हमारे जैन तीर्थों की वर्तमान स्थिति किसी से छिपी नहीं है। आज ये तीर्थ सुरक्षित प्रतीत नहीं हो रहे हैं। गिरनार जी को तो हम लगभग खो ही चुके हैं, अन्य तीर्थों पर भी खतरा मंडराने लगा है। यह सोचना गलत है कि कोई बाहर का व्यक्ति आकर हमारी मदद करेगा। राजनैतिक पार्टियों को अपना हमदर्द मानना गलत है। राजनैतिक संरक्षण तो वोटों की संख्या के आधार पर ही मिलता है चाहें कानूनी दृष्टि से हमारा पक्ष कितना ही मजबूत क्यों न हो। इसलिए हमें अपनी कमजोरियों को दूर करके स्वयं को और अधिक मजबूत बनाना होगा। हमें आत्म-निरीक्षण करना होगा तथा उन कारणों को जानना होगा जिनकी वजह से आज यह स्थिति बनी है।
बचपन में जब हम महावीर जी आदि स्थानों पर तीर्थ वंदना के लिए जाते थे तो दर्शन-पूजन के बाद भोजन धर्मशाला में स्वयं ही बनाते थे। आज स्थिति बिल्कुल भिन्न है। अधिकतर यात्री एक या अधिक से अधिक दो दिन रुकते हैं, वे धार्मिक भावना से कम पर्यटन की दृष्टि से अधिक जाते हैं। शायद ही कोई धर्मशाला के कमरे में खाना बनाता हो। तीर्थक्षेत्रों की कमेटियों यात्रियों की इस मांग के अनुरूप व्यवस्था बनाने में अक्षम रहीं हैं, इस कारण वहाँ रेस्टोरेंट खुल गये तथा साथ ही यात्री लोग लहसुन-प्यास युक्त अशुद्ध भोजन करने लगे। यदि तीर्थक्षेत्रों की प्रबन्ध समितियाँ यात्रियों की पसंद के अनुरूप शुद्ध एवं स्वादिष्ट भोजन की इस आवश्यकता को पूरा कर देतीं हैं तो उन्हें बाहर अशुद्ध खाने से बचाया जा सकता है। यदि हम शिखर जी की बात करें तो पहले वहाँ पर वंदना के लिए जाते थे तो नंगे पैर बिना कुछ खाए पीये वंदना करते थे। लेकिन अब हम जैनों ने पूरे रास्ते खाना चालू कर दिया। उनकी इस मांग को पूरा करने के लिए पहाड़ पर स्थानीय अजैन लोगों ने दुकानें खोल लीं। यात्री पैदल या डोली में जाने के स्थान पर मोटरसाइकिल पर जाने लगे। इसके साथ ही अन्य अनैतिक कार्य भी बढ़ गये। पहाड़ों पर जो दुकानें हैं वे तो जैन यात्रियों की वजह से ही चलती हैं। यदि जैन यात्री वहीं खाना पीना बंद कर दें तो दुकाने भी स्वतः ही हट जायेंगी तथा अवांछनीय तत्व भी यहाँ नहीं पहुंचेंगे। मोटरसाइकिल पर जाना भी बंद होना चाहिए।
शिखर जी पर जो घटनायें घटीं वे अचानक एक दिन में उत्पन्न हो गईं हो ऐसा तो नहीं है। लेकिन लगता है कि वहाँ की स्थानीय प्रबन्ध समितियों ने इस ओर गंभीरता पूर्वक ध्यान नहीं दिया और समस्या को बढ़ते रहने दिया। यदि वे जागरूक रहती तथा समय रहते कार्यवाही कर लेतीं तो संभवतः ऐसी स्थिति पैदा न होती। यह स्थिति और अधिक इसलिए भी बिगडती है क्योंकि वहाँ अधिकतर कर्मचारी स्थानीय अजैन ही है तथा कमजोर प्रबन्ध समितियों के कारण कर्मचारियों की निष्ठा स्थानीय समाज की ओर ही अधिक रहती है।
अनेक स्थानों पर संतों द्वारा प्रेरित नये-नये निर्माण प्रतिदिन कराये जा रहे हैं। कुछ निर्माण आवश्यक हो सकते हैं लेकिन जहाँ जैन लोगों की कोई आबादी नहीं है वहाँ भी करोड़ों रुपये के प्रोजेक्ट खड़े कर दिए गये हैं। संतों के कहने पर समाज लाखों / करोड़ों रुपये इन प्रोजेक्टों में दान देते हैं। जैन समाज के इस वैभव को जब स्थानीय लोग देखते हैं तो उन पर हमेशा सकारात्मक प्रभाव पड़ता हो ऐसा नहीं है। कई बार विपरीत और नुकसानदेय प्रभाव भी पड़ सकता है। जैनों के इस प्रकार के वैभव को देखकर स्थानीय अजैन लोगों की आँखें भी चौंधियाने लगती हैं। वे लोग जैन समाज पर अपने लोगों को काम पर रखने के लिए दबाव बनाते हैं तथा रुपये भी ऐठने का प्रयास करते हैं। कई बार वे यहीं तक सीमित नहीं रहते हैं, बल्कि बाद में तीर्थों पर भी अधिकार दिखाने लगते हैं।
जब से नए तीर्थ बनवाने का प्रचलन बढ़ा है तब से पुराने तीर्थों के संरक्षण की और संतों और श्रावकों का रुझान घटा ही नहीं है बल्कि न के बराबर हो गया है। हम नए तीर्थ बनायें लेकिन पहले पुराने तीर्थों के संरक्षण की भी सोचें। समाज को भी पुराने तीर्थों के संरक्षण के लिए खुले मन से दान देना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार नए तीर्थ बनबाने के बजाय पुराने तीर्थों के संरक्षण के लिए दान देने से हजार गुना पुण्य मिलता है।
पिछले वर्षों में तीर्थक्षेत्र कमेटी सहित अनेक राष्ट्रीय संस्थाओं ने भी बहुत निराश किया है। मान-अभिमान के कारण अनेकों नई संस्थायें पैदा तो हो गई हैं लेकिन उन्होंने तीर्थों की स्थिति सुधारने के लिए कोई ठोस कदम उठाए हों ऐसा लगता नहीं है, कम से कम उनके काम दिखाई तो नहीं देते हैं। जब कोई व्यक्ति बड़ा पद लेता है तो उसकी जिम्मेदारी भी अधिक को जाती है। यदि संस्थाओं के पदाधिकारी अपनी निजी व्यस्तताओं के कारण या अन्य वजह से संस्था की जिम्मेदारी नहीं निभा पा रहे हैं तो उन्हें अन्य सक्रिय सदस्यों को जोड़ना चाहिए तथा स्वयं को समाज हित में पद से हट जाना चाहिए।
मेरा मानना है कि जहाँ कहीं भी तीथों को लेकर दिगंबर-वेताम्बर के विवाद के कारण मुकदमें चल रहे हैं उन्हें हमारे नेताओं को पहल करके अविलंब समाप्त कराना चाहिए जिससे हम अपनी शक्ति का उपयोग तीथों के संरक्षण पर केन्द्रित कर सकें। हमें श्वेताम्बरों को भी विश्वास में लेना चाहिए तथा उनको साथ लेकर ही आगे कदम उठाने चाहिए।
इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए मेरा सभी से नम्र निवेदन है कि जैन तीर्थों की सुरक्षा और संरक्षण के लिए हमें निम्न बिंदुओं पर अवश्य विचार करना चाहिए :
1. हम तीर्थों को तीर्थ ही रहने दें, उन्हें पर्यटक स्थल न बनाये।
2. तीर्थक्षेत्रों की स्थानीय प्रबन्ध समितियाँ अधिक जागरूकता के साथ काम करें जिससे तीर्थों पर कब्जे जैसी स्थिति पैदा ही न हो। यदि थोड़ी सी भी समस्या नजर आए तो तुरंत कार्यवाही करें। जहाँ तक संभव हो तीर्थों पर जैन लोगों की नियुक्ति करें।
3. तीर्थों पर साफ़ सुधारे शुद्ध खाने-पीने की ऐसी व्यवस्था करें जो बाजार के रेस्टोरेंट से भी अधिक अच्छा हो।
4. अनावश्यक निर्माण न हों, इसके लिए श्रेष्ठी और समाज दबाव बनायें। कहीं उनका दिया दान हमारे तीर्थों के लिए नुकसानदेय न हो जाय इसका ध्यान रखें।
5. तीर्थक्षेत्र कमेटी के पदाधिकारी और अधिक सक्रिय हों तथा श्वेताम्बरों को साथ लेकर काम करें।
डॉ. अनिल कुमार जैन
बापू नगर जयपुर