श्री पल्लीवाल जैन डिजिटल पत्रिका

अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

(पल्लीवाल, जैसवाल, सैलवाल सम्बंधित जैन समाज)

शर्म की बात पर ताली पीटना

हिंदी के महान लेखक श्री हरि शंकर परसाई किसी परिचय के मुंहताज नहीं है। आज वे इस-असार-संसार में नहीं है पर उनके लिखे व्यंग्य आज भी उतने ही मौजू है जितने लिखते समय थे।
अपने एक लेख में जीवन के ढोंग पर कैसी चोट करी है उसकी एक बानगी देखिए। उन्होंने लिखा है कि” मजे की बात यह है कि मुझे धार्मिक-सांस्कृतिक और सामाजिक समारोह में भी बुला लिया जाता है। सनातनी, वेदांती,बौद्ध, जैन सभी बुला लेते है।क्यों कि इन्हें न धर्म से मतलब है न संत से न उनके उपदेश से। यह लोग धर्म- उपदेश को समझना ही नहीं चाहते, पर यह साल में एक दो बार सफल समारोह करना चाहते हैं। और जानते हैं कि मुझे बुलाकर भाषण करा देने से समारोह सफल हो जाएगा, जनता खुश होगी। और उनका जलसा कामयाब हो जाएगा।

मैं उनसे कह देता हूं-‘ जितना लाइट और लाउडस्पीकर वालों को दोगे, कम से कम उतना कुछ गरीब “शास्ता” को दे देना – तो वे दे भी देते हैं। मुझे अगर लगे कि इनका इरादा कुछ गड़बड़ है तो मैं “शास्ता” बिक्री कर अधिकारी या थानेदार की भी सहायता ले लेता हूं। यह लोग पता नहीं क्यों मेरे प्रति आत्मीयता का अनुभव करते हैं। इनके कारण सारा काम धार्मिक और पवित्र वातावरण में हो जाता है।
पर मेरी एक नयी मुसीबत पैदा हो गई है। जब मैं ऐसी बात करता हूं जिस पर शर्म आनी चाहिए तब उस पर लोग हंसकर ताली पीटने लगते हैं।
मैं एक संत की जयंती के समारोह में अध्यक्ष था। जानता था कि बुलाने वाले मुझसे भीतर से बहुत नाराज रहते हैं। यह भी जानता हूं कि यह मुझे गंदी से गंदी गालियां देते हैं, क्योंकि राजनीति और समाज के मामलों में मुंह फट हो जाता हूं। तब सुनने वालों का दीन क्रोध बड़ा मजा देता है। पर उस शाम मेरे गले में वही लोग मालाएं डाल रहे थे- यह अच्छी और उदात बात भी हो सकती है। पर मैं जानता था कि मेरे व्यंग- हास्य और कटु उक्तियों का उपयोग करके उन तीन- चार हजार श्रोताओं को प्रसन्न करना चाहते हैं- यानी आयोजन सफल करना चाहते हैं- यानी बेवकूफ बनाना चाहते हैं।

जयंती एक क्रांतिकारी संत की थी। ऐसे संत की जिसने कहा- खुद सोचो। सत्य के अनेक कोण होते हैं। हर बात में ‘शायद, का ध्यान जरूर रखना चाहिए। महावीर और बुद्ध ऐसे संत हुए, जिन्होंने कहा-
सोचो। शंका करो। प्रश्न करो। तब सत्य को पहचानो। जरूरी नहीं है कि वही शाश्वत सत्य है, जो कभी किसी ने लिख दिया था।

ये सिध्द संत वैज्ञानिक दृष्टि संपन्न थे। और जब तक इन संतों के विचारों का प्रभाव रहा तब तक विज्ञान की उन्नति भारत में हुई। भौतिक और रासायनिक विज्ञान की शोध हुई। चिकित्सा विज्ञान की शोध हुई नागार्जुन हुए, बाणभट्ट हुए। इसके बाद लगभग डेढ़ शताब्दी में भारत में बड़े- से- बड़े दिमाग ने यही काम किया कि सोचते रहे- ईश्वर एक हैं या दो हैं या अनेक हैं। है तो सूक्ष्म है या स्थूल हैं। आत्मा क्या है परमात्मा क्या है। इसके साथ ही केवल काव्य- रचना।

विज्ञान नदारद। गल्ला कम तोलेंगे, मगर , द्वैतवाद अद्वैत बाद विशिष्ट द्वैतवाद, मुक्ति और पुनर्जन्म के बारे में बड़े परेशान रहेंगे। कपड़ा कम नापेगें दाम ज्यादा लेंगे, पर पंच- आभूषणों के बारे में बड़े जागृत रहेंगे।

झूठे अध्यात्म ने इस देश को दुनिया में तारीफ दिलवाई, पर मनुष्य को मार व हरा डाला।,

