इस संसार में सब बातों का अंत है। इससे आपके सेवाकाल का भी अंत होता, चाहे आपकी एक बार की कल्पना के अनुसार आप यहां के चिरस्थायी वाइसराय भी हो जाते। किन्तु इतनी जदोजहद के साथ आपका कार्यकाल पूरा होगा, ऐसा विचार न आप का था, न इस समाज के समाजजनों का। इससे जान पड़ता है कि आपके और इस समाज के समाज – जनों के बीच कोई तीसरी शक्ति और भी थी, जिस पर समाज वालों का तो क्या आपका भी काबू नहीं है।
बिछड़न का समय बड़ा करूणोत्पादक होता है। आपको बिछड़ते देख आज हृदय में बड़ा दुःख है। मान्यवर आपके समाज सेवा में आने से समाज जन किसी प्रकार से प्रसन्न न थे । वे यही चाहते थे कि आप न आवें। पर आप आए और लोग बहुत ही दुःखित हुए । उससे इस समाज के वे दिन-रात यही चाहते थे कि जल्द श्रीमान यहां से पधारें। पर अहो ! आज आपके जाने पर हर्ष की जगह विषाद होता है। इसी से जाना कि बिछड़न का समय बड़ा करूणोपादक होता है। बड़ा पवित्र, बड़ा निर्मल और बड़ा कोमल होता है ।
मान्यवर के सामाजिक दृष्टिकोण को देखने का इस दीन-हीन समाज जन को कभी इस जन्म में सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ। इससे नहीं जानता कि बिछड़न के समय लोगों का क्या भाव होता है । पर इस देश के पशु-पक्षियों को भी बिछड़ने के समय उदास देखा है। एक बार की बात है शिवशम्भू के पास दो गायें थी । उनमें से एक अधिक बलशाली थी। वह कभी-कभी अपने सींगों की टक्कर से दूसरी कमजोर गाय को गिरा देती थी। एक दिन शिवशम्भू ने टक्कर मारने वाली गाय को एक पुरोहित को दान दे दी। देखा गया कि दुर्बल गाय उसके चले जाने से प्रसन्न नहीं हुई । वरन उस दिन वह भूखी खड़ी रही, चारा छुआ तक नहीं । मान्यवर ! जिस देश के, पशुओं की बिछड़ते समय यह दशा होती है, वहां मनुष्यों की कैसी दशा हो सकती है, इसका अंदाजा लगाना कठिन नहीं है।
पहले भी इस समाज में अनेकों पदाधिकारी आए, अंत में उनको जाना पड़ा। इससे आपका जाना भी परंपरा की चाल से कुछ अलग नहीं है, तथापि आपके सेवाकाल का नाटक घोर दुःखांत है और अधिक आश्चर्य की बात यह है कि दर्शक तो क्या स्वयं सूत्रधार भी नहीं जानता था कि उसने जो खेल सुखांत समझ कर खेलना आरंभ किया था, वह दुःखांत हो जावेगा। जिसके आदि में सुख था, मध्य में सीमा से बाहर सुख था, उसका अंत ऐसे घोर दुःख के साथ कैसे हुआ । आह ! घमंडी खिलाड़ी समझता है कि दूसरों को अपनी लीला दिखाता हूँ। किन्तु पर्दे के पीछे एक और लीलाघर की लीला हो रही है, यह उसे स्वीकार नहीं ।
मान्यवर, चुनाव से पूर्व आपने अपने जो इरादे जाहिर किए थे, जरा देखिए तो उनमें से कौन-कौन से पूरे हुए ? आपने कहा था कि समाज सेवा के दायित्व से मुक्त होते समय समाज को ऐसा कर जाऊंगा कि मेरे बाद आने वाले मान्यवरों को वर्षो तक कुछ करना नहीं पड़ेगा, वे कितने ही वर्षों सुख की नींद सोते रहेंगे। परन्तु बात उल्टी हुई। आपको स्वयं इस बार बैचेनी उठानी पड़ी, और इस समाज में जैसी अशांति आप फैला चले हैं, उसको मिटाने में आपके पद पर आने वालों को न जाने कब तक नींद और भूख हराम करनी पड़ेगी। इस बार आपने अपना बिस्तरा गर्म राख पर रखा था और समाजजनों को गर्म तवे पर पानी की बूंदों की भांति नचाया है। आप स्वयं खुश न हो सके और यहां समाजजनों को सुखी न होने दिया, इसका लोगों के चित पर बड़ा दुःख है ।
विचारिए तो क्या शान आपकी इस समाज में थी और अब क्या हो गई! कितने ऊँचे होकर आप कितने नीचे गिरे ! अलिफलैला के अलहदीन ने चिराग रगड़कर और अवुलहसन ने बगदाद के खलीफा की गद्दी पर आँख खोल कर वह शान न देखी, जो इस समाज में आपने देखी ।
आप बहुत धीर – गम्भीर प्रसिद्ध थे। उस सारी धीरता – गम्भीरता का आपने दिवाला निकाल दिया यह दिवाला उस समाज के सामने निकाला जिस समाज के लोगों के संगठन में आपको तीन वर्ष के लिए समाज सेवा करने के लिए चुना था। बिना आपदा के अपने कार्यकाल को एक वर्ष के लिये बढ़ाये जाने के प्रस्ताव को पास करा कर आपने अपने उस समाज को यह संदेश दे दिया कि आपकी जड़े हिल गई हैं अंत में वहां भी आपको दिवालिया होना पड़ा और धीरता – गम्भीरता के साथ दृढ़ता को भी तिलांजति देनी पड़ी। इस समाज के छत्रप आपकी ताल पर नाचते थे प्रतिनिधि डोरी हिलाते सामने हाथ बांधे हाजिर होते थे । आपके एक इशारे पर प्रलय होती थी । कितने ही राज्यों की समाज की मिट्टी के खिलौने की भांति आपने तोड़ डाला। कितने ही मिट्टी – काठ के खिलौने आपकी कृपा के जादू से बड़े-बड़े पदाधिकारी बन गये । आपके एक इशारे पर समाज का मुखपत्र आपका शरणागत हो गया और उसकी स्वतंत्रता और निष्पक्षता समाज के प्रति न रह कर एक निष्ठ आपको समर्पित हो गई।
जिस प्रकार आपका बहुत ऊँचे चढ़कर गिरना समाज जनों को दुःखित कर रहा है, गिर कर पड़ा रहना उससे अधिक दुःखित करता है।
मान्यवर एक बार अपने कर्मों की ओर ध्यान दीजिए। आप किस काम के लिए आये थे और क्या कर चले । पदाधिकारियों का समाज के प्रति कुछ कर्त्तव्य होता है, यह बात आप निश्चित मानते होंगे। सो कृपा करके बतलाइए, क्या कर्त्तव्य आप अपने समाज के साथ पालन कर चले ? और अब आगे आपके करने के लिए क्या बाकी रह गया जिसके लिए आपको कूलड़ी में गुड़ फोड़ना पड़ा। यह तो समाज को जानने का अधिकार है ।
अशोक कुमार जैन
2 बी रामद्वारा कॉलोनी,
महावीर नगर, जयपुर