आज चारो ओर गुरुभगवन्तो, धर्म गुरुओं, योग गुरुओ और प्रेरणात्मक विचारकों के प्रवचनों की एक विस्मयकारी आंधी आयी हुई है। जिधर देखो उधर ही दुनिया भाग रही है, कोई तीर्थ यात्रा पर है तो कोई देवी देवताओं या लोक देवताओ के दर पर तो कोई साधु संतों की ओर शांति सुकून की तलाश में है। लेकिन रास्ता किसी को कहीं भी नजर नही आ रहा है।
यदि शांति सुकून नही मिलने के कारणों का सूक्ष्म दृष्टि से विश्लेषण करते है, तो कतिपय कारण स्थूल रूप से दिखाई देते है जो मनुष्य को शांति की तलाश के लिए अंतहीन, दिशाहीन दौड़ने के लिए विवश कर रहे है।
वो है हमारे जीवन मे पुरुषार्थ चतुष्टय की जीवंत दृष्टि का अभाव।
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ये पुरुषार्थ चतुष्टय की जीवन मे साधना बहुत आवश्यक है। इसमें से दो अलौकिक(धर्म, मोक्ष) शक्ति का नेतृत्व करते है तो दो लौकिक (अर्थ और काम अर्थात कामना) शक्ति का नेतृत्व करते है। लौकिक और अलौकिक दोनों का हिस्सा बराबर है।
अर्थ और काम से पूर्व धर्म को रखा है। इसका अभीष्ट अर्थ है कि अर्थ का अर्जन शास्त्र और धर्म सम्मत साधनों से हो, नैतिकता का पतन किये बिना, मनुष्य का मनुष्यत्व बना रहे इस भाव से अपने परिवार के लिए जीविकोपार्जन करना। यदि हमारे घर मे अर्थ आने का मार्ग दूषित है, या शास्त्र सम्मत नही होगा या अधर्म के मार्ग से रहेगा , तो घर परिवार में अशांति का वास निश्चित रहेगा। धर्म के पथ पर चलते हुए त्याग पूर्वक उपभोग का भाव बनाए रखेंगे तो जीवन मे समभाव का उदय होगा।
“धर्मो रक्षति रक्षित:।
धर्म ही है जो हमारी व अर्थ की रक्षा करता है। जो धर्म की रक्षा करता है धर्म उसकी सब तरफ से रक्षा करता है।
“योगक्षेमं वहाम्यं।
भगवान कृष्ण गीता में अर्जुन से कहते है जो मार्ग बताये मार्ग पर चलेगा उसे अप्राप्त की प्राप्ति होगी और प्राप्त की रक्षा होगी, यदि वो मुझे मन मे अचल भक्ति के रूप में रखेगा।
“अधर्ममूलैर्हि धनैस्तैर्न धर्मोऽर्थकश्चन”
इसका अर्थ यह है कि अधर्म के मार्ग से कमाए गए धन से न तो धर्म का कोई कार्य सिद्ध होता है और न ही उससे कोई सच्चा लाभ (अर्थ) प्राप्त होता है।
काम अर्थात कामना यदि कामना धर्म सम्मत और शास्त्र सम्मत नही, जिस कामना से दूसरे का अहित होता हो, तो जीवन मे मोक्ष का मार्ग तय करना मुश्किल है।
आसक्ति से कामना सृजित होती है कामना से क्रोध पैदा होता है।
ध्यायतो विषयान्पुंसः
सङ्गस्तेषूपजायते।
सङ्गात्संजायते काम कामात्क्रोधोऽभिजायते॥
अर्थ:विषयों (सांसारिक वस्तुओं या भोगों) के बारे में सोचते रहने से मनुष्य को उनसे लगाव (आसक्ति) हो जाता है। उस लगाव से उन्हें पाने की इच्छा (कामना) पैदा होती है, और जब वह इच्छा पूरी नहीं होती, तो क्रोध उत्पन्न होता है।
अर्थ और काम धर्म सम्मत नही है तो पुरूषार्थ चतुष्टय का अंतिम मोक्ष का मार्ग मिलना नामुमकिन है।
आज समाज का वातावरण भी अर्थ और काम की लिप्सा की वजह से विषाक्त होता जा रहा है। जिसके परिणामस्वरूप आपसी रिस्तो में विश्वास की कमी देखी जाती है।
धर्माश्रय लेकर अर्थ और काम करते चले तो मोक्ष की सिद्धि होगी।
दैनिक जीवन मे यदि हम धर्म के मार्ग का अवलम्बन लेते जाए और इस संसार मे रहकर अर्थ उपार्जन करते चले, धर्म सम्मत कामनाओ को स्थान दे तो जीवन मे अध्यात्म की सुगंध आने लगती है।
आज धर्म को कर्म में लाने की महत्ती आवश्यकता है।
सादर।
पवन कुमार जैन परवेणी
जयपुर