उस धार्मिक संत- समारोह में मैं अध्यक्ष के आसन पर था।मैरे बाएं तरफ दो दिगंबर मुनि बैठे थे। दाहिनी तरफ दो श्वेतांबर। चार मुनियों से घिरा यह दीन लेखक बैठा था। पर सही बात यह है कि ”होल- टाइम” मुनी या तपस्वी बड़ा दयनीय प्राणी होता है। वह सार्थकता का अनुभव नहीं करता, कर्म नहीं खोज पता। श्रद्धा जरूर लेता है- मगर ज्यादा कर्महीन श्रद्धा ज्ञानी को बहुत ‘बोर’ करती है।
दिगंबर मुनि और श्वेतांबर मुनी आपस में कैसे देख रहे थे, यह मैं जांच रहा था। लेखक की दो नहीं, सौ आंखें होती हैं। दिगंबर अपने आप को सर्वहारा का मुनी मानते हैं और श्वेतांबर मुनि को संपन्न समाज का। यह मैं समझ गया- उनके तेवर से।

मैंने आरंभ में कहा भी,,” सभ्यता के विकास का क्रम होता है। जब हैंडलूम, पावरलूम, कपड़ा मिल नहीं थी तब विश्व के हर समाज का ऋषि और शास्ता कम से- कम कपड़े पहनता था; क्योंकि जो भी कपड़े बन पाते थे, उन्हें सामंत वर्ग पहनता था। तब लंगोटी लगाना या नंगा रहना दुनिया- भर में संत का आचार होता था। पर अब हम फाइन से फाइन कपड़ा बनाते और बेचते हैं, पर अपने मुनियों को नंगा रखते हैं। यह भी क्या पाप नहीं है।”

मुनि मेरी बात सुनकर गंभीर हो गए और सोचने लगे, पर समारोह वाले हंसने और ताली पीटने लगे। और मैंने देखा, एक मुनी उनके इस ओछे व्यवहार से खिन्न है। मैंने सोचा कि मुनी से कहूं कि हम दोनों मिलकर सिर पीट लें शर्म की बात पर जिस समाज के लोगों को हंसी आए- इस बात पर मुनि और साधु दोनों रो ले।

पर इसके बाद जब मुनि बोले तो उन्होंने घोर हिंसा की शैली में अहिंसा समझाई। कुछ शब्द मुझे अभी भी याद है,” पाखंडियों क्या सत्य को सर्टिफिकेट के दैने के समारोह करते हो? तुम्हारे सर्टिफिकेट से संत को कोई परमिट या नौकरी मिल जाएगी? पाप की कमाई खाते हो। झूठ बोलते हो। सत्य की बात करते हो। बेईमानी से परिग्रह करते हो। बताओ, यह चार-पांच मंजिलों की इमारतें क्या सत्य, अहिंसा और अपारिग्रह से बनी है?”

मैं दंग रह गया। मुनि का चेहरा लाल था क्रोध से। वे किसी सच्चे क्रांतिकारी की तरह बोल रहे थे; क्योंकि उन्हें शरीर ढकने को कपड़ा लेने का किसी से अहसान नहीं लेना था।

सभा में सन्नाटा था।

लगातार सन्नाटा और मुनी पूरे क्रोध के साथ सारी बनावट और फरेब को नंगा कर रहे थे।

अंत में मुझे अध्यक्षीय भाषण देना लाजमी था। मैं देख रहा था कि तीस-चालीस के गुट में युवक लोग पांच-छह ठिकानों पर बैठे इंतजार कर रहे थे कि मैं क्या कहता हूं।

मैंने बहुत छोटा धन्यवाद- जैसा भाषण किया। मुनियों और विद्वानों का आभार माना और अंत में कहा;

” एक बात मैं आपके सामने स्वीकार करना चाहता हूं। मैंने और अपने तीन घंटे ऊंचे आदर्शों की, सदाचरण की, प्रेम की, दया की बातें सुनी। पर मैं आपके सामने साफ कहता हूं कि तीन घंटे पहले जितना कमीनाऔर बेईमान था, उतना ही अब भी हूं। मेरी मैंने कह दी। आप लोगों की आप लोग जाने?”

इस पर भी क्या हुआ- हंसी खूब हुई तालियाँ पिटी।

उन्हें मजा आ गया।

और मैं इन समारोहों के बाद रात को घर लौटता हूं, तो सोचता हूं कि जिस समाज के लोग शर्म की बात पर हंसें और ताली पीटें उसमें क्या कभी कोई क्रांतिकारी हो सकता है।या कोई क्रांति हो सकती है?

यह लेख लगभग तीस-पेंतीस बर्ष पूर्व लिखा गया था।क्या यह आज भी प्रासंगिक नहीं है? मुझे इस में मैरे समाज में चल रही गतिविधियों के अनेकों रुपक नजर आयें हैं।आपको यदि कुछ नजर आए तो सम्पादक जी को सूचित करें।

अशोक कुमार जैन
रामद्वारा कॉलोनी, महावीर नगर

जयपुर

Leave a Reply