गतांक से आगे—
5- पाँचवे भव में अच्युतकल्प में देव
अच्युतकल्प में अति धन्य देदीप्यमान देव हुआ क्योकि अच्युत शील वाले को अच्युत में स्थित होना स्वाभाविक ही है।इसमे आश्चर्य ही क्या..। मुकुट,कटक, कुंडल और चूड़ामणि द्वारा सर्वांग सुशोभित, हर्ष के साथ दौड़ते हुए परिजनों के मंगल उच्चार द्वारा सम्मान किया हुआ और बाइस सागरोपम की आयुवाला वह देव अनुपम सुख सम्पदा का भोग करता हुआ, उस आयु को अर्ध समय जैसा मानता हुआ असंख्य काल को व्यतीत करने लगा। आयुष्य पूर्ण कर यहां से च्यवकर के … छठ्रे भाव में वज्रनाभ बने।
6 – छठ्रे भाव में वज्रनाभ देव
देशना श्रवण कर परिषद में से किसी ने सम्यक्तत्व,किसी ने देशविरती और किसी ने सर्वविरती को स्वीकार किया। बज्रनाभ राजा ने चक्रायुध का राज्याभिषेक करके जिनेंन्द्र भगवान के निकट प्रव्रज्या अंगीकार की।समस्त शास्त्रों का तथा उनके अर्थो का अभ्यास किया। विविध प्रकार की तपश्चर्या से शरीर शुष्क हो गया। गुरु महाराज की आज्ञा लेकर एकल विहारी प्रतिमाधारण करके विहार करने लगे। पृथ्वी पर वे ऐसे विचरते जैसे साक्षात धर्म ही हो।एक समय तीव्र तपस्या के प्रभाव से उन्हें आकाशगामिनी लब्धि का बल प्राप्त हो गया।सुकच्छ नामक देश में पधारे।
पूर्वोक्त एक योजन शरीर प्रमाण वाले कमठ के जीव सर्प का शरीर जंगल में दावानल से जल गया।रौद्र ध्यान से पीड़ित होकर वह धूमप्रभा नरक पृथ्वी में 125 धनुष की अवगाहना वाला और 17 सागरोपम की स्थिति वाला नारक हुआ।वहां नारकी के वैक्रिय किये रूपो द्वारा दिए हुए तीक्ष्ण दुःखो की वेदना का अनुभव करता हुआ और पल भर भी सुख न पाता हुआ रहा। तत्पश्चात आयु का क्षय करके वहां से निकल कर अपकाय, अग्निकाय बैगेरह एकेन्द्रिय में तथा जलचर आदि स्थलचर आदि विकलेन्द्रिय में लंबे समय तक उत्पन्न हो–होकर उसी सुकच्छ विजय में विशाल ज्वलनगिरी पर्वत के निकट अत्यंत भयंकर बड़ी अटवी में एक भील के कुल में जीवो का घात करने वाला कुरंगक नामक वनचर हुआ।
बाल्यावस्था को पार करके वह अनुक्रम से युवावस्था में आया। बाघ,रीछ आदि जीवो का बध करके वह अपनी आजीविका करने लगा। कुछ समय व्यतीत होने पर वीरासन आदि दुष्कर क्रिया में तत्पर वे वज्रनाभ मुनीश्वर उसी अटवी में आये। गिरिकन्दरा के मध्य गुफा में वे स्थिर हुए।एक समय वे ज्वलनगिरी के पास कायोत्सर्ग धारण करके मेरु की तरह निश्चल थे। सूर्य अस्त हुआ और अन्धकार फ़ैल गया। प्रभात में राजर्षि काउसग्ग पार कर रवाना हुए। उस समय कुरंगक की दृष्टि उन पर पड़ी। पूर्व भव के अभ्यासजनित कोप के आवेग से प्रेरित होकर उसने धनुष से तीर छोड़ा और महात्मा को गिरा दिया। पँचनमस्कार का स्मरण करते हुए धीरे धीरे उठकर उचित स्थान पर बैठे। रौद्रध्यान और आर्तध्यान से बचकर ,यह शरीर अत्यंत अधम है, इस प्रकार अवधारण करके, समस्त जीव समूह को खमा कर तथा चारो प्रकार के आहार का प्रत्याख्यान करके , शरीर त्याग कर…….7 वे भव में ग्रैवेयक में ललितांग देव बने।*
7 वें भव में ग्रेवैयक में ललितांग देव—
मध्यम ग्रेवैयक में ललितांग देव हुआ। वहां अत्यंत पुण्यराशी से परिपूर्ण इच्छित अर्थ वाले,सुसाधु की भांति अतिध,पोषधव्रती की तरह व्यापार रहित और वीतराग के समान स्त्रीरहित उस देव ने कुछ काल व्यतीत किया। कानो को सुख देने वाले कोमल गीत से भी अनन्तगुणा मृदु और मन्द वायु के स्पर्श से उत्पन्न स्फटिकमणि के विमान की दीवार से उत्पन्न होने वाले शब्दो को श्रवण करता हुआ,यहां के रूप की अपेक्षा अनंतगुणा मणिमय छज्जे की भीत से उत्पन्न होने वाले विविध प्रकार के मनोहर रूप को अनिमेश्य दृष्टि से देखता हुआ, क्षीर,ईख और शर्करा की अपेक्षा अनंतगुणी उत्तम रस का इच्छानुसार आस्वादन करता हुआ ,विकसित मालती,बकुल और केतकी की सुगन्ध से भी अनन्तगुणा सुगन्ध के समूह का निरन्तर अत्यंत अनुभव करता हुआ तथा हंस..रुई,पद्मगर्भ, मेघपटल और मक्खन के स्पर्श से भी अनंतगुणी स्पर्शेन्द्रिय के अनुरूप महान कोमल स्पर्श सुख का अनुभव करता हुआ रहने लगा।
इंद्रियों के विषय मोहरूप महा प्रकृति रूपी पेटी के अधीन है और मोह महादुखः दुःख रूप है।मोह की क्षीणता हो तो अनुपम सुख की प्राप्ति होती है।यही कारण है कि जिन्होंने क्रोध,लोभ आदि का सर्वथा त्याग कर दिया है वे जीव महत्ती सुख सम्पदा को प्राप्त करते है।इसमे आश्चर्य ही क्या है। रागादि से रहित जीवो को इस संसार में भी जिस सुख की प्राप्ति होती है वह सुख बलदेव,चक्रवृति और देवेंद्र को भी दुर्लभ है।जो रागद्वेष की अग्नि से सन्तप्त है और जिनकी तृष्णा बढ़ती रहती है वे जीव वांछित विषयो की प्राप्ति होने पर भी सुख प्राप्त नहीं कर पाते। जो सुख विषयादिक बाह्य निमितो से प्राप्त किया जाता है वह सच्चा सुख नहीं है, किन्तु जो स्वाधीन है वह परमानंद रूप सुख ही सच्चा सुख है।वह प्रधान है।वह महात्मा रागद्वेष रहित चित्तवाला और सम्यक्तत्व रूप महान गुणवाला होने के कारण दीर्घकाल तक सुख का अनुभव करता रहा।आयु पूर्ण होने पर च्यवकर के……8 वें भव में कनकबाहु चक्रवर्ति हुआ।*
8वें भव में कनकबाहु चक्रवर्ति–
इस जम्बूद्वीप के पूर्ण महाविदेह क्षेत्र के सुरपुर नगर में कुलिशबाहुराजा की पटरानी सुदर्शना थी।विषयसुख का सेवन करते हुए उसने एक बार 14 महास्वपन देखे जो महापुरुष के जन्म के सूचक थे। ललितांग देव गर्भ में आया। यथासमय पुत्र का जन्म हुआ।वह पुत्र अपने तेज से दीपकों को तेजहीन करने वाला था। उसके हाथ और पैर के तल मूंगा के समान रक्तवर्ण थे। वह भाग्यशाली मनुषयो का मुकुट रूप था । उसका नाम कनकबाहु और दूसरा नाम आनंद रखा गया। पुत्र युवावस्था में आया तो कुलिशबाहु राजा ने उसका राज्याभिषेक किया।और समन्तभद्र सूरिजी के पास दीक्षा लेकर अंत में सदगति प्राप्त की।
खेचर राजा की पुत्री पद्मा के साथ कनकबाहु राजा का पाणिग्रहण हुआ। कंकबाहुराजा इंद्र की तरह पूर्वकृत पुण्य द्वारा इच्छित अर्थ को प्राप्त करता हुआ ,पटरानी पद्मा के साथ विषयसुख भोगता हुआ लम्बाकाल व्यतीत करने लगा। एक दिन अतीव पुण्य से प्राप्त हो सकने वाला चक्ररत्न उत्पन्न हुआ। सेनापतिरत्न भी उत्पन्न हुआ। कृषिकर्म करने में प्रकट बुद्धि के प्रसार वाला गाथापति , शान्ति कर्म करने में अत्यंत दक्ष और सर्व शास्त्रों का ज्ञाता पुरोहित ,गजरत्न,अश्वरत्न, बार्धकीरत्न ,अतिशय कलाकुशल, सुखद स्पर्श वाला और समस्त स्त्रियों में प्रधान स्त्री रत्न ,एक हजार आठ सतियो वाला ,वामभाग में विस्तारवाला छत्र, दो हाथ विस्तारवाला मनोहर चामररत्न, सूर्यमंडल की प्रभा समान चार अंगुल प्रमाण वाला मनिरत्न ,चार आंगल लम्बा सुवर्ण का श्रेष्ठ कांकनीरत्न, बत्तीस अंगुल लम्बा असि रत्न ,शत्रु के लिए उत्साह एवं वाम भाग में लम्बा दण्डरत्न इस प्रकार चौदह रत्नों की प्राप्ति हुई।
उस समय चक्र रत्न पूर्व दिशा की ओर चला। हजार यक्ष उसकी सेवा में थे। उसके पीछे सेना सहित चक्रवर्त्ति चला।अनुक्रम से खंडगुफा को उल्लंघन करके गंगा के किनारे नव महानिधान प्राप्त।किये। छहो खंडों को जीतकर चक्रवर्त्ति हुआ। बारह वर्ष तक महाराजा का अभिषेक का उपचार पूरा हुआ। समय का अनुसरण करके अनुपम लावण्य से सुशोभित ,सुन्दर रूप से देवांगनाओं का उपहास करनेवाली पूर्णिमा के चंद्र जैसे मुख वाली परिपूर्ण सौभाग्यगुणो से अलंकृत चौसठ हजार स्त्रियों के साथ वह दिव्य विषयसुख का अनुभव करने लगा। बतीस हजार राजाओं के चोरासी चोरासी हजार हाथ, हाथियों ,अश्वो तथा रथों का अधिपतित्व कर रहा था।अनेक रत्नों के बने हुए मनोहर वैजयन्त प्रासाद में निवास करता था। बतीस प्रकार का नाटक देखता हुआ दिन व्यतीत करता था।
एक दिन धर्मवर तिर्थंकर का पदापर्ण हुआ। चक्रवर्ती परिवार के साथ उन्हें वन्दन करने गया। तीन प्रदक्षिणा पूर्वक भगवान को वन्दन करके ,गणधर आदिको यथायोग्य नमन करके समवशरण में बैठा। भगवान ने देशना प्रारम्भ की—
इस असार संसार में एक धर्म के सिवाय कुछ भी सारभूत नहीं है। लोग क्यों निरर्थक खेद करते है। मानव संसार के कार्य में अवश्य लगे रहते है, परन्तु धर्म में नही लगते। किन्तु धर्म में उद्यत प्राणियों के दिन निष्फ़ल नहीं जाते। उनको अभीष्ट अर्थ की प्राप्ति होती है।उनका दुःसह भय नष्ट हो जाता है। कारागार में बंधे की तरह काम और कषाय रूपी पिशाच उसके निकट भी नहीं फटकते।इंद्रिय रूपी भयंकर सुभट भी उद्धतता नहीं दिखा सकते ,अत्यंत दुर्जय मोहरूपी योद्धा की शक्ति विनिष्ट हो जाती है।अशुभ ध्यान भी समर्थ नहीं होता।उछलता प्रमादरूपी चक्र भी आक्रमण नहीं करता। एतएव हे भाग्यशाली, अवश्य तुम्हारा कल्याण होने वाला है। अन्यथा इस प्रकार की सामग्री कैसे प्राप्त होती है। सब धर्म की बलिहारी है।
मनुष्यजाति,उत्तमकुल,कलंकरहित,रूपसम्पत्ति,श्रेष्ठ गुरु की उत्तम विनयभक्ति,धर्म और अर्थ का उपार्जन करने की शक्ति,और परिपूर्ण आयुष्य यह सब सामग्री पुन्यहीन जनो को सम्भव नहीं। एतएव इस सामग्री को प्राप्त करके धर्म में ही सदा सदा उद्यम करो।तुच्छ और भयंकर इंद्रियों के विषयों में आसक्त होकर तुम कोटी मूल्य वाले इस धर्म को एक कोड़ी के लिए मत हारो। तुमने बहुत समृद्धि प्राप्त की है। सुन्दर रूप वाला शरीर प्राप्त किया है।समग्र पृथ्वी का स्वामित्व पाया है। किंतु यह सब भव भ्रमणा से छुड़ाने में समर्थ नहीं है। भव बन्धन से मुक्त करने में समर्थ और शुद्ध इस परम् बन्धु के समान धर्म को तुमने स्वीकार नहीं किया।किसी प्रकार धर्म प्राप्त हुआ हो तो बुद्धि को प्राप्त होती हुई शुद्ध श्रद्धा द्वारा किसी भी उपाय से ऐसा करो कि जिससे वह धर्म अति प्रकर्ष को प्राप्त हो। बहुत जीव धर्म में लग कर भी अनर्थ रूपी शस्त्र से आहत होकर पुनः भव सागर में डूब जाते है। एतएव जब तक जरावस्था ने इस असार शरीर को जर्जरित नहीं किया है ,बड़वानल के समान दुःसह प्रियजनों का वियोग नहीं प्राप्त हुआ है,जब तक असाध्य व्याधियां व्याकुल नहीं बना रही है ,समग्र इंद्रियों का समूह अपने अपने विषय को ग्रहण करने में सहज है और जब तक यह देह उठने बैठने चलने फिरने आदि की क्रिया करने में समर्थ है ,तब तक सुख के अभिलाषी जनो को धर्म में उद्यम करना,पुरुसार्थ करना योग्य है।
इस प्रकार भुवनभानु भगवान तिर्थंकर ने आचरणीय तत्व का कथन किया। बहुत जीवो को प्रतिबोध प्राप्त हुआ।
कनकबाहु चक्रवर्ती को समवशरण में आए हुए उत्तम देवो की महत्ती समृद्धि देखकर जातिस्मरण ज्ञान उत्पन्न हो गया। तत्पश्चात कनकप्रभ पुत्र को सिंहासन प्रदान कर कितनेक राजकुमारों के साथ उसने तिर्थंकर के निकट दीक्षा ग्रहण की। वह षष्ठ अष्ठम आदि विविध प्रकार की दुष्कर तपश्चर्या करने में तत्पर हो कर समय व्यतीत करने लगे। उन्होंने अरिहंत,सिद्ध,प्रवचन,गुरु स्थावर बहुश्रुत की भक्ति आदि बीस स्थानको की आराधना की। सब जीव करूँ शासन रसी, इस प्रकार की उत्कृष्ट भावना करके उस शुष्क शरीरवाले और महासत्ववान महात्मा ने तिर्थंकर नाम गोत्र वाला सर्वोकृष्ट पुन्यकर्म उपार्जित किया। इस प्रकार शुभ प्रकृतियों के समूह को निकाचित्त करते हुए , एक ग्राम से दूसरे ग्राम विहार करते हुए एक बार क्षीरवन नामक अरण्य में पहुचे। वहां क्षीरगिरी के तट पर सूर्य के सन्मुख निमेषरहित नेत्रों को स्थापित करके तथा मन वचन और काया के व्यापार को निरुद्ध करके कायोत्सर्ग में स्थिर हो गए ।
पूर्वोक्त कुरंगक वनचर ज्वर,श्वास,कास,खुजड़ी,कोढ़,आदि भयंकर रोगों से पीड़ित होकर मरा और सातवी नारक भूमि में रौरव नामक नारकावास में नारक के रूप में उत्पन्न हुआ।वहाँ वह अनेक प्रकार के दुःखो का अनुभव करने लगा। अत्यंत भारी मुदगर के आघात की उग्र वेदना से पीड़ित ,निरन्तर हाय हाय इस प्रकार आक्रन्दन करता हुआ ,खूब तपाये हुए शुक्ल की नोक से अंग अंग में भेदा जाता हुआ ,निमेष्य मात्र काल तक भी सुख के लेश को नहीं प्राप्त करता हुआ,वह महापापी इसी अविश्रान्त वेदना का पात्र बना जिसे केवलज्ञानी ही जान सकते है।
इस् प्रकार निरन्तर होने वाली घोरातिघोर वेदना वाली तेतीस सागरोपम की आयु पूर्ण करके वहां से उबर कर वह क्षीरगिरी के ऊपर गुफा के मध्यभाग में रहने वाली सिंहनी के उदर में सिंह रूप में उत्पन्न हुआ। क्रम से वृद्धि को प्राप्त हुआ।इधर उधर घूमते हुए उसने राजर्षि को देखा। पूर्वभव में उत्पन्न बैर के अनुबन्धवाले ,क्षण क्षण में किये जाने वाले गर्जन की ध्वनि से पर्वत की गुफाओं को एवं मध्यभाग को पूरित करने वाले और पैर को लम्बा फैलाते हुए उस सिंह को देखकर मुनीश्वर ने विचार किया –वास्तव में यह मुझे मार डालना चाहता है, एतएव ज़ब तक मेरे अंदर बल है तब तक मुझे आगार रहित प्रत्याख्यान कर लेना योग्य है।इस प्रकार विचार कर उन्होंने सब प्रकार के आहार का त्याग कर दिया। सिद्धसाक्षी से आलोचना की ,समभाव में रमण करने लगे और विशिष्ट शुभ अध्यवसाय को प्राप्त हुए।
सिंह ने अचानक झपट्टा मार,मुनिवर को पृथ्वी पर गिरा दिया और तीक्ष्ण वां जैसे तीक्ष्ण नाखूनों द्वारा फाड़ डाला।उस समय उत्तम समाधिपूर्वक शरीर त्याग करके कनकबाहु मुनि 9 वें भव में प्राणत देवलोक में देव बने।
क्रमश—–
पारस मल जैन
जोधपुर