श्री पल्लीवाल जैन डिजिटल पत्रिका

अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

(पल्लीवाल, जैसवाल, सैलवाल सम्बंधित जैन समाज)

शादी — केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं, दो संस्कारों और दो परिवारों की परीक्षा

आज समाज में विवाह केवल एक उत्सव बनता जा रहा है, जबकि वास्तव में विवाह जीवन की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।
शादी केवल साथ रहने का लाइसेंस नहीं, बल्कि साथ निभाने की साधना है।
यह केवल “मुझे क्या मिलेगा?” का संबंध नहीं, बल्कि “मैं क्या निभाऊँगा?” का व्रत है।

आज बहुत से विवाह इसलिए संकट में आ जाते हैं क्योंकि विवाह से पहले रूप देखा जाता है, परिपक्वता नहीं…
कमाई देखी जाती है, संस्कार नहीं…
स्वतंत्रता देखी जाती है, जिम्मेदारी नहीं…
और परिणामस्वरूप कुछ वर्षों बाद वही संबंध बोझ, दूरी और तनाव में बदलने लगते हैं।

1. शादी के लिए कौन-कौन सी योग्यताएँ परखनी चाहिए?

केवल नौकरी और सुंदरता पर्याप्त नहीं

आज अधिकांश परिवार दो ही बातें देखते हैं —

लड़का कितना कमाता है?

लड़की कितनी सुंदर है?

लेकिन विवाह इन दो बातों पर नहीं टिकता।
विवाह टिकता है —

स्वभाव पर,

सहनशीलता पर,

संस्कार पर,

जिम्मेदारी पर,

और परिवार निभाने की क्षमता पर।

लड़के में क्या परखना चाहिए?

1. क्या वह जिम्मेदार है?

जो युवक केवल अपनी इच्छाओं में जीता हो, मित्रों और मौज-मस्ती में डूबा हो, वह विवाह का भार नहीं उठा सकता।

2. क्या वह माता-पिता का सम्मान करता है?

जो अपने माता-पिता का नहीं हुआ, वह जीवनभर किसी का नहीं हो सकता।

3. क्या वह क्रोधी, अहंकारी या अत्यधिक स्वच्छंद तो नहीं?

विवाह में “मैं ही सही” का भाव घर तोड़ देता है।

4. क्या वह आर्थिक रूप से संयमी है?

कम कमाने वाला भी सुखी हो सकता है,
लेकिन फिजूलखर्च व्यक्ति कभी स्थिर परिवार नहीं बना सकता।

5. क्या वह पत्नी को सम्मान देगा?

पत्नी को दासी समझने वाला पुरुष परिवार का संतुलन बिगाड़ देता है।

लड़की में क्या परखना चाहिए?

1. क्या उसमें अपनापन है?

बहू केवल घर में आने वाली व्यक्ति नहीं, घर की भावनात्मक धुरी बन सकती है।

2. क्या वह परिवार में घुलने की क्षमता रखती है?

हर समय “मेरा मायका, मेरी पसंद, मेरी स्वतंत्रता” — यह दृष्टि परिवार को बाँट देती है।

3. क्या वह सेवा, संवेदना और सहनशीलता समझती है?

घर केवल अधिकारों से नहीं चलता, त्याग और समर्पण से चलता है।

4. क्या वह आर्थिक समझ रखती है?

जो केवल दिखावे, ब्रांड, घूमने और सोशल प्रदर्शन में जीवन देखती हो, वह घर को तनाव में डाल सकती है।

5. क्या उसमें धर्म और संस्कार का आधार है?

धर्म केवल पूजा नहीं सिखाता, धर्म सिखाता है —

वाणी में मधुरता,

बड़ों का सम्मान,

संबंधों का महत्व,

और त्याग का सौंदर्य।

2. विवाह में माता-पिता की भूमिका क्या होनी चाहिए?

माता-पिता केवल शादी करवाने वाले आयोजक नहीं हैं।
वे आने वाले परिवार के निर्माता हैं।

उन्हें बच्चों को यह सिखाना चाहिए —

विवाह “एडजस्टमेंट” नहीं, “स्वीकार” है।

ससुराल दुश्मन पक्ष नहीं।

मायका और ससुराल प्रतिस्पर्धी नहीं।

पति-पत्नी दोनों का पहला धर्म — परिवार को जोड़ना।

सबसे बड़ी भूल

आज कई माता-पिता बच्चों को पढ़ाते तो बहुत हैं,
लेकिन “रिश्ते निभाना” नहीं सिखाते।

परिणाम —

डिग्री बड़ी,

वेतन बड़ा,

लेकिन सहनशक्ति छोटी।

3. धर्म और संस्कार विवाह में कितने आवश्यक हैं?

बहुत आवश्यक।

क्योंकि धर्म केवल मंदिर तक सीमित नहीं

धर्म सिखाता है —

क्रोध रोकना,

अहंकार घटाना,

वाणी मधुर रखना,

बड़ों का सम्मान,

संयम,

कृतज्ञता,

और त्याग।

जहाँ धर्म के संस्कार नहीं, वहाँ छोटी-छोटी बातों में भी अहं टकराने लगता है।

4. शादी स्वतंत्र जीवन के लिए है या स्वच्छंद जीवन के लिए?

स्वतंत्रता और स्वच्छंदता में अंतर है

स्वतंत्रता

जिम्मेदारी के साथ जीवन जीना।

स्वच्छंदता

“मुझे जो अच्छा लगे वही करूँ।”

आज समस्या यह है कि कई लोग विवाह के बाद भी अविवाहित जैसी स्वतंत्रता चाहते हैं —

मित्रों के साथ वही पुरानी मौज,

खर्च में कोई नियंत्रण नहीं,

परिवार की जिम्मेदारी कम।

फिर विवाह धीरे-धीरे केवल औपचारिक रिश्ता बन जाता है।

5. संयुक्त परिवार या एकाकी परिवार?

दोनों अच्छे हो सकते हैं, यदि मन अच्छे हों।

संयुक्त परिवार का सौंदर्य

अपनापन,

सहयोग,

सुरक्षा,

अनुभव,

बच्चों को संस्कार।

लेकिन संयुक्त परिवार तभी टिकेगा जब —

बड़ों में समझदारी हो,

छोटों में विनम्रता हो,

और “मैं” कम हो।

6. शादी के बाद माता-पिता से दूरी क्यों बनने लगती है?

यह आज का सबसे दर्दनाक प्रश्न है।

कुछ युवक विवाह के बाद ऐसा व्यवहार करने लगते हैं मानो — “अब पत्नी ही संसार है, माता-पिता पुराने अध्याय हैं।”

यह स्थिति क्यों आती है?

कारण

1. अपरिपक्वता

युवक भावनात्मक संतुलन नहीं सीखता।

2. पत्नी के प्रति अंध-आसक्ति

पत्नी का सम्मान आवश्यक है,
लेकिन माता-पिता की उपेक्षा अधर्म है।

3. आधुनिक गलत विचार

“अलग रहना ही आधुनिकता है।”

4. आर्थिक अहंकार

जब कमाई आने लगती है तो कुछ लोगों को लगता है — “अब हमें किसी की जरूरत नहीं।”

लेकिन संकट आने पर वही माता-पिता याद आते हैं।

7. सबसे बड़ी विडंबना

जब ऐश-मौज होती है —

माता-पिता से दूरी,

अलग घूमना,

अलग खर्च,

अलग दुनिया।

और जब संकट आता है —

आर्थिक परेशानी,

बच्चों की जिम्मेदारी,

बीमारी,

तनाव…

तब फिर माता-पिता का घर याद आता है।

यह संबंध नहीं, स्वार्थ बन जाता है।

8. क्या विवाह के बाद पुराने मित्र निभाना जरूरी है?

मित्रता गलत नहीं।

लेकिन यदि —

मित्र परिवार से ऊपर हो जाएँ,

देर रात घूमना,

अनावश्यक खर्च,

घर की उपेक्षा, तो वह मित्रता नहीं, अपरिपक्वता है।

विवाह के बाद प्राथमिकताएँ बदलती हैं।

9. बहू और ससुराल में अपनापन क्यों कम हो जाता है?

कई बार कारण दोनों पक्षों में होते हैं।

बहू की भूल

हर बात तुलना,

जल्दी निर्णय,

“ये मेरे नहीं।”

ससुराल की भूल

अत्यधिक अपेक्षाएँ,

आलोचना,

अपनापन न देना।

अपनापन आदेश से नहीं आता, व्यवहार से आता है।

10. विवाह टूटने का मूल कारण क्या है?

अधिकांश विवाह गरीबी से नहीं टूटते।
वे टूटते हैं —

अहंकार से,

संवाद की कमी से,

असंयमित खर्च से,

और संस्कारों की कमी से।

11. एक अत्यंत महत्वपूर्ण उदाहरण

एक युवक ने विवाह के बाद कहा — “अब मैं स्वतंत्र हूँ।”

धीरे-धीरे —

माता-पिता से दूरी,

घर आना कम,

खर्च बढ़ता गया,

मित्र बढ़ते गए,

बचत खत्म।

कुछ वर्षों बाद व्यापार में नुकसान हुआ।

तब वही युवक चुपचाप माता-पिता के पास रहने आया।

माता-पिता ने फिर भी अपनाया, क्योंकि माता-पिता का हृदय समुद्र जैसा होता है।

लेकिन प्रश्न यह है — क्या संबंध केवल आवश्यकता के समय याद करने के लिए हैं?

12. विवाह को सफल बनाने के सूत्र

पति के लिए

पत्नी का सम्मान करो,

लेकिन माता-पिता मत भूलो।

पत्नी के लिए

ससुराल को केवल “पति का घर” नहीं, “अपना घर” मानो।

माता-पिता के लिए

नई पीढ़ी को केवल आदेश नहीं, प्रेम और मार्गदर्शन दो।

दोनों परिवारों के लिए

तुलना कम,

संवाद अधिक।

13. युवाओं के लिए सबसे बड़ी शिक्षा

विवाह का अर्थ यह नहीं —

“अब मेरी जिंदगी मेरी मर्जी।”

विवाह का अर्थ है —

“अब दो परिवारों की भावनाएँ मेरी जिम्मेदारी हैं।”

14. प्रेरणा

जिस घर में —

धर्म हो,

नम्रता हो,

माता-पिता का सम्मान हो,

आर्थिक संयम हो,

और अपनापन हो…

वहीं विवाह सुखी बनता है।

अन्यथा भव्य शादी, महंगे कपड़े, बड़े होटल, लाखों का खर्च…
कुछ वर्षों बाद केवल फोटो एल्बम बनकर रह जाते हैं।

संदेश

शादी जीवन को जटिल बनाने के लिए नहीं,
जीवन को संतुलित, संस्कारित और सहयोगपूर्ण बनाने के लिए है।

विवाह का सबसे सुंदर रूप वह है — जहाँ पत्नी पति को माता-पिता से दूर न करे,
और पति पत्नी को पराया महसूस न होने दे।

जहाँ बहू बेटी जैसी बने,
और सास माँ जैसी।

जहाँ कमाई का घमंड नहीं,
कृतज्ञता का भाव हो।

जहाँ “मैं” कम हो,
और “हम” अधिक।

पारसमल जैन 
जोधपुर

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