भगवान महावीर का जीवन आज भी जीवन्तता का पर्याय है, जब उनके आचरण, अनुभवजनित जीवन को हम गुरुभगवन्तो और साधविगुरुवर्याओ के जीवन मे दर्शन करते है। निस्पृहता और वीतराग रूपी अमोघ अश्त्रो को जीवनचर्या का भूषण बनाकर परिव्राजक के रूप में गांव दर गांव नगर दर नगर जाकर पँचमहाव्रतो की अपनी जीवन चर्या से व प्रवचनों के माध्यम से जन जन में अलख जगाने का सद्कार्य करते है।
आज हम सबको आत्मसाक्षात्कार, आत्मबोध की आवश्यकता है कि हम दशकों से पूज्य संत साध्वियों के प्रवचन, सानिध्य, विहार सानिध्य, व व्यावच्य आदि गतिविधियों के साक्षी बने। हम कितना अपने आपको परिवर्तित कर पाए।
पूज्य गुरुभगवन्तो का जीवन सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य का तपोबल पर आधारित है।
पंचमहाव्रत जितना अलौकिक जीवन के लिए आवश्यक है, उससे अधिक लौकिक जीवन को सुखद, आनन्दित और चिंतामुक्त जीवन के लिए आवश्यक है।
वर्तमान भौतिक संसाधनों की प्रतिस्पर्धा के समय में आज हम सब एक ही तरह की अनेक समस्याओं, परेशानियों से जूझ रहे। उन सबके मूल में पँचमहाव्रतो के दर्शन काअभाव ही मुख्य कारण है।
पँचमहाव्रत परस्पर सहस्तित्व के सिद्धांत पर बल देते है।
सत्य–सत्येन रक्षति धर्म:।
सत्य से ही धर्म की रक्षा होती है। सत्य ही धर्म है। सत्य ही सनातन है। सत्य ही आदि और अंत है। सत्य सुखद और आनन्दमय जीवन की पहली सीढ़ी है। भगवान महावीर ने सत्य के मार्ग पर आई परेशानियों का डटकर सामना किया, लेकिन सत्य के मार्ग से विचलित नही हुए। असत्य गतिविधयों के बढ़ने से आज हमारा जीवन संकटमय हो गया है।
अहिंसा:— अहिंसा परमोधर्म:।
मन,वचन,कर्म,काया से किसी को कष्ट नही पहुचाना ही अहिंसा है। हिंसा से कर्मो का बंधन होता है। हिंसा चाहे किसी भी हो सर्वथा त्याज्य है। भगवान महावीर व अन्य तीर्थकरों ने अहिंसा को मानव जीवन का अमोघ आभूषण माना है।
अस्तेय:–अनाधिकार चेष्टा से सर्वथा परहेज करना। अर्थात चोरी नही करना, जो मिला, जैसा मिला उसे स्वीकार करना।
अपरिग्रह:–-तेन त्यक्तेन भुंजीथा मा कस्य विद्वनम। अर्थात जो मिला उसका त्यागपूर्वक उपभोग करना। सब सम्पदा को ईश्वरीय सम्पदा समझकर उपभोग करना व अनुचित साधनों से भौतिक सम्पदा कासंग्रह से बचना चाहिए।
ब्रह्मचर्य:— ब्रह्मचर्य का विराट दृष्टि में अभिप्राय है ब्रह्म अर्थात ईश्वरीय चर्या लेकिन इसे ये कतई नही समझना कि हम सन्तानोतपत्ति के विरुद्ध है। परिवार वृद्धि के साथ साथ हम धर्म सम्मत चर्या का पालन करते चले।
जैन धर्म के पँचमहाव्रत केवल एक धर्म के लिए ही नही, अपितु समस्त मानव समाज के कल्याण की कामना समाई हुई है। आज चारो ओर अशांति का कोलाहल सुनाई देता है, उसके मूल में पँचमहाव्रतो की पालना का नितांत अभाव दिखाई देता है।
न हमारे परिवारों में कभी इन पर चर्चा होती है, ना समाज के प्रबुद्ध नागरिकों की दृष्टि में ये सब दिखाई देता है।
गुरुभवन्तो और सद्धगुरुवर्याओ के सानिध्य से ही हम पँचमहाव्रतो के मार्ग पर चलने का साहस कर सकते है।
लेकिन कहते है भगवान की कृपा के बिना भी सन्त सानिध्य नही मिलता है।
बिना हरि कृपा मिले नही सन्ता।
हमे इसके लिए अपने अन्तस्थ में पात्रता विकसित करनी होगी।
सादर।
पवन कुमार जैन परवेणी
जयपुर