज हैं नहीं और शास्त्र मौन है। ऐसी स्थिति में गुरु ही हमारे सहायी होते हैं। गुरु के अभाव में हम शास्त्र के रहस्यों को भी नहीं समझ सकते। जैसे समुद्र का जल खारा होता है। हम उसमें नहा भी नहीं पाते और न ही उससे हमारी प्यास बुझती है, लेकिन वही जल सूर्य के प्रताप से वाष्पीकृत होकर बादल बनकर बरसता है तो वह मीठा और तृप्तिकर बन जाता है। हम आनन्द के साथ उस जल में अवगाहित होते हैं। वैसे ही शास्त्र भी अगम समुद्र की तरह है। हम अपने अल्प-ज्ञान के बल से उसमें अवगाहित नहीं हो पाते। गुरु अपने अनुभव के प्रताप से उसे अवशोषित कर बादल की तरह जब हम पर बरसाते हैं तब हम सहज ही शास्त्रों के मर्म को समझ जाते हैं। महान् तृप्ति और आह्लाद उत्पन्न होता है तथा जो प्रेरणा गुरुओं की कृपा से मिलती है वह शास्त्र और देव से नहीं; क्योंकि गुरु तो जीवित देव होते हैं। शास्त्र और देव-प्रतिमा से लाभ लेने की कला वही सिखाते हैं।
मान लीजिये आपको किसी अपरिचित रास्ते से गुजरना पड़े, तो आप एकदम साहस नहीं जुटा पाते। भय लगता है। पता नहीं आगे यह रास्ता कैसा है? कितनी दुर्गम घाटियाँ हैं? कितने नदी-नाले हैं? कितने मोड़ हैं? कहीं जंगली जानवरों का आतंक तो नहीं? चोर-लुटेरों का दल तो नहीं रहता? बीच में पड़ने वाले गाँवों के लोग पता नहीं कैसे हैं? ऐसी अनेक आशंकाओं से मन भयाक्रान्त हो उठता है। रास्ते का पता लगने के बाद भी पाँव आगे नहीं बढ़ पाते। संयोगतः वहीं कोई आपका चिर-परिचित मित्र मिल जाये और वह आपसे कहे-अरे! यह रास्ता तो बहुत अच्छा है। मैं तो रोज ही यहाँ से आया-जाया करता हूँ। इसके चप्पे-चप्पे से मैं परिचित हूँ। यहाँ कोई कठिनाई नहीं, सड़क अच्छी है। रास्ते में पड़ने वाले गाँव के लोग सभ्य और सरल हैं। आओ मेरे साथ; मुझे भी उधर ही जाना है, तुम्हें अपने साथ ले चलता हूँ। उनकी बात सुनते ही हमारे मन का भय भाग जाता है तथा हमारे कदम सहज ही उस ओर बढ़ जाते हैं।
यही स्थिति गुरु की है। शास्त्र के माध्यम से हम सही मार्ग जान तो लेते हैं, लेकिन अवरोधों के भय से उस पर चल पाने का साहस नहीं जुटा पाते। गुरु कहते हैं ” मार्ग तो बहुत सरल है। मुझे देखो…मैं भी तो चल रहा हूँ। आओ मेरे साथ।” उन्हें देखकर सहज ही आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलने लगती है।
लोक में गुरु भी अनेक प्रकार के पाये जाते हैं। अनेक धर्म हैं और अनेक धर्म-गुरु। इनमें सच्चा गुरु किनको समझा जाये? यह बड़ा ही जटिल प्रश्न है। लौकिक क्षेत्र में तो माता-पिता, अध्यापक आदि गुरु माने जा सकते हैं, किन्तु पारमार्थिक क्षेत्र में किन्हें गुरु माना जाये, हमें यह देखना है। सच्चे गुरु का स्वरूप बताते हुए आचार्यश्री समन्तभद्र ने कहा है-
विषयाशावशातीतो निरारम्भोऽपरिग्रहः।
ज्ञान-ध्यान-तपो रक्तःतपस्वी स प्रशस्यते ।। ‘
“विषय कपायों से रहित, आरम्भ परिग्रहों से परिमुक्त होकर ज्ञान, ध्यान और तप में लवलीन साधु ही सच्चे गुरु हैं। ”
विषयासक्ति रहितता : यह सच्चे गुरु की पहली विशेषता है। विषयाभिलाषा, राग-द्वेष आकुलता की जननी है और पापों में प्रवृत्ति कराने वाली है। पाँचों इन्द्रियों के विषयों के आधीन व्यक्ति कभी भी सत्य का साक्षात्कार नहीं कर सकता। आत्म-कल्याण के पथ पर चलने वाले सच्चे गुरु पञ्चेन्द्रिय विजयी होते हैं। वे पाँचों इन्द्रियों के किसी एक विषय पर भी आसक्त नहीं होते। विषयासक्ति तो साधुत्व पर कलंक है, अतः सच्चे गुरु को पञ्चेन्द्रिय विजयी होना चाहिए।
आरम्भ-रहितता : सच्चे गुरु की यह दूसरी विशेषता है। आरम्भ का मतलब है नौकरी, व्यापार, उद्यम, सेवा, खेती आदि कार्य जो प्राणियों को आसक्ति, तृष्णा, वैर-प्रीति, विषमता और दुःख पहुँचाने वाली प्रवृत्तियाँ हैं। ये कार्य साधारण प्राणियों में भी पाये जाते हैं। मनुष्य इन्हीं के गोरख-धन्धे में फंसकर दुःखी है। अतः इनमें उलझा हुआ व्यक्ति गुरु नहीं हो सकता। इनका पूर्णतः त्याग करके ही गुरुपद पाया जा सकता है।
परिग्रह-रहितता – यह सच्चे गुरु की तीसरी विशेषता है। ममत्व भाव को परिग्रह कहते हैं, जिनके पास बाह्य या भीतरी पदार्थों के प्रति थोड़ा भी ममत्व हो, वे सच्चे गुरु नहीं कहला सकते; क्योंकि ममत्व तो समस्त विकारों का मूल है। पापों में परिग्रह सबसे बड़ा पाप है, इसके होने पर अन्य पापों में प्रवृत्ति अवश्यंभावी होती है। परिग्रह आकुलता का कारण तथा समता व वीतरागता का विनाशक है। इसलिए सच्चे साधु अपने पास कुछ भी परिग्रह नहीं रखते। यहाँ तक कि वे अपने शरीर पर वस्त्र का एक छोटा-सा टुकड़ा भी नहीं रखते।
सतत ज्ञानार्जनशीलता : सतत ज्ञानाभ्यास सच्चे गुरु की चौथी विशेषता है। विषय कषायों से दूर होकर जब साधुगण अपने आत्म-ध्यान से बाहर आते हैं तो सांसारिक प्रपञ्चों से दूर हट धर्मशास्त्रों में अपने चित्त को रमाये रखते हैं। यही उनकी सतत ज्ञानार्जनशीलता है। ज्ञानाभ्यास से चित्त में निर्मलता, समता व वीतरागता की सिद्धि व वृद्धि होती रहती है तथा दूसरों को भी ज्ञान का प्रसाद प्राप्त होता है।
प्रगाढ़ ध्यानलीनता और तपस्या – सच्चे गुरु सदा अपनी आत्मा के ध्यान में लीन रहते हैं। वह अपनी साधना की अभिवृद्धि के लिए शक्ति के अनुसार अनेक प्रकार का तप करते रहते हैं। आत्म-साधक गुरु का तपस्वी होना अनिवार्य है। तप से ही आत्मा में निखार आता है। इसके विपरीत; भोग-विलासों में रत सुविधा-भोगी, नामधारी, गुरु सच्चे गुरु नहीं कहला सकते। तपस्या सच्चे गुरु की छठी कसौटी है।
क्रमश:
मुनिश्री प्रमाणसागरजी महाराज