मनुष्य के जीवन में शब्दों का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। । शब्द केवल ध्वनि नहीं होते, वे हमारे व्यक्तित्व, संस्कार और विचारों का दर्पण होते हैं। एक मधुर शब्द निराश व्यक्ति के जीवन में आशा का दीप जला सकता है, जबकि एक कटु वचन किसी के हृदय पर ऐसा घाव कर सकता है जो वर्षों तक नहीं भरता। कहा भी गया है कि तलवार का घाव समय के साथ भर जाता है, लेकिन कटु वाणी से मिला घाव अक्सर जीवन भर स्मृति में बना रहता है। है। इसलिए बोलने से पहले यह अवश्य सोच लेना चाहिए कि हमारे शब्द सामने वाले के मन पर क्या प्रभाव डालेंगे। क्योंकि मुख से निकला हुआ शब्द कभी वापस नहीं आता और वह अपना प्रभाव छोड़े बिना नहीं रहता। मीठी वाणी केवल दूसरों को ही नहीं स्वयं को भी सम्मान दिलाती है। विनम्रता, संयम और संवेदनशीलता से बोले गए शब्द रिश्तों में विश्वास, प्रेम और अपनापन बढ़ाते हैं। इसके विपरीत क्रोध, अहंकार और आवेश में बोले गए शब्द वर्षों पुराने संबंधों में भी दरार डाल सकते हैं। इसी प्रकार रिश्तों की मजबूती केवल समझौते से नहीं, बल्कि आपसी समझ से होती है। जहाँ केवल समझौता होता है वहाँ मन में बोझ और असंतोष रह सकता है। लेकिन जहाँ एक-दूसरे की भावनाओं को समझने, सम्मान देने और स्वीकार करने की भावना होती है, वहाँ प्रेम, विश्वास और सम्मान स्वतः विकसित होते हैं। ऐसे रिश्ते समय की हर परीक्षा में अटल रहते हैं। जीवन का वास्तविक सौंदर्य धन, पद या प्रतिष्ठा में नहीं, बल्कि हमारी वाणी की मधुरता, व्यवहार की सरलता और संबंधों की पवित्रता में है। यदि हम प्रतिदिन यह संकल्प लें कि हमारे शब्द किसी के लिए प्रेरणा बनेंगे, पीड़ा नहीं, हमारा व्यवहार सम्मान देगा, अपमान नहीं और हमारे रिश्ते समझ पर आधारित होंगे, केवल समझौते पर नहीं तो हमारा जीवन स्वयं भी सुखी होगा और समाज भी अधिक सौहार्दपूर्ण बनेगा। आइए, हम अपनी वाणी को मरहम बनाएँ, घाव नहीं, अपने व्यवहार को सम्मान का माध्यम बनाएँ, अहंकार का नहीं, और अपने रिश्तों को समझ, विश्वास एवं प्रेम की मजबूत नींव पर स्थापित करें। यही एक श्रेष्ठ जीवन की पहचान है।
न्यायाधीश नरेंद्र कुमार जैन
(पूर्व मुख्य न्यायाधीश मद्रास एवं कर्नाटक उच्च न्यायालय)