श्री पल्लीवाल जैन डिजिटल पत्रिका

अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

(पल्लीवाल, जैसवाल, सैलवाल सम्बंधित जैन समाज)

सोने का भाव क्या है ?

यह घटना वीर संवत 2419 में कार्तिक वदी 4 के दिन सौराष्ट्र प्रान्त के सोनगढ़ गाँवकी है, उस दिन सांयकालीन चर्चा की शुरुआत में ही वहाँ के आध्यात्मिक सत्पुरुष पूज्य गुरुदेवश्री कानजीस्वामी बोले – “मुझे एक प्रश्न पूछना है ?”

उपस्थित समुदाय आश्चर्यचकित होकर उनका प्रश्न सुनने के लिए आतुर हो गया कि गुरुदेव न जाने क्या पूछेंगे ?

थोड़ी देर रुककर गुरुदेव ने पूछा – “सोने का ‘भाव’ क्या है ?”

प्रश्न सुनकर क्षणभर के लिए सभी स्तब्ध रह गये कि गुरुदेवश्री को सोने के भाव से क्या लेना-देना ? तब एक श्रोता ने जवाब दिया – “सोने का भाव वर्तमान में क्या है, उसका पता नहीं है ।”

दूसरे भाई बोले – “आज अखबार में देखा नहीं ।”

तीसरे भाई बोले – “अरे सोने का भाव 129 रु तोला है ।” (उस समय सोने का भाव 129 रु तोला ही था ।)

तब गुरुदेवश्री समझाते हुए बोले – “भाई ! हमारे पूछने का मतलब सोने के मोल से नहीं है । सोने का भाव तो सोने में रहता है, सोने का भाव कोई सोने से अलग नहीं हो सकता ।

सोने के रजकणों (परमाणुओं) में जो वर्ण-रस-गंध-स्पर्श है, वही तो सोने के भाव हैं । ‘भाव’ अर्थात वस्तु के गुण ।

इस प्रकार आत्मा का भाव क्या ? ज्ञान-दर्शन आदि चैतन्य भाव ही आत्मा के भाव हैं । अरे ! आत्मा का ‘भाव’ क्या है ? इसकी भी तुझे खबर नहीं है । प्रत्येक वस्तु के गुण ही उस वस्तु के स्वभाव हैं ।

आत्मा का भाव अनन्त ज्ञानादिरूप त्रिकाल है । क्षणिक रागादिक विकार आत्मा के वास्तविक भाव नहीं हैं । रागभाव के द्वारा आत्मा की असली कीमत नहीं जानी जा सकती है ।

*वस्तु को उसको सच्चे भाव के द्वारा जानना चाहिए ।*जिस प्रकार लाख रुपये की कीमत का हीरा हो और कोई उसकी कीमत पाँच पैसा लगावे तो उसे हीरे के भाव का पता नहीं है । उसी प्रकार चैतन्य हीरा अनन्त ज्ञानादि गुणों से सम्पन्न है और उसकी कीमत राग के बराबर लगावे तो उसे चैतन्य-हीरे के असली भाव का पता नहीं है, उसने आत्मा का भाव अर्थात आत्मा के गुणों को जाना नहीं । तथा वस्तु का ‘भाव’ जाने बिना वस्तु की प्राप्ति नहीं होती ।

प्रत्येक वस्तु में अपना द्रव्य-क्षेत्र-काल-भाव होता है और उसके द्वारा ही वह वस्तु जानी जाती है ।

आत्मा गुण-पर्यायों को धारण करनेवाला द्रव्य है । असंख्य-अरूपी चैतन्यप्रदेश उसका क्षेत्र है । वर्तमान पर्यायरूप परिणमना उसका काल है । ज्ञान-दर्शन आदि अनन्त गुण हैं, वे उसके भाव हैं ।”

इस प्रकार ‘सोने का भाव क्या है ?’ इस दृष्टान्त के द्वारा गुरुदेवश्री ने आत्मा का भाव समझाया था ।

कई बार लोग कहते हैं कि हमारा तो कोई ‘भाव’ ही नहीं पूछता ? परन्तु भाई ! तूने कभी स्वयं अपना ‘भाव’ पूछा है ? तेरा स्वयं क्या भाव है ? – इसकी ही तुझे खबर नहीं है । सबसे पहले तू अपने ‘भाव’ को जान । दूसरा भले ही पूछे या न पूछे, परन्तु तेरा भाव तो तेरे में ही है । अनन्त ज्ञान-दर्शन-आनन्द के भाव तेरे में भरे हैं – उनकी अपार महिमा है । जड़ भावों से भिन्न और राग भाव से भी भिन्न परम आनन्द से भरा हुआ तेरा चैतन्यभाव है – यही तेरा सच्चा भाव है ।

पुण्य या शुभराग के द्वारा तुम आत्मा को चाहो तो ये ठीक नहीं है । ये आत्मा के सच्चे भाव नहीं हैं ।

ज्ञानरूप भाव ही आत्मा का सच्चा भाव है । उस भाव के द्वारा ही आत्मा की प्राप्ति (अनुभव) होती है । ऐसे तेरे आत्मभाव को तू जान ।

पुस्तक का नाम – जैन धर्म की कहानियाँ (भाग-1)
प्रकाशक – अखिल भारतीय जैन युवा फैडरेशन – खैरागढ़ ।
श्री कहान स्मृति प्रकाशन – सोनगढ़ ।

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