श्री पल्लीवाल जैन डिजिटल पत्रिका

अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

(पल्लीवाल, जैसवाल, सैलवाल सम्बंधित जैन समाज)

विवाह” नैतिक आदर्श है: समझौता या विकल्प नहीं

शौध लेख

भारतीय संस्कृति के अनुसार विवाह एक नैतिक आदर्श एवं संस्कार माना गया है। जिसका प्रारंभ नाभी राजा ने ऋषभदेव (युगिलिक प्रथा को बंद कर) के पाणिग्रहण की वर्तमान प्रथा को प्रारंभ किया।अवसरपणि काल में प्रथम विवाह ऋषभदेव के साथ सुनंदा (युगगलिक समय की कन्या) तथा सुमंगला के साथ पहले विवाह प्रथा का आरंभ किया, जिसका उद्देश्य काल के प्रभाव से बढ़ती विषय वासना को विवाह संबंध से सीमित कर मानव जाति को वासना भट्टी में गिरने से बचाना था। इससे पूर्व मानव जाति विवाह से अनभिज्ञ थी। इस प्रकार भारतीय संस्कृति मे विवाह को गृहस्थ जीवन का एक पवित्र, महत्वपूर्ण , आदर्श , धार्मिक एवं सामाजिक उत्तरदायित्व के पालन का बहुत बड़ा आधार मान कर प्रारंभ किया गया ।
विवाह का अर्थ विशिष्टता के साथ वहन करते हुए बंधन में बंधे रहना है। इस बंधन में केवल काम भावना नहीं होती , वह किसी उच्च संकल्प एवं उच्च ध्येय से युक्त होता है, उसमें जीवन रथ को उद्दात आदर्शो की ओर गतिशील करने के लिए स्त्री और पुरुष दो अश्वो की भांति जुड़ते हैं और निरंतर अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते जाते हैं। अर्थ एवं काम से मुक्त जीवन को गृहस्थ जीवन माना है किंतु उस जीवन में अर्थ एवं काम का अनियंत्रित प्रसार न हो इसलिए उसे धर्म के बंधन से बांधा गया है और मोक्ष का लक्ष्य सामने रखा गया है । स्वदार संतोष परदार विवरजन रूप मैथुन व्रत का उद्देश्य भी यही बताया गया है। इसीलिए ब्रह्मचर्य व्रत को गृहस्थ जीवन की आधारशिला भी बताया गया है।
भारतीय नीति एवं धर्म ग्रंथो में (धर्मशास्त्र का इतिहास भा. 1/2-270) विवाह के तीन उद्देश्य धर्म संपत्ति ,प्रजा- उत्पत्ति और रति बताए गए हैं। धर्म संपत्ति गृहस्थ जीवन का मूल है। स्त्री धर्म संपादन में पुरुष की सहयोगिनी होती है, उसे धर्म की ओर प्रेरित करती है ,अधर्म मे जाते हुए को रोकती है, इस लिए उसे धर्म सहायिका भी कहा गया है। उपादकदशा सूत्र 7/ 227 मे जहां सकडाल पुत्र की धर्मपत्नी अग्नि मित्रा का वर्णन आया है वहां बताया गया है, वह धम्मसाहइया धम्मविजिया धम्माणुरागरता, समसुह- दुकख सहाइया- अर्थात वह भार्या पति के धर्म में सहायता करने वाली,धर्म की साथी, धर्म में अनुरक्त तथा सुख-दुःख में समान साथ देने वाली थी। उत्तराध्ययन सूत्र मे रानी कमलावती का प्रकरण भी आया है जिसने इषुकार राजा को भृगुपुरोहित का धन ग्रहण करते हुए रोका और प्रतिबोध देकर संयम मार्ग की ओर अग्रसर किया। ऐसी पत्नी वास्तव में मनुष्य की पत्नी ही नहीं सखा भी होती है, मित्र भी होती है। महाभारत के आदि पर्व में तो पत्नी को श्रेष्ठतम मित्र व त्रिवर्ग साधना का मूल भी कहा गया है ।

