श्री पल्लीवाल जैन डिजिटल पत्रिका

अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

(पल्लीवाल, जैसवाल, सैलवाल सम्बंधित जैन समाज)

पर्यूषण , दशलक्षण एवं क्षमावाणी महापर्व : आत्मशुद्धि, संयम, क्षमा और मैत्री का महापर्व

जैन धर्म में पर्व केवल उत्सव नहीं, बल्कि आत्मचिंतन, आत्मशोधन और आत्मजागरण के पावन अवसर हैं।* पर्यूषण एवं दशलक्षण महापर्व हमें बाहरी संसार की व्यस्तताओं से कुछ समय विराम लेकर अपने भीतर झाँकने और आत्मा के शुद्ध स्वरूप की ओर बढ़ने की प्रेरणा देते हैं।
इन पर्वों का मूल संदेश है—स्वयं को जानना, स्वयं को सुधारना और स्वयं को शुद्ध करना।
वर्षभर हम धन, प्रतिष्ठा और सांसारिक उपलब्धियों के पीछे दौड़ते रहते हैं। परंतु ये पावन दिवस हमें स्मरण कराते हैं कि वास्तविक विजय बाहरी संसार पर नहीं, बल्कि क्रोध, मान, माया और लोभ पर विजय प्राप्त करने में है।

पर्यूषण के आठ दिन : आत्मा के निकट आने के आठ सोपान
पर्यूषण के आठ दिवस क्रमशः दर्शन, ज्ञान, चारित्र, तप, भक्ति, स्वाध्याय, दान और क्षमा दिवस के रूप में मनाए जाते हैं।- ये आठ दिवस आठ आध्यात्मिक सोपानों पर आगे बढ़ते हुए आत्मशुद्धि की प्रेरणा देते हैं।

प्रतिक्रमण, स्वाध्याय, सामायिक, तप, संयम और त्याग के माध्यम से हम अपने जीवन का आत्मनिरीक्षण करते हैं।
हमें स्वयं से पूछना चाहिए—
क्या मेरे विचार निर्मल हैं?
क्या मेरी वाणी मधुर है?
क्या मेरे व्यवहार में संयम है?
पर्यूषण की सार्थकता तभी है, जब साधना के साथ हमारे जीवन में भी परिवर्तन आए—क्रोध घटे, अहंकार कम हो, वाणी मधुर बने और करुणा बढ़े।

*दशलक्षण : आत्मविकास की दस सीढ़ियाँ*
दशलक्षण महापर्व हमें दस उत्तम धर्मों की साधना का अवसर देता है—
उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, आकिंचन्य और ब्रह्मचर्य।
ये केवल दस शब्द नहीं, बल्कि आत्मोन्नति की दस सीढ़ियाँ हैं। क्षमा क्रोध से मुक्त करती है, मार्दव अहंकार को दूर कर विनम्रता देता है, आर्जव सरलता सिखाता है, शौच अंतर्मन को निर्मल करता है, सत्य जीवन को विश्वसनीय बनाता है और संयम हमें इंद्रियों पर नियंत्रण सिखाता है। तप, त्याग और आकिंचन्य आसक्ति एवं संग्रह को कम करते हैं तथा ब्रह्मचर्य आत्मसंयम और पवित्रता की ओर ले जाता है।
यदि इन धर्मों का थोड़ा-सा अंश भी हमारे दैनिक जीवन में उतर जाए, तो व्यक्ति, परिवार और समाज अधिक शांतिमय बन सकता है।

*क्षमावाणी : मन की गाँठें खोलने का पर्व*
इन पावन पर्वों की साधना का सुंदर परिणाम है क्षमावाणी।
हम कहते हैं—
“मिच्छामि दुक्कडम्।”
यह केवल औपचारिक शब्द नहीं, बल्कि अपनी भूल स्वीकार करने और अहंकार को झुकाने की भावना है।
मन, वचन और काय से जाने-अनजाने किसी भी जीव को दुःख पहुँचाया हो तो मैं हृदय से क्षमा चाहता हूँ।
लेकिन क्षमावाणी तभी पूर्ण है, जब हम केवल क्षमा माँगें ही नहीं, बल्कि दूसरों को भी हृदय से क्षमा करें।
किसी के प्रति वर्षों से संचित शिकायत और द्वेष को छोड़ देना ही सच्ची क्षमा है। क्षमा माँगने के लिए विनम्रता चाहिए और क्षमा करने के लिए विशाल हृदय।

*आज के युग में क्षमा का महत्व*
आज तकनीक ने दुनिया को निकट ला दिया है, लेकिन मनुष्य के मन में दूरियाँ भी बढ़ी हैं। परिवारों में मनमुटाव, सामाजिक मतभेद और डिजिटल माध्यमों पर कटु भाषा संबंधों को प्रभावित कर रही है।
एक शब्द, टिप्पणी या संदेश भी किसी के मन को चोट पहुँचा सकता है। *इसलिए आज क्षमावाणी हमें अपनी वाणी के साथ-साथ अपने डिजिटल व्यवहार में भी संयम रखने की प्रेरणा देती है।*
आइए, स्वयं से पूछें—
क्या मेरी वाणी से किसी का मन दु:खा?
क्या मेरे व्यवहार से किसी को पीड़ा हुई?
क्या मैं किसी पुरानी शिकायत को अब भी ढो रहा हूँ?
यदि हाँ, तो आज ही मन की वह गाँठ खोल दें।
*क्षमा से मैत्री की ओर*
जैन दर्शन हमें मैत्री, प्रमोद, करुणा और माध्यस्थ की भावना अपनाने का संदेश देता है।
अहिंसा केवल किसी जीव को शारीरिक कष्ट न देना ही नहीं, बल्कि मन, वचन और व्यवहार से भी किसी को पीड़ा न पहुँचाना है।
क्षमा हमें अतीत के द्वेष से मुक्त करती है और मैत्री भविष्य को प्रेमपूर्ण बनाती है।
आइए, इस पर्व पर कुछ बदलें—अपने भीतर

*इस पर्यूषण एवं दशलक्षण महापर्व पर हम संकल्प लें—*

क्रोध के स्थान पर क्षमा,
अहंकार के स्थान पर विनय,
छल के स्थान पर सरलता,
लोभ के स्थान पर संतोष,
असंयम के स्थान पर संयम,
संग्रह के स्थान पर त्याग
और द्वेष के स्थान पर मैत्री को स्थान देंगे।

पर्व के बाद यदि हमारे विचार अधिक निर्मल, वाणी अधिक मधुर और व्यवहार अधिक आत्मीय हो जाए, तो समझिए हमने पर्व को केवल मनाया नहीं, जिया है।
जीवन अनिश्चित है और संबंध अनमोल। इसलिए इस क्षमावाणी पर अपने मन से भार उतार दें।
जिनसे हमारी भूल हुई—उनसे क्षमा माँगें।
जिनसे हमें दुःख मिला—उन्हें हृदय से क्षमा करें।
और प्रत्येक जीव के प्रति मैत्री एवं करुणा का भाव रखें।
*क्योंकि धर्म केवल मंदिर में नहीं, हमारे विचारों और व्यवहार में दिखाई देना चाहिए।*

मिच्छामि दुक्कडम्

*मन, वचन और काय से, जाने-अनजाने, मेरे द्वारा किसी भी जीव को दुःख पहुँचा हो तो मैं हृदय से क्षमा चाहता हूँ। और जिनसे मुझे दुःख पहुँचा है, उन्हें भी मैं हृदयपूर्वक क्षमा करता हूँ।*

**क्षमा से मन निर्मल हो, मैत्री से जीवन मंगलमय हो, संयम से जीवन सार्थक हो,और आत्मचिंतन से आत्मा अपने शुद्ध स्वरूप की ओर अग्रसर हो।**
🙏🙏पर्यूषण एवं दशलक्षण महापर्व तथा क्षमावाणी पर्व की हार्दिक मंगलकामनाएँ।🙏🙏

राजेन्द्र प्रसाद जैन
76 मुक्तानंद नगर जयपुर

Leave a Reply