जब मनुष्य परमात्मा के संविधान के पालन में वाणी के मिठास की बूँदे बिखेरता है, तो वह अपने पूर्वजों के संस्कार-संस्कृति को दर्शाता है। सीमित और संयमी शब्दों को मिठास वाणी में घोलकर पटल पर पेश करता है। तब तालियों की गूँज ही नहीं बल्कि इतिहास एवं आकाशिय मण्डल भी मुस्कराने लगते है।
हे मधुभाषी प्रणेता – जीवन की चेतना उत्साहित होकर फड़फड़ाने लगती है। खुशियों के सूरज का उदय होता हैं, जब माधुर्य वाणी हृदय का द्वार खोलकर मुस्कुराती है, तब अन्तर्मन की कोकिला गाने लगती है। बोलने से पहले शब्दों को तोलना पड़ता है। चिल्लाने से पहले परायों की लकीरें देखनी पड़ती है। वाणी की भाषा निकालने से पहले स्टेज का मूल्यांकन करना पड़ता है ।
जब आप प्रभुजी की प्रार्थना संयम साधना से करते है तो भक्ति की महकती हुई खुशबू आनन्द रस में विलीन होकर वर्तुल रूप से सिद्धालय तक पहुँच जाती है, एक ताप एक चांद एक गगन, एक तल, एक ही आश, से गूँथी हुई भक्ति की प्रार्थना ईश्वर अर्थात् परमात्मा सुनता है, और जब आप संयम साधना से मौन में स्वयं में प्रवेश करते है तब परमात्मा बोलता है आपका अन्तर्मन सुनता है ।
हे भक्ति के नायक– मधुवाणी का दरवाजा खुला रखने से यदि किसी का खून बढ़ता है तो यह भी एक रक्तदान है। यदि आपने मिठास वाणी का पिटारा खोलकर, मुरझाते हुए रोते हुए चेहरे पर खुशियों का ए.टी.एम. का प्रसाद बांटा हो तो यह भी खुशियों का दान है। यदि आपके द्वारा अन्धे लंगड़ों का उपचार, सर्दी से झूझते हुए व्यक्ति का तन ढका हो, पशु-पक्षियों को कभी सहलाया हो या उन पर नम्र कलाई फेरी हो तो आपके तन-मन-धन तीनों गुप्तियों का दान है। वाणी का मिठास एवं अस्तित्व को घोल से सना हुआ दान परमात्मा के संविधान में रिकॉर्ड हो जाता है। वर्तमान के द्वार से भविष्य की पगडण्डी निकलती है।
हे मानवीय जीवन के सह सम्पादकजी – जैन का अर्थ है जिनेन्द्र, जैन के कल्पवृक्षों को इसके आदर्शों को, अस्तित्व तथा मनोयोग की प्रतिक्रियाओं को परिधि में कोई भी नहीं बांध सके, जैन आदि है, अनन्त है तथा आकाश तक ऊँचाई तथा पृथ्वी से भी ज्यादा गहराई है। जब महावीर स्वामी को चण्डकौशिक जहरीले सर्प ने डंक मारा तब प्रभु ने उसे सहलाया और उपदेश दिया यही है गहराई और ऊँचाई। संयम साधना एवं मिठास वाणी का तप ही जैन है ।
हे दयामयी संचालक- करकसवाणी से दूसरों को दुख देने या किसी की विनम्रता की बूँदों का अपहरण करने, किसी के अश्रुओं को झलकाने लगे तो याद रखे विषैली वाणी ऐसी चिन्गारी है जो सीधी मन को आग लगाती है। जीवन के खेल में विषैली वाणी का ढोल मत बजाईए, अमर्यादित गतिविधियों को स्टेज पर मत दौड़ाईए। कर्मों की बैण्ड बजती है, उसे सह नहीं पाओगे । मनुष्य की पहचान कर्मों से है, करकस वाणी से ही त्रेता युग रामायण में सिमट गया, इसी आत्मघात की वाणी से ही द्वापर युग का सूरज महाभारत की शर्म से छिप गया । परमात्मा के संविधान के पेज छः, धारा ग के क्रमांक नं. पर खोजें- अधिक सोच कम बोल, ममता में घोल, मीठा बोल, आपका प्रत्येक दिन उत्सव बनकर खुशियों का सूरज आपके चेहरे को चमका देगा ।
आप, हम, सबका अगला फरमान
मेरा पल्लीवाल महान
छगन लाल जैन
रि. अध्यापक हरसाना वाले
3 / 308 शालीमार अलवर