श्री पल्लीवाल जैन डिजिटल पत्रिका

अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

(पल्लीवाल, जैसवाल, सैलवाल सम्बंधित जैन समाज)

उत्तम धर्म है सेवा

हे भव्य मानव
निःस्वार्थ भाव प्रगट होने पर शरीर के सभी अवयव, एक लगन, एक दृष्टि एक ही सूत्र में बंधकर मस्तिष्क,हृदय,मन और आत्मा में समर्पण ज्योति प्रज्वलित हो जाती है। सेवा श्रृद्वा चेतन के प्रकाश को जगमगा देता है, जीवन की ज्योति ही, समर्पित भाव है। आप को मालूम हो सेवा करने का रास्ता बड़ा कठिन है और कंटिली झाडीयो से घिरा हुआ है। सेवा से जीवन को उँचाईयो पर पहुँचता है. ।

हे सज्जन- आत्मा में जागृति होने पर हृदय को संजोता है, हृदय मस्तिष्क को संजोता है फिर दोनों मन को-सेवा को डोरी से कस देता है। ‘शरीर के सभी अवयव एक सूत्र में बंध जाने पर सेवा भाव उमड़ता है। सेवा करना जीवन की सौगात है, श्रद्धा जीवन का प्रकाश और निर्मलता मन की पोशाक । हृदय वाणी कहती है सेवा में ही भगवान है। प्रेरणा – प्रवृति इच्छा शक्ति जज्बा, दृढता – शौर्य – समर्पण, मृदुभाषी इनका रस निकाल कर सेवा शुश्रूषा की चटनी में मिलाकर के जो अमृत रस बनेगा इसके सेवन से सेवा करना ही संस्कारों की विरासत है, कर्मों का परीक्षण है, जीवन का कल्पवृक्ष है।

हे कल्पवृक्ष के वासी- शरीर तो शमशान का धरोहर है, सेवा करना उतम धर्म है और श्रृद्धा ही सेवा का समर्पण है। सेवा करने की प्रथम पाठशाला माँ है, सेवा से चेतन शक्ति जागृत रहती है। सेवा ही जीवन जीने की कला सिखाती है। सेवा करने की आस्था ही में अमृत रस टपकता है ।

हे श्रद्धावान- सेवा की संक्षेप कहानी या आदर्श प्रेरणा – एक प्रभु भक्त साधु था। भक्ति ही थी उसके जीवन का आधार,, भूखा था कई दिनों से, भोजन के लिए इधर उधर भटकता, जाता, मिलती दुत्कार— फटकार गुजर गये दिन प्रतिदिन । एक घर के आँचल में रोटी के लिए अरदास करने लगा। घर के बालक के हृदय में में करुणा जागति है, सेवा भाव जागा. । बालक दो रोटी लेकर आया जैसे ही बालक ने बाबा के हाथ में रोटियों दी, तत्काल चील मडराती घडघडाती आई, झपट्टा मारा रोटियां ले गई, बाबा भूखा का भूखा, बालक सिसक रहा है, अन्तः करण जाग रहा है। उमड रहा है दया भाव श्रद्धा के मन मे भाव, फिर चुपके से दो रोटी लाया। जैसे ही बाबा को रोटिया दी कुत्ता तेजी की रफ्तार से आया, उन्हें भी ले गया । बालक अपनी तकदीर को खोटी मानता है या बाबा भक्ति को । बालक सोच रहा है- सेवा ही तो जीवन का समर्पण है ।

हे सज्जन- कैसा परीक्षण है, परीक्षा एक कसौटी है भक्ति की विचारो की, लेकिन बालक के अवयव इस कसौटी की परीक्षा के लिए पूर्ण जागृत है, चेहरा झलक रहा हैं सोच रहा है, सेवा में ईश्वर का वास होता है,। अन्तःमन बालक को भोजन लाने को प्रेरित करता है, कहता है अब के मैं स्वयं अपने हाथों से खिलाऊंगा। माँ से स्वयं के खाना खाने का बहाना बना कर दो रोटी लेकर आता है, सुनिये हृदय भावों की करुण आवाज । है प्रभु भक्त परसाद ग्रहण कीजिए, जैसे ही प्रथम कौर साधु की सेवा में पेश किया उसी क्षण प्रभु के रूप की झलक उस बालक को दिखाई दी। चमत्कार ही चमत्कार,। यह कटु सत्य है सेवा मे प्रभु का वास है। प्रभु तो विचारों की परीक्षा करते है ।

बाँटते रहो खुशियाँ जहाँ भी हो तुम, यहीं स्वर्ग मिल जायेगा जीते जी तुमको ।

छगन लाल जैन
रि० अध्यापक हरसाना वाले

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