श्री पल्लीवाल जैन डिजिटल पत्रिका

अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

(पल्लीवाल, जैसवाल, सैलवाल सम्बंधित जैन समाज)

अनेकान्त वाद एवं स्याद्वाद

सत्य दर्शन के लिए खण्ड खण्ड सत्य को पूर्ण सत्य के रूप में ढालना होता है। सत्यांश को यदि छोड दे और उन अंशों को समन्वित नहीं बनावे तो पूर्ण सत्य को सत्य का हृदयंगम नहीं किया जा सकेगा। इस सम्बन्ध में अंधों द्वारा हाथी देखने की कहानी प्रचलित है। आठ अन्धो ने एक हाथी को स्पर्श किया किसी के हाथ में हाथी का पैर आया किसी के हाथ मे सूंड किसी के पूछ, कान, पीठ प्रत्येक ने अपने अपने अनुभव पर हठाग्रह कर लिया।पैर वाला कहने लगा हाथी खम्बे जैसा है, पीठ वाला कहने लगा कि दीवार के समान है। सभी अपने अपने अनुभव पर अड गये। किन्तु हाथी तो हाथी ही था न एकान्त रुप में वह खम्भा था न वह दीवार। वह खम्भे के समान भी है,दीवार के समान भी। तुम सब मिलकर हाथी के पूरे रुप को समझो, तब अंधो ने स्याद्वाद को समझा।
अनेकान्त वाद एवं स्याद्वाद की पृष्टभूमि का यहाँ मन्तव्य यह है कि प्रत्येक मनुष्य अपने मन वचन कर्म में कहीं न कहीं सत्यांश लेकर अवश्य चलता है। उस सत्यांश को हठ मे डालकर मिथ्या का रूप लेने से बचना चाहिए। “ही” के एकान्त वाद में गिरकर वह सत्यांश का विकृत बना देता है। अतः यदि उसे “भी” के अनेकान्तवाद को समझाया जाय तो वह अपने सत्यांश की ही रक्षा नहीं करेगा अपितु पूर्ण सत्य के दर्शन करने की दिशा में यत्न पूर्वक आगे बढ़ सकेगा। ऐसे स्याद्वाद को जीवन में उतार लेने के बाद वहाँ अन्धकार टिक नहीं सकता क्यो कि अनेकान्तवाद और स्याद्वाद सत्य दर्शन की दीप स्तम्भ है।
वस्तु स्वरूप की वास्तविकता से हम भली भांति परिचित हो सकेंगे। जब हम उस स्वरूप को एक ही अपेक्षा की दृष्टि से नहीं बल्कि उसकी विविध अपेक्षाओं की दृष्टि से देखे। एक व्यक्ति पिता भी है पुत्र भी है। अगर वह कहे कि वह केवल पिता है तो यह सही नही है ।
वर्तमान परिपेक्ष्य में इस दृष्टि का मूल्याकन इस प्रकार कीजिए कि आज विश्व मे कई प्रकार की विचारधाराये एवं वाद प्रचलित है किन्तु वे परस्पर संघर्षशील बने हुए हैं। इसका कारण यह है कि उनमें एकान्त वादी हठ है और प्रत्येक अपने मे ही पूर्ण सत्य का निरुपण करता है तथा दूसरे विचार को पूर्ण मिथ्या मानता है।
अपने वाद को सर्वोच्चतम मानता है।महावीर का सन्देश यह है कि प्रत्येक विचार को जानो, यह मानकर कि उसमें सत्यांश अवश्य मिलेगा। इस प्रकार प्रत्येक विचार का समादर करो उस विचारक या उस विचार के अनुयायी को भी अपने अनेकान्तवादी मार्ग पर साथ लो फिर सभी विचारों के संत्याशो का संग्रह करो। इसी कारण विचार समन्वय को सर्वाधिक महत्त्व दिया गया है। आज के सन्दर्भ मे अनेकान्तवाद एवं स्याद्वाद का विशेष महत्व मानना चाहिए और अपेक्षा रखनी चाहिए‌ कि इस सिद्धान्त को मान लेने पर आज विश्व मे विचारो के संघर्ष को दूर किया जा सकता है तथा सभी कार्यों के मूल रूप विचार को समन्वित बनाकर मनुष्य की विविध प्रवृतियों में भी सामंजस्य पैदा किया जा सकता है। सत्य बोध का निश्चित रूप से यही सही मार्ग है।

श्रीचन्द जैन
पूर्व महामंत्री
अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा।

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