श्री पल्लीवाल जैन डिजिटल पत्रिका

अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

(पल्लीवाल, जैसवाल, सैलवाल सम्बंधित जैन समाज)

पल्लीवाल समाज और जैन संस्कृति : हमारी गौरवशाली विरासत एवं उत्तरदायित्व

“धर्म केवल पूजा-पाठ का विषय नहीं, बल्कि जीवन जीने की श्रेष्ठ कला है।” जैन धर्म ने मानवता को अहिंसा, सत्य, करुणा, संयम और आत्मकल्याण का जो दिव्य संदेश दिया है, वह आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना हजारों वर्ष पूर्व था। जैन धर्म की इस गौरवशाली परम्परा को संरक्षित और संवर्धित करने में पल्लीवाल जैन समाज का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है।
पल्लीवाल समाज में जैन धर्म के अलग-अलग मतों, विचारधाराओं और समूहों यथा दिगंबर,श्वेतांबर स्थानकवासी, तेरापंथ, मंदिर मार्गी (मूर्तिपूजक) तपोगच्छ और खरतरगच्छ इन विभिन्न संप्रदाय को मानने वाले अनुयायी होते हुए भी पल्लीवाल समाज संगठित रहा है।

पल्लीवाल समाज सदैव धर्म, संस्कृति, शिक्षा, सेवा और संगठन के क्षेत्र में अग्रणी रहा है। समाज ने न केवल व्यापार और सामाजिक क्षेत्र में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई, बल्कि जिनशासन की प्रभावना, मंदिर निर्माण, साधु-साध्वी भगवंतों की सेवा, धर्मशालाओं एवं पाठशालाओं की स्थापना तथा समाजहित के अनेक कार्यों द्वारा धर्म के प्रति अपनी गहन आस्था का परिचय दिया।
आज का युग विज्ञान और आधुनिकता का युग है। भौतिक सुख-सुविधाओं की होड़ में मनुष्य मानसिक अशांति, तनाव और नैतिक पतन की ओर बढ़ रहा है। ऐसे समय में जैन धर्म के सिद्धांत मानव जीवन को नई दिशा प्रदान करते हैं। भगवान महावीर का संदेश – “जियो और जीने दो”, अहिंसा परमो धर्मः तथा अनेकांतवाद आज विश्व शांति और सामाजिक समरसता के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।
हमारा समाज तभी उन्नति करेगा जब हमारी नई पीढ़ी अपनी संस्कृति और धार्मिक मूल्यों से जुड़ी रहेगी। वर्तमान समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है कि हम अपने बच्चों और युवाओं में धार्मिक संस्कारों का सिंचन करें। घर-घर में जिनवाणी का अध्ययन हो, बच्चों को पाठशाला एवं संस्कार केन्द्रों से जोड़ा जाए, धार्मिक आयोजनों में उनकी सक्रिय सहभागिता सुनिश्चित की जाए तथा उन्हें अपने गौरवशाली इतिहास से परिचित कराया जाए।

जैन धर्म हमें केवल आत्मकल्याण का मार्ग नहीं दिखाता, बल्कि समाज और राष्ट्र के प्रति अपने दायित्वों का भी बोध कराता है। सेवा, सहयोग, जीवदया, पर्यावरण संरक्षण, शिक्षा एवं सामाजिक सद्भाव जैसे कार्य भी धर्म साधना का ही एक रूप हैं। यदि हम अपने जीवन में धर्म के इन मूल्यों को आत्मसात कर लें तो समाज में अनेक समस्याओं का समाधान स्वतः ही हो सकता है।
पल्लीवाल समाज की एक विशेषता उसकी संगठन शक्ति और पारस्परिक सहयोग की भावना रही है। समय-समय पर समाज ने यह सिद्ध किया है कि जब हम एकजुट होकर कार्य करते हैं तो बड़े से बड़ा लक्ष्य भी सहजता से प्राप्त किया जा सकता है।

परंतु आज समाज में एकता का अभाव हो रहा है तथा गुटबाजी बढ़ गई है। आज आवश्यकता है कि हम आपसी मतभेदों से ऊपर उठकर समाज की एकता, युवा शक्ति के विकास, महिला सशक्तिकरण और धार्मिक जागृति के लिए मिलकर कार्य करें।
आइए, हम सभी यह संकल्प लें कि—
जैन धर्म के सिद्धांतों को अपने जीवन में अपनाएँगे।
नई पीढ़ी को धार्मिक एवं नैतिक संस्कार प्रदान करेंगे।
समाज में एकता, सद्भाव और सहयोग की भावना को मजबूत करेंगे।
जीवदया, सेवा और पर्यावरण संरक्षण के कार्यों में सक्रिय भागीदारी निभाएँगे।
जिनशासन की प्रभावना और समाज के उत्थान के लिए निरंतर प्रयासरत रहेंगे।

अंततः यही