श्री पल्लीवाल जैन डिजिटल पत्रिका

अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

(पल्लीवाल, जैसवाल, सैलवाल सम्बंधित जैन समाज)

वीतरागता

वीतरागत जिसे चाहिए उसे संसार प्रिय नहीं होता। आज मनुष्य को वीतरागता चाहिए ही नहीं उसे तो कषाय, मोह, माया ही अच्छी लगती हैं। संयम में रहना अच्छा नहीं लगता है। संसार के आकर्षण को ही अच्छा मानकर उसमें ही जीना चाहता है। कषाय को छोड़ें वगैर वीतरागता आ नहीं सकती है। वीतरागता का लक्ष्य नहीं होगा तब तक मोक्ष प्राप्त नहीं होगा।

जीव आत्मभाव में जाएगा तब ही मोक्ष होगा।

महत्ता संयम की है। केवल दान देने से ही मोक्ष नहीं हो सकता है। चारों कषायो के प्रत्याखान से ही मोक्ष मिलता है।

इच्छाओं से चारों कषाय पैदा हो जातें है। जब तक कषाय नहीं छूटेगा तब तक धर्म नहीं होगा। कषाय से मुक्ति ही मुक्ति है।

कषाय छूटेगा तो वीतरागता आयेंगी।

अपेक्षा

अपने काम को साधक स्वयं करता तो एकत्व भाव प्राप्त करता है। क्रोध सहित चारों कषाय कम हो जाएंगे।

अपेक्षा अशांति का कारण हो जाती है। अपेक्षा पूरी न होकर उपेक्षा होती है जिसके कारण क्रोध आ जाता है।

हम पास में रहते हैं उसमें भी अधिकार भाव नहीं होना चाहिए। परिवारिक जनों से ममत्व रखने से कर्म बंध होते हैं।

सारे दुखों की जड़ है मोह, राग द्वेष। जितनी ज्यादा अपेक्षा रखोगे उतना ही ज्यादा मोह बढ़ेगा।

मेरा काम मुझे ही करना है।

किसी से कोई अपेक्षा नहीं रखना। वहीं सुखी है।

यह सभी बातें बोलने के लिए नहीं है, ज़ीने के लिए है।

हमारा लक्ष्य होना चाहिए कि मुझे कषायो को जीतना है। शांति में रहना है।

अपेक्षा से ऊपर उठ जाएंगे तो हमारे जीवन में शांति का झरना बहेगा। घर में दूसरों से अपेक्षा नहीं रखोगे तो शांति रहेगी। साथ में रहते हुए भी अपेक्षा नहीं रखते हुए एकत्व भाव में रहना चाहिए। वाणी का विवेक रखना चाहिए। व्यवहार मधुरता पूर्ण होना चाहिए।

अपेक्षा नहीं रखोगे तो कलह खत्म हो जाएगी। न

अपना काम खुद करने की आदत होगी तो जीवन शांति से चलेगा।

भाव

भाव दो तरह के होते हैं,

शुभ भाव व अशुभ भाव। शुभ भाव व अशुभ भाव दोनों आसक्ति है, अज्ञान है, मिथ्यात्व है।

दोनों ही पुद्दगल रुप है।

स्व भाव आसक्ति नहीं है।

शुभ भाव धर्म नहीं है,

स्व भाव धर्म है।

जीव शुभ भाव व अशुभ भाव में परिभ्रमण करता है। जीव का शुभभाव में छलावा ज्यादा होता है।

आचरण में शुभ भाव को लाना है।

बिना सम्यक दर्शन के वीतरागता नहीं आयेगी।।

पुण्य उपादेय है, किन्तु धर्म नहीं है।

दुनिया न अच्छी है ना बुरी

हमारा दृष्टिकोण अच्छा होना चाहिए।

कर्तव्य

कर्तव्य करने के होते हैं,

कहने के नहीं।

समर्पण साधना का मार्ग है, अपने अंहकार का अर्पण ही समर्पण है।

जहां गुरु एवं शिष्य एक हो जाएं उसका नाम समर्पण है।

अहंकार गलता है तो अध्यात्म फलता है।

जब तक अहंकार का मान नहीं निकलेंगा, तब तक जीवन का निर्माण नहीं होगा।

– श्री यशवंत मुनि जी म.स.

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