हमारे देश में ज्ञान का हमेशा सम्मान हुआ है ! ज्ञानी व्यक्ति को हमेशा सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है !एक ज्ञानी व्यक्ति होने का मतलब होता है की सादगी भरा जीवन और विनम्रता की मूर्ति ! एक ज्ञानी व्यक्ति को देखकर बहुत से लोग अपने जीवन में बदलाव लाते हैं जिस व्यक्ति का ज्ञान चरित्र में झलकता है वही व्यक्ति सही मायने में ज्ञानी है ! ज्ञानी व्यक्ति की कथनी और करनी में फर्क नहीं होता है ! एक ज्ञानी व्यक्ति जैसा जीवन वह खुद जीता है वैसा ही जीवन जीने की प्रेरणा वह लोगों को देता है ! अगर किसी व्यक्ति की करनी और कथनी में फर्क होता है तो वह वास्तव में ज्ञानी नहीं हो सकता है ! उसके पास जानकारी बहुत ज्यादा हो सकती हैं इनफॉरमेशन इकट्ठा करना और ज्ञान को जीवन में धारण करना दोनों में बहुत फर्क है !
एक ज्ञानी व्यक्ति विनम्रता की मूर्ति होता है लेकिन दूसरी तरफ कुछ लोग अपने आप को बहुत ज्ञानी समझते हैं और इस कारण उन्हें अपने ज्ञान पर अभिमान हो जाता है ! वह लोग अपने आपको सबसे ज्यादा ज्ञानी और समझदार समझते हैं, उन्हें लगता है मेरे जैसा इस दुनिया में कोई नहीं है और इस कारण वह लोग अपने आप को कुछ और दूसरे को तुच्छ समझने लगते हैं ! अक्सर ऐसे लोग दुनिया को बिना मांगे ज्ञान बांटते रहते हैं, ऐसे लोग हर जगह अपने ज्ञान का प्रदर्शन करने की कोशिश करते हैं, ऐसे लोग सबके सामने लोगों से ऐसे प्रश्न पूछते हैं जिनका उत्तर वह नहीं दे पाते हैं और फिर सबके सामने स्वयं उस प्रश्न का जवाब देते हैं, उस व्यक्ति को नीचा दिखाने की कोशिश करते है और अपने ज्ञान का प्रदर्शन करते हैं !
संत कहते हैं ज्ञान कोई प्रदर्शन करने की चीज नहीं है बल्कि ज्ञान को अपने अंदर धारण करने की आवश्यकता है ! ज्ञान को दिखाया नहीं जाता है ज्ञान को जिया जाता है ! हमारे पास ज्ञान है और हम किसी को समझाने की मंशा से अगर किसी को बताते हैं तो बहुत अच्छी बात है ! लेकिन अगर हम किसी को नीचा दिखाने के लिए या अपने ज्ञान का प्रदर्शन करने के लिए भीड़ के बीच में अपने ज्ञान का बखान करते हैं तो इससे बुरी बात कोई नहीं है ! एक कहावत है की नया-नया मुल्ला अल्लाह ही अल्लाह बोले इसी प्रकार जिसे नया-नया स्वाध्याय का शौक चढ़ता है वह रोज लोगों के बीच जाकर अपने ज्ञान का प्रदर्शन करने की कोशिश करता है !
हमारे पास ज्ञान है और हम उस ज्ञान को लोगों में बांट रहे हैं तो ज्ञान की वृद्धि होती है , अगर हम ज्ञान का प्रदर्शन कर रहे हैं तो फिर लोगों में ईर्ष्या और जलन की वृद्धि होती है और हमारे अंदर गुरुर और घमंड में वृद्धि होती है ! संत कहते हैं की ज्ञान का अभिमान नहीं होना चाहिए बल्कि अपने अभिमान का ज्ञान होना चाहिए कि हमारे अंदर कितना अभिमान है और अगर है तो उसे दूर करने का परिश्रम करना चाहिए !
हमारे देश में ज्ञान की हमेशा प्रशंसा हुई है लेकिन त्याग की हमेशा पूजा की गई है यानी की ज्ञान से भी बड़ा त्याग है ! अगर हमें कुछ करना है तो अपने अभिमान का त्याग करें, हम उस संस्कृति में पले बढ़े हैं जहां हमें बचपन से ही सिखाया जाता है कि राग और द्वेश से दूर रहे हम तो पूजा भी वीतरागी प्रभु की करते हैं और हमारे संत त्याग और तपस्या की मूरत होते है !
संत कहते हैं ज्ञान अगर चरित्र में धारण होता है तो वह ज्ञान पूजा के लायक होता है और अगर ज्ञान सिर्फ प्रदर्शन और अभिमान के लिए है तो फिर वह ज्ञान नहीं सिर्फ इनफॉरमेशन है जो हमने इकट्ठी कर रखी है!
धन्यवाद
महेंद्र कुमार जैन ( लारा )
शिवाजी पार्क अलवर