संसार का हर मनुष्य चाहता है कि उसकी बुद्धि बहुत तेज हो, वो हर चीज में आगे रहे। हर माता पिता का सपना होता है कि उसका बच्चा पढने में बहत आगे हो। नहीं होने पर बच्चों को चिंता कम होती है पर माता पिता को चिंता ज्यादा होती है। हर माता पिता तो चाहते ही हैं कि मेरा बच्चा होशियार हो किन्तु जिनके यहां कुत्ता आदि होते हैं वे भी चाहते हैं कि हमारा कुत्ता बहुत होशियार हो। सबको ज्ञानवान बुद्धिमान, होशियार होना अच्छा लगता है। क्यों नहीं है? इसके कारण खोजने होंगे।
उम्र बढ़ने पर लोगो के अंदर भूलने की बीमारी हो जाती है। चाबी कहाँ रख दी, किसको सामान दे दिया भूल जाते हैं। शास्त्र पढ़ते हैं याद नहीं रहता। जिन्दगी भर से पूजा करते हैं पर आज तक पूजा याद नहीं हो पाई, अभी भी किताब की आवश्यकता पड़ रही है। कई बच्चे पढ़ते हैं बहुत, पर जैसे ही प्रश्ना पत्र सामने आता है, सब भूल जाते हैं। किसी को डिप्रेशन की बीमारी हो जाती है। विचारों की श्रृंखला नहीं रूकती लगातार उल्टे-उल्टे विचार आते हैं। मरने-मारने का मन करता है। हँसती खेलती जिन्दगी ना जाने कहां चली जाती है। इनके भी कारण खोजने पड़ेंगे।
भगवान महावीर के द्वारा उपदेशित गौतम गणधर के द्वारा रचित सूत्र महाबंध ग्रंथ में आया है कि संक्लेशता से ज्ञानावरणी का बंध होता है, और हमारा ज्ञान का क्षयोपशम कम हो जाता है। इस एक लाइन की बात में सारा निचोड़ आ गया। अब इस सूत्र को विस्तार से समझना होगा, तभी हम जीवन में उतार पायेंगे।
क्रोध, मान, माया, लोभ, हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील, परिग्रह संचय परिणामों को संक्लेश कहते हैं। क्रोध के समय हम अपने में नहीं रहते हैं।तभी लोग कहते हैं कि ये आपे से बाहर हो रहा है। अभिमान माया की लोभ की स्थिति भी इसी तरह बनती है। लोगों को क्रोध ज्यादा समझ में आता है, जबकि जो हालत आत्मा की क्रोध करता है वही हालत मान, मायाचारी, हिंसा आदि करते हैं। इस स्थिति में हमारे मन पर आवश्यकता से अधिक जोर पड़ता है। मन वचन काय को भी उसी अनुरूप कार्य करना पड़ता है। योगो की तीव्रता, संक्लेशता की तीव्रता से पाप कर्मों का आस्रव अधिक होता है। बस यही पाप हमारी बुद्धि को, हमारे ज्ञान को खत्म करना प्रारंभ कर देता है।
क्रोध चाहे बच्चा करे या बड़ा, तीव्रता तो दोनो में होती है। अभिमान चाहे राजा करे या सेठ संक्लेशता तो होती है। मायाचारी स्त्री करे या पुरुष कषाय परिणाम तो होते हैं। लोभ चाहे गृहस्थ करे या श्रावक कर्म का बंध हो ही जाता है। किसी को मारने की भावना हो या झूठ की, चोरी करने की हो, अब्रह्म सेवन (कुशील) की, या परिग्रह संचय की भावना हो सबमें परिणामों में संक्लेशता होती है। किसी ने कहा है-
काजल की कोठरी में, कैसे भी सयाने जाये; एक दाग लागे, तो लागे जरूर है।
अर्थात् जब पूरी कोठरी काली है, कितना होशियार व्यक्ति भी जाये कितना बचने के बाद भी दाग लग ही जाता है। इसी तरह गृहस्थी भी ऐसी चीज है, कितना ज्ञानी हो, बुद्धिमान हो होशियार हो, यदि गृहस्थी में रहता है तो वहाँ का वातावरण निश्चित प्रभावित करता है और कषाय तथा पाप के परिणाम होने ही होने हैं। इसीलिये कहा है घर में रह कर कितना धर्म कर लो मोक्ष नहीं मिलने वाला। क्योंकि घर में रह कर संक्लेश भाव कम तो कर सकते हैं पर खतम नहीं कर सकते। खतम करने के लिये ग्रहस्थी को छोड़कर स्वयं में आना आवश्यक है। घर में रहने वाला व्यक्ति यदि घर के कार्य नहीं करेगा, घर वालो को अच्छा नहीं लगेगा। कर्म भूमि का प्रभाव कम करना ही पड़ेगा। और करेगा तो घर में उपेक्षित रहेगा, और उसे इसी बात की संक्लेशता शुरु हो जायेगी। घर वाले कहना शुरू कर देंगे की कुछ काम नहीं करना है तो, निकल जा घर से हमें आवश्यकता नहीं तेरी। संसार स्वार्थ का मेला है। ना मानो तो प्रेक्टीकल करके देख लेना। संसार का स्वरूप समझ में आ जायेगा। कोई न कोई निमित मिलता ही रहता है संक्लेशता को। दीक्षा ही एक मार्ग है संक्लेश से रहित होने का। गृहस्थी में रहकर घर गृहस्थी के कार्य में तो होशियार हो ही जाते हैं। पर मानसिक रूप से बुद्धि दौडनी बंद हो जाती है। जैसे घर के जितने कार्य हैं, रोटी कपड़ा, बर्तन, बच्चे का पालन पोषण, पैसे कमाना । भोजन बनाने में अच्छे से अच्छा भोजन बनाने का प्रयास करते हैं, कपड़ो में अच्छे से अच्छा कपड़ा पहनने का प्रयास करते हो, व्यापार में पैसा कमाने के तरीके खोजते हो, बच्चों के भविष्य को अच्छा बनाने के लिये उसी तरह से दिमाग लगाते हो। थोड़ा फिर लिया, थोडी हँसी मजाक कर ली और थोड़ा लड़ लिया, सामने वालो को नीचा दिखा दिया। असफल होने पर टेन्शन और चिन्ताओं के बोझ से स्वयं को भारी कर लिया। जनम मरण परण (शादी) के प्रोग्रम में उठने बैठने चले गये, उससे संबधित थोड़े सुख दुख के विचार कर लिये। थोड़ा राजनीति में रुचि हो-तो राजनीति की चर्चा कर ली। खेलो में रूचि हो तो उसकी चर्चा करली। पिक्चर सीरीयल संबंधित विषय सोच लिये। इतने में संसार के 90% विचार आ गये। दस प्रतिशत का वर्णन हम करना नहीं चाहते। आप अपने आप पर स्वयं लगा सकते हैं। संपूर्ण जीवन इन्हीं विचारो में समाप्त हो जाता है। प्रतिदिन इन्ही विचारों को दोहराते रहते हैं, आश्चर्य है कि एक बात बार-बार करके बोर क्यों नही होते?
एक भोजन रोज नहीं करना चाहते, एक रंग के वस्त्र पहन कर बोर हो जाते हो, कुछ लोगो की बात करके बोर हो जाते हो, पर प्रतिदिन की बातों से बोर क्यों नहीं होते। बात करने के लिये आदमी बदल लेते हो, पर बात नहीं बदलते हो। इतना बड़ा जीवन मिला इससे हम बहुत कुछ कर सकते हैं पर अंदर का उत्साह मानसिक परिवर्तन के लिये जाग्रत क्यों नहीं होता? अज्ञानता की जिन्दगी जीकर जिन्दगी को बर्बाद क्यों करते हैं? जागो जागो जागो।
संक्लेशता अनादि काल से की है। विशुद्धि स्थान प्राप्त करें ताकि आत्मा का उत्थान हो। इस संक्लेशता से ज्ञानावरणी कर्म का तीव्र बंध कराया जिससे हमारे अन्दर अज्ञानता बढ़ती जा रही है। अज्ञानता संसार का सबसे बड़ा पाप है। क्योंकि पाप अज्ञानता में ही होते हैं। ज्ञान होगा तो पाप नहीं होगा, फिर घर में रहे होगे तो छोड़ने का प्रयास करेगा। अज्ञानी व्यक्ति बिना झिझक, बिना संकोच प्रायश्चित के भावो से रहित हो कर पाप करता है। उसे ना नरक से डर होता है ना कष्टों का भय। किन्तु ज्ञानी व्यक्ति जानता है कि किसमें पाप है किसमें नहीं, और वह गृहस्थ में रहता है तो हर कार्य में वही चुनता है जिसमें कषाय और पाप कम से कम होवे, संक्लेशता कम से कम होवे।जितनी होती है उसके लिये प्रतिक्रमण प्रायश्चित करता है पश्चाताप करता है।
घर में रहते हुये क्रोध मान माया के पापों के निमित बहुत मिलते हैं। इन्ही निमित्तो से संक्लेशता होती है। संक्लेशता से अज्ञान और अज्ञानता से पाप और पापों से दुख बढ़ता है। अतः यदि दुख नहीं चाहते हो तो संक्लेशता से हटने का प्रयास करें।
रचयित्री :-
परम विदुषी लेखिका, भारत गौरव,
गणिनी आर्यिका रत्न 105 श्री स्वस्ति भूषण माताजी