श्री पल्लीवाल जैन डिजिटल पत्रिका

अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

(पल्लीवाल, जैसवाल, सैलवाल सम्बंधित जैन समाज)

सच्ची श्रद्धा करें भव पार

दीक्षा, आत्मा को आल्हादित करने वाला एक महामहोत्सव है। सम्यग्दृष्टि को मुक्तिपथ ही आनन्दोत्पादक है अतः मुक्तिपथ पर अग्रसित होते हुए लोगों को देख प्रमुदित होता है और उसका हर्षभाव बनावटी नहीं आंतरिक होता है। आज का मानव ऊपर से तो हँसता है परंतु आत्मा में आनंद का समावेश नहीं हो पाता। सम्यग्दृष्टि निग्रंथों का दर्शन कर, तीर्थवंदना कर, गुरुओं का उपदेश सुन तथा दीक्षा महोत्सव आदि अवसरों पर वह फूला नहीं समाता और उसकी यह खुशी आंतरिक होती है। आप को लौकिक कार्यों से उतनी प्रसन्नता नहीं हो पाती होगी जितनी खुशी सम्यग्दृष्टि को परमार्थ के पथ पर बढ़ते लोगों को देखकर होती है। कहा भी है- वृहद् द्रव्य संग्रह टीका में ‘धम्मो धम्म फलम्मि य हर्षो भावो य होई संवेगो।’ धर्म व धर्मफल को देखकर हर्ष भाव का होना संवेग और संवेग भाव का धारी सम्यग्दृष्टि होता है। श्रद्धा समीचीन है इसलिए धर्म व धर्म के फलों में हर्ष हो रहा है और उनकी सम्यक् श्रद्धा का दीप डगमगाता नहीं क्योंकि वह सम्यग्ज्ञान रूपी चिमनी से ढ़का है। जब ऐसी दृढ़ श्रद्धा उत्पन्न होती है तो प्रसन्नता बनावटी कैसे हो सकती। और श्रद्धा समीचीन है वहाँ उस समीचीन श्रद्धा के साथ जो कुछ भी ज्ञान होता है वह समीचीन ही होता है। पंडित दौलत राम जी चौथी ढ़ाल में कहते हैं-

सम्यक् साथै ज्ञान होय, पै भिन्न अराधौ।
लक्षण श्रद्धा जान, दुहू में भेद अबाधौ ।।
सम्यक कारण जान, ज्ञान कारज है सोई।
युगपत होते हु प्रकाश दीपक तै होई ।।। ।। चौथी ढ़ाल

सम्यक् दर्शन व ज्ञान एक साथ ही होते हैं। जैसे दीपक का प्रकाश व प्रताप एक साथ होता है। ट्रेन में मास्टर जो लाईट जलाता है उसमें दो प्रकार के कांच होते हैं एक हरा दूसरा लाल इसलिए हरी लाईट व लाल लाईट जलती है। अब प्रश्न है green glass पहले आया कि green light। उत्तर होगा- दोनों एक साथ आते हैं। ज्ञान तो आत्मा में अनादि से है जैसे लाईट तो है ही मात्र कांच बदल रहा है वैसे ही सम्यग्दर्शन के होते ही ज्ञान सम्यक् हो जाता है जैसे कांच हरा है तो लाईट हरी रहती है। कांच लाल होते हैं तो लाईट लाल हो जाती है। दृष्टि सम्यक् है तो ज्ञान व चारित्र सब सम्यक् हो जाते हैं। धर्म के फल व धर्म को देख सम्यक् श्रद्धानी हर्षित होता है। परंतु मिथ्या श्रद्धानी को धर्म व धर्म के फल में हर्ष नहीं होता उसकी दशा का वर्णन करते हुए कवि कहता है-

‘मिथ्यादृष्टि जीव को धर्म कथा न सुहाय।
कै ऊँगे कै लड़ परे, कै उठ घर को जाए।’

मिध्यादृष्टि जब धर्मसभा में बैठता है तो उसका मन धर्मकथा श्रवण में नहीं लगता व्यक्ति बाते करता है यहाँ-वहाँ देखता है अथवा आज के परिवेश में मोबाईल आ गया। जो चैन से नहीं बैठने देता। उसका स्विच चालू रहता। कहा जाता है- सिंहनी का दूध सुवर्ण पात्र में ही समाता है। बस उसी प्रकार गुरु वाणी रूपी अमृत दुग्ध सम्यक् श्रद्धानी के मस्तक रूपी पात्र में ही समा सकता है। जैसे-गर्मी में प्यास लगती है तो दृष्टि पानी पर जाती है। सम्यग्दृष्टि को भी प्रभुवाणी सुनने की प्यास बनी रहती है वह कभी तृप्त नहीं होता। भगवान की दिव्य देशना दिन में 3 या 4 बार अथवा पुण्यशाली व्यक्ति आये तो असमय में भी खिरती है। एक समय में 6 घड़ी देशना खिरती है। 1 घड़ी 24 मिनट

6 × 24 = 144 मिनिट 2 घंटे 24 मिनिट तक दिव्य देशना खिरती है।

दिव्यध्वनि दिन में चार बार खिरती है तो कुल समय 2 घंटे 24 मिनिट × 4 = 9 घंटे 36 मिनिट सोचिए ! भगवान की देशना सुनने वाले जीव 9 घंटे 36 मिनिट तक प्रवचन सुनकर अघाते नहीं क्यों? क्योंकि वे सम्यग्दृष्टि है और आप आधे घंटे में ही थक जाते हैं और तिलोयपण्णति में कहा कि समवशरण में बैठे प्राणी हाथ जोड़कर दिव्य देशना सुनते हैं सोचिए विनयवंत होकर देशना सुनते हैं और आप आधे घंटे में पचास बार आसन बदल लेते। कारण क्या है? हमारी श्रद्धा उतनी मँजी हुई नहीं। कुछ-कुछ कालिमा श्रद्धा में है जब बर्तन मँजा होता है तो वह चमकता है श्रद्धा मँजी है तो उसकी चमक आपके चेहरे पर भी नजर आयेगी। और जीवन में लघुता आ जायेगी। विद्यार्थी कब तक होना चाहिए। सच्चा ज्ञानी जीवन भर विद्यार्थी बनकर रहता है क्योंकि ज्ञान पिपासु है। निरंतर श्रुताभ्यास की प्यास रहती है। जबकि अज्ञानी ज्ञानाभिमान में जीता है। एक दार्शनिक सुकरात हुए जो कहते हैं कि जब मुझे ज्ञान नहीं था तो हाथी की चाल चलता था और ज्ञान होने के बाद मेरी चाल चींटी की तरह हो गई है। सच्चा श्रद्धानी लघुता से भर जाता है। सदा ज्ञान का अर्जन करने गुरु पद पंकज समीप हाथ जोड़े खड़े रहता है। तथा वैराग्य से भरे रहता है, सम्यग्दृष्टि के विषय में छहढ़ाला में पंडित दौलतराम जी तीसरी ढ़ाल में कहते हैं।

गेही पै गृह में न रचे ज्यों, जल तैं भिन्न कमल है।
नगर नारि को प्यार यथा, कादे में हेम अमल है।।

सम्यग्दृष्टि जीव वैराग्य भाव से ओतप्रोत होता है। घर में रहते हुए भी घर में आसक्ति भाव नहीं होता विरक्त ही रहता है। जैसे तालाब में कमल होता है परंतु जल से अलिप्त रहता है, कीचड़ में सोना मलीन नहीं होता तथा वेश्या का प्यार पुरुष पर नहीं धन पर होता है बस ऐसी ही अवस्था सम्यग्दृष्टि जीव की होती है। सारे घर-परिवार के बीच रहता हुआ भी विरक्त ही रहता है।

दोष रहित गुण सहित सुधी जे सम्यग्दर्श सजे हैं।
चरितमोह वश लेश न संजम, पै सुरनाथ जजै है।

8 दोषों से रहित, 8 गुणों से सहित शुद्ध सम्यग्दर्शन से जो सुधी सज्जन सहित है उसके पास चारित्रमोहदय वशात् लेश मात्र भी संयम नहीं है। फिर भी देवता भी उसकी पूजा करते हैं क्योंकि श्रद्धान निर्मल होता है।

वस्तुतः श्रद्धान ही महत्त्वशाली है। सच्चा श्रद्धानी भवसागर के तीर को शीघ्र पा लेता है। अतः पुरुषार्थ पूर्वक श्रद्धा को निर्मल बनाने का प्रयास कीजिए। क्योंकि श्रद्धा पुरुषार्थ गम्य ही होती है। सच्ची श्रद्धा प्राप्त हो गई तो समझो संसार मात्र चुल्लु भर ही शेष रह गया है।
ऐसी सम्यक् श्रद्धा आप सभी को प्राप्त हो।

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