ये कहानी दिल को छू जाती है।
कहानी का सार:
एक लड़का पढ़-लिखकर बड़ा आदमी बन जाता है – अच्छी नौकरी, बड़ा घर, खूब पैसा। गर्व से वो अपने पिता से कहता है “पापा, अब आपके सारे कर्ज़ चुका दूँगा।”
पिता हँसकर कहते हैं “बेटा, मेरा कर्ज़ पैसों से नहीं उतर सकता।”
जब बेटा पूछता है “वो कैसा कर्ज़?” तो पिता बताते हैं:
“जब तू छोटा था, तेरी एक मुस्कान के लिए मैं अपनी हजार खुशियाँ भूल जाता था। तेरी पढ़ाई के लिए अपनी जरूरतें छोड़ देता था। और तेरे सपनों के लिए अपनी पूरी जिंदगी लगा दी।”
आखिर में पिता कहते हैं – “अगर मेरा कर्ज़ चुकाना है तो बस माँ-बाप की इज्जत करना और अपने बच्चों को वही प्यार देना जो हमने तुझे दिया है।”
ये सुनकर बेटे की आँखें भर आती हैं। उसे समझ आ जाता है कि पिता का कर्ज़ पैसों से नहीं, सम्मान, प्यार और संस्कार से चुकाया जाता है।
बहुत गहरी बात है। हम अक्सर सोचते हैं कि पैसे देकर, गिफ्ट देकर माँ-बाप का “कर्ज़” उतार देंगे। पर असली कर्ज़ तो उनके दिए संस्कारों को आगे ले जाने में है।
आपको इस कहानी का कौन सा हिस्सा सबसे ज्यादा छुआ?
ललित जैन
अछनेरा