सम्यग्दर्शन होते ही सम्यग्ज्ञान भी हो जाता है। क्योंकि दोनो अवस्थाएँ युगपद होती हैं और यदि पूर्व से वह व्रती था तो तीनों भी युगपद हो जाते है। धर्म क्या है? उससे क्या लाभ-हानि है? इत्यादि रुचि उत्पन्न करने का कार्य सम्यग्दर्शन करता है। मिथ्यादृष्टि के अन्दर तत्त्व रुचि नहीं होती। अतत्त्व में ही मन लगता है। मिध्यादृष्टि की स्थिति शराबी की तरह होती है जिसका हेयोपादेय, कार्याकार्य का ज्ञान, विवेक समाप्त हो जाता है। जिस प्रकार शराबी कभी माता को बहिन, बहिन को पत्नी, पत्नी को माता कुछ भी कहता है। सड़कों पर पड़ा रहता है अपने सम्मान आदि का कुछ भी ध्यान नहीं रहता वैसे ही मिथ्यादृष्टि को मिथ्यात्त्व का नशा चढ़ा होता है। जिससे वह तत्त्व, अतत्त्व में भेद नहीं कर पाता। कार्य-अकार्य का भेद नहीं कर पाता।
अंतरात्मा में सम्यक्त्व का दीप प्रज्जवलित होते ही मिथ्यान्धकार नष्ट हो जाता है। मोह की नींद में सोये व्यक्ति को माँ जिनवाणी मना-मना कर जगाती है। गुरु रुप पिता फटकार लगाते है। जब बच्चे मनाने पर मानते नहीं तो पप्पा की डांट लाईन पर ले आती है। बस वैसे ही माँ जिनवाणी तो प्यार से पुचकारती है हे वत्स ! देखो प्रातःकाल हो गई है। सम्यक्त्व का सूर्योदय हो गया है अब तो उठ जाओं क्यों मिथ्यात्त्व की गहरी नींद में सोकर जीवन क्यों बर्बाद करते हो, विभिन्न प्रकार से समझाती परन्तु फिर भी बच्चा नहीं मानता तो गुरु पिता की तरह डाँटते है। प्रातःकाल हो गया उठ जाईये अन्यथा तुम्हें दंडित किया जायेगा। पिता की एक जोर की आवाज डर उत्पन्न करती है और बच्चा तैयार हो जाता है। बस गुरुओं की फटकार हम अज्ञानियों को लाईन पर लाती है और हम जाग्रत हो जाते है। गुरु सम्यक्त्व की महिमा बतलाते है उसका स्वरुप समझाते है और कहते है कि हे भव्य ! तुम सम्यक्त्व को पाने का पुरुषार्थ करो। पुरुषार्थ करोगे तो सम्यग्दर्शन प्राप्त हो सकता है और बात समझ में आ जाती और व्यक्ति पुरुषार्थ करने हेतु कटिबद्ध हो जाता है। हाँ-हाँ गुरुदेव ! मैं अवश्य ही पुरुषार्थ करूँगा। बारह भावना में कहा है –
मोह नींद के जोर जगवासी घूमे सदा। कर्म चोर चहुँओर सरवस लूटे सुध नहीं ।। सद्गुरु देय जगाए मोह नींद जब उपसमें। तब कछु बने उपाय कर्म चोर आवत रुके ।।
मोह की भयंकर नींद में प्राणी निरंतर सोता ही रहता है और विषय, कषाय रुपी चोर सर्वस्य हरण करते रहते है और हम मोह की निद्रा में बेहोश पड़े रहते है हमारा सब कुछ लुटता रहता है और हमें कुछ खबर ही नहीं होती। सतगुरु आकर हिलाहिला कर जगाते है कि हे भव्य! जागों और तब कुछ नींद टूटती है मोह का उपशम होता है और मोह का उपशम होने पर ही कर्म रुपी चोरों का आगमन रुक जाता है। मोह का उपशम भी पुरुषार्थ जन्य होता है। यदि प्राणी चाहे तो पुरुषार्थ के बल पर मोह को जीता जा सकता है। यद्यपि यह भी सिद्धान्त है कि कर्म का तीव्र उदय होने पर पुरुषार्थ कार्यकारी नहीं होता। पुरुषार्थ का सुफल तो मंदोदय में ही मिलता है परन्तु यदि तीव्रोदय है तो क्या पुरुषार्थ करना छोड़ देना चाहिए? सफलता तो मिलना नहीं है। तो आचार्य कहते है नहीं! हे भव्य ! तू पुरुषार्थ करे जा। आज नहीं तो कल तेरा पुरुषार्थ अवश्य सफल होगा। कर्म सदा काल तीव्र ही उदय में रहे ऐसा नहीं है कर्म स्थिति के पूर्ण होते ही मंदोदय भी होगा, तब किया गया पुरुषार्थ बहुत बड़ी उपलब्धि देकर जाता है। इसलिये अहर्निश पुरुषार्थ में लगे रहना चाहिए। “पुरुषार्थ से पौरुष चमकता है।” इसलिए गुरुपदेश से सम्यग्दर्शन को पाने का व मोह को जीतने का प्रयत्न, प्रयास करते ही रहना चाहिए।