ऋग्वेद 10/85/ 29 में कहा है- जाया विशते पतिम्-योग्य पत्नी पति में मिल जाती है। अर्थात पति के मन, वचन एवं कर्म के साथ एकाकार हो जाती है । इसलिए तैतिरिया संहिता 6/1/8/5 में स्त्री को अर्धांगिनी कहा गया है। शतपथ ब्राह्मण 5/2/1/10 के अनुसार जब तक पुरुष विवाह नहीं करता उसका गृहस्थ जीवन अपूर्ण रहता है । नीति शास्त्र में कहा गया है कि विवाह का प्रथम उद्देश्य ऐसी स्त्री को जीवन संगिनी बनाना जो धर्म कार्यों में पुरुष का साथ दे, पुरुष के जीवन को व्यवस्थित और प्रेरणा दे।
आज विवाह की पवित्र मान्यताएं तार तार हो रही है। विवाह एक आदर्श अनिवार्य संस्कार होते हुए भी समझौते के आधार पर निर्धारित शर्तों के आधार पर अनुबंध के रूप में तथा लिव इन के विकल्प के रूप में देखा जा रहा है। हिंदू विवाह अधिनियम 1955 के अनुसार आदर्श विवाह त्याग पर समर्पण आधारित होता है। यह एक सिविल कॉन्ट्रैक्ट नही है जो शर्तो पर होता है और न ही अस्थाई ठहराव या कुछ समय की अवधि के लिए लिव इन का अधिकार भी नहीं देता । विवाह सप्तपदी के आधार पर अग्नि के सामने फेरे लेने पर मान्य होता है। आज की युवा पीढ़ी विवाह को अनिवार्य न समझ कर लिव इन में शर्तों पर रहकर के धार्मिक सामाजिक एवं पारिवारिक उत्तरदायित्वो तथा जिम्मेदारियों से बचना चाहती है ।
सितंबर 22 मे केरल हाईकोर्ट के लंबित प्रकरण वैवाहिक संबंधों में यूज एंड थ्रो उपभोक्ता संस्कृति की निंदा करते हुए तलाक की एक याचिका को खारिज कर दिया । कोर्ट ने टिप्पणी की – नई पीढ़ी विवाह को बुराई के रूप में देखती है और आनंद से जीने के लिए इससे बचना चाहती है। लिव इन रिलेशन का चलन बढ़ रहा है, यह समाज के लिए चिंता का विषय है । फैमिली कोर्ट में तलाक की याचिका खारिज होने के बाद पति ने हाई कोर्ट की ओर रुख किया। न्यायमूर्ति ए मोहम्मद मुश्ताक और सोफी थॉमस की खंडपीठ ने कहा की युवा पीढ़ी देनदारी या दायित्वों के मुक्त जीवन का आनंद उठाने के लिए शादी से बचना चाहती है। वह वाइफ शब्द का विस्तार वर्णन बर्डन इनवाइटेड फॉर एवर (चिंता हमेशा के लिए आमंत्रित) के रूप में करती है। यह सोच वाइज इन्वेस्टमेंट फॉर एवर (हमेशा के लिए बौद्धिक निवेश) की पुरानी अवधारणा को प्रतिस्थापित करती है। कोर्ट ने कहा केरल को भगवान के देश के रूप में जाना जाता है। यह राज्य पारिवारिक बंधन के लिए प्रसिद्ध था लेकिन अब स्वार्थी कारणो या एक्स्ट्रामैरिटल रिलेशनशिप से अपने बच्चों की परवाह किये बिना विवाह बंधन को तोड़ना प्रतीत होता है।
कोर्ट ने कहा अशांत और तबाह हुए परिवारों की चीख पुकार पूरे समाज की अंतर आत्मा को झकझोर देने वाली है। न्याय मूर्ति सोफी थॉमस ने लिखित आदेश में कहा जब युद्धरत जोड़े, परित्यक्त बच्चे और हताश तलाकशुदा हमारी आबादी के अधिकांश हिस्से पर कब्जा कर लेंगे तो निसंदेह यह सामाजिक जीवन की शांति पर प्रतिकूल प्रभाव डालेगा। यह केरल का एकमात्र उदाहरण नहीं है ऐसी स्थितियो का भारत में तीव्र रूप से विस्तार हो रहा है।

शादी जरूरी पड़ाव नहीं एक विकल्प है:- ब्रिटेन में हुए एक सर्वे में करीब आधे किशोरो ने कहा कि भविष्य में शादी करना उनके लिए जरूरी नहीं है। भारत में भी कुछ ऐसी ही स्थिति देखने को मिल रही है।यूगव के एक सर्वे और सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश में हर चार में से एक युवा शादी से कतरा रहा है। पुणे की रहने वाली 16 वर्षीय अन्यना साफ कहती है “मुझे शादी के बारे में सोचना भी नहीं है मैं पहले अपना कैरियर बनाना चाहती हूं। “अन्यना एक अकेली नहीं है। मिलेनियल्स (1980 से 1993 तक जन्मे लोग) के बाद जेन जी (1994 से लेकर 2012 तक जन्मे लोग) तथा जेन एल्फा (2013 के बाद जन्मे किशोर) की बड़ी आबादी भी अब शादी को जीवन का जरूरी पड़ाव नहीं बल्कि एक विकल्प मान रही है। जिसके परिणाम स्वरूप रीत के विपरीत शादी की इच्छा न रखने वाले युवक 25% तो युवतियां 48% बढी है।
डेटिंग एप क्वैक क्वैक के सर्वे में 28 वर्ष से अधिक उम्र के 39% डेटर्स शादी को जरूरी नहीं बल्कि विकल्प मानते हैं। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय के आंकड़ों के अनुसार 2011 से 2019 के बीच शादी नहीं करने की इच्छा रखने वाले युवक 20.8 % से बढ़कर 26.1% और युवतिया 13.5% से बढ़कर करीब 20% हो गई है।

सिंगल (एकल) महिलाओं की संख्या बढ़ रही है 2011 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार देश में एकल महिलाओं की संख्या 7 करोड़ से ज्यादा थी जो मौजूदा जनगणना में 10 करोड़ तक पहुंचाने का अनुमान है। इसमे बड़ी संख्या उन महिलाओं की है जिन्होंने अपनी मर्जी से शादी नहीं की और करना भी नहीं चाहती। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2011 से 2019 तक 9 वर्षों में शादी न करने की इच्छा रखने वाली युवतियों की संख्या करीब 48% बढ़ गई है।
आज शादी के विकल्प मौजूद होने से नई पीढ़ी किसी भी तरह की जिम्मेदारियां लेना नहीं चाहती। रिलेशनशिप और काउंसलर रवीना मनवानी कहती है जेन जी और जेन अल्फा के बीच सिंगल रहने की मानसिकता बढ़ रही है। युवा पीढ़ी जिम्मेदारियां लेना नहीं चाहती और परिवार या बच्चों जैसे किसी भी किस्म के बंधन में बंधना नहीं चाहती इसलिए शादी से बचती है । शादी करने की जो जायज वजह थी उनमें से अधिकांश के विकल्प या बाईपास उपलब्ध है । समाज, रिश्तेदारों का डर अब बचा नहीं है। बुढ़ापे की देखभाल करने के लिए बच्चे पैदा करने की जरूरत नहीं है क्योंकि अमूमन बच्चे आजकल पास नहीं रहते, वही ओल्ड एज होम भी सुविधा संपन्न बन गए है। इंदौर के राज रघुवंशी की पत्नी नव नवेली दुल्हन सोनम रघुवंशी द्वारा किए जाने वाले शिलांग में हनीमून मर्डर तथा बेंगलुरु में आईटी इंजीनियर को नव नवेली दुल्हन से मिली मानसिक प्रताड़ना तथा सिया गोयल द्वारा होने वाले पति को पहाड़ी से धक्का देकर मारने के प्रकरण ने युवा पीढ़ी को झकझोर के रख दिया है।
विवाह के विकल्प के कारण:- शादी से बचने के मुख्य कारण, युवा पीढ़ी आर्थिक आजादी की मानसिकता जिसके अनुसार महंगा जीवन, अस्थिर नौकरियां, बढ़ते खर्चों के कारण आज के युवा सबसे पहले स्वयं को आर्थिक रूप से मजबूत करना चाहते हैं इसलिए वे जिम्मेदारियो से भी बचना चाहते हैं। जिनके निम्न कारण है :-
1–शादी और बच्चों की जिम्मेदारी को लेकर झिझक एक बड़ा कारण बन चुका है। कई युवा मानते हैं कि अभी एडल्ट लाइफ के लिए पूरी तरह से तैयार नहीं है ।
2–केरियर और आत्मनिर्भरता के कारण जेन जी, जेन एल्फा मिलेनियल्स, अपने 20 से 30 वर्ष का बड़ा हिस्सा करियर बनाने में लगे हुए हैं।
3– महिलाओं की बदलती भूमिका एवं मानसिकता तथा शिक्षा और आर्थिक स्वतंत्रता ने महिलाओं की सोच बदल दी है। अब वह ऐसे रिश्ते चाहती है जहां समझौते कम और समानता ज्यादा हो।
4–महिलाओं की बढ़ती अति महत्वाकांक्षाएंऔर भौतिक उपभोग वृत्ति से युवाओं के मन में डर बैठ रहा है ।
5– बढ़ता हुआ आर्थिक दबाव, नौकरियों की अस्थिरता, उच्च जीवन स्तर की कामना।
6– रिश्तों का अविश्वास ,भय एवं भरोसा का अभाव।
7– समाज एवं परिवार की कमजोर भूमिका।
8– सरकार द्वारा लिव इन कानून को दी गई मान्यता ।
9– श्रद्धा ,समर्पण ,त्याग ,धैर्य एवं समन्वय का अभाव।
10– बढ़ती हुई शंकाए एवं संदेह।
11– परिपक्व निर्णय का अभाव।
12– एक दूसरे के इगो में टकराहट।
13– वधू पक्ष के परिवारों की आवश्यक दखल।
14– यूज एंड थ्रो की बढ़ती मानसिकता ।
इस तरह की विचारधाराओ से उत्पन्न परिणाम बहुत ही खतरनाक सिद्ध हो रहे हैं। बदलती जीवन शैली और महंगाई से चाइल्ड फ्री इंडिया जैसी मुहिम को बढ़ावा मिल रहा है। नई पीढ़ी के लिए परिवार के मायने बदल रहे हैं । बिना बच्चों के परिवार हर साल बढ़ रहे हैं । 18 % जेन जी महिलाएं बच्चे नहीं चाहती।
सर्वे रिपोर्ट के अनुसार महानगरों में बिना बच्चे या एक बच्चे वाले कपल 20 से 30% बढ़ चुके हैं। दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु में हुए एक निजी सर्वे में 28 से 40 उम्र के 27% जोड़ों ने कहा कि वे अपनी इच्छा से संतानहीन रहना पसंद कर रहे हैं। प्यू रिसर्च सेंटर की एक वैश्विक रिपोर्ट में भारत के करीब 12% शहरी उत्तरदाताओं ने कहा कि वे बच्चे नहीं चाहते या अनिश्चित है। इंटरनेशनल जर्नल ऑफ़ क्रिएटिव रिसर्च थॉट्स के अनुसार महानगरों में बिना बच्चे या एक बच्चे वाले कपल की आबादी 20 से 30% तक हो चुकी है। नोवा आईवीएफ फर्टिलिटी अवेयरनेस सर्वे में 18% जेन जी की महिलाएं बच्चे नहीं चाहती । युगव इंडिया के सर्वे में मेट्रो शहरों के करीब 18% युवा कपल ने एक से अधिक बच्चे न रखने की इच्छा प्रकट की है ।
यह आकड़े स्पष्ट करते हैं कि देश में संतानहीन रहने के इच्छुक युवाओं की बढ़ती संख्या के बावजूद भविष्य की चिंता और चुनौतियां कायम है। चाइल्ड फ्री इंडिया ग्रुप से जुड़े अनुग्रह की माने तो अभी भी समाज और परिवार में इसकी स्वीकार्यता कम है। इस बात की भी चिंता है कि ऐसे लोग अपनी संपत्ति किसे देंगे। कुछ लोग गरीबों को दान करना चाहते हैं लेकिन उन्हें चिंता है कि उनके बाद उनके नजदीकी रिश्तेदार कानून का फायदा उठाकर संपत्ति हड़प लेंगे। इस प्रकार की घटनाएं आए दिन देखने को मिल रही है।

विवाह के विकल्पों से उत्पन दुष्परिणाम एवं चुनौतियां
1- मां का स्थान विश्व में सर्वोपरि माना गया है। देवेंद्र इंद्र भी मां को नमन करते हैं। वे स्त्रियां धन्य होती है जो मां बनती है,लेकिन ऐसे विकल्प आने से स्त्रियां मां बनने का सौभाग्य प्राप्त करने से वंचित हो रही है। जिससे आने वाली पीढ़ी पर रोक लगने से खतरनाक सिद्ध हो सकती है ।
2- किलकारी की गूंज से घर सूने मोहल्ले वीरान बन रहे है।
3- मानसिक भूख की तृप्ति अनैतिक तरीकों से होने से तनाव, कुंठा , अवसाद, अपराध, व्यभिचार जैसे विकृतियों को बढ़ावा मिल रहा है तथा पवित्र सांस्कृतिक वातावरण दूषित हो रहा है।
4- जिस तरह आज जापान में वृद्धो की स्थिति है वहां पर युवा पीढ़ी गौण हो रही है ऐसी स्थिति भारत में आने में देर नहीं लगेगी।
5- परिवारों के नाम बदलकर डिंक, डिस्क, डिंकवार्ड, के नए नाम प्रचलित हो रहे हैं। महानगरों की शिक्षित आबादी में संतानहीन होने के कारण डिंक अर्थात डबल इनकम नो किड्स, जिन्होंने जानबूझकर बच्चे नहीं पैदा करने का निर्णय लिया है। डिंकवार्ड अर्थात डबल इनकम नो किड्स विद ए डॉग । यह एक ऐसा समूह जो संतानहीन रहते हुए पालतू पशु अक्षर कुत्ते को परिवार का हिस्सा बनते हैं । डिस्क अर्थात डबल इनकम सिंगल चाइल्ड । इस कैटेगरी में दोहरी आमदनी वाले वे दम्पत्ति आते हैं जो केवल एक बच्चा रखते हैं और छोटे परिवार को प्राथमिकता देते हैं ।
इस तरह की परिवार की कैटेगरी आमदनी के आधार पर होने लगी है । जहां पर बच्चों को महत्व नहीं पालतू श्वानों को महत्व दिया जा रहा है। यह विषय भी चिंताजनक है ।
6- विवाह न करना या देरी से करना कई प्रकार की मानसिक विकृतियों एवं रोगों को उत्पन्न करता है जिससे स्वास्थ्य को खतरा हो रहा है।
जाए।
13– हिंदू विवाह अधिनियम तथा लिव इन रिलेशन नियम के बीच की दरारो को दूर किया जाए।
14– थ्री सी फार्मूले को अपनाया जाए । सी 1 क्लियरिटी अर्थात विचारों की स्पष्टता,सी 2 कम्युनिकेशन एंड कनेक्टिविटी- इसमें एक दूसरे को चीट करने की आदत नहीं रखें पारदर्शिता पर ध्यान दिया, सी 3 कमिटमेंट- रिश्ते परफेक्ट एन्ड परमानेंट हो, टेंपरेरी नहीं।
15–जिम्मेदारियो को चुनौतियां मानकर जीवन का हिस्सा बनाया जाए।
16– उपभोक्तावादी दृष्टिकोण के स्थान पर मानवतावादी, धार्मिक, एवं आध्यात्मिक बनाया जाए।

17– आपसी समन्वय एवं समायोजन के सूत्रों को अपनाया जाए।

18– वधु के परिजनों का हस्तक्षेप कम से कम हो ।

इस प्रकार स्पष्ट है युवा पीढ़ी अपनी मानसिकता को बदलें और आने वाली चुनौतियां को बुलवा न दें । भारतीय संस्कृति एवं शादी विवाह जैसे पवित्र संस्कारों को बचाने का प्रयास करें। अपने व्यक्तिगत आनंद ,करियर तथा जिम्मेदारी से बचने के लिए विवाह जैसी पवित्र बंधन को बहिष्कृत न करें।

पदम चन्द गाँधी
9414967294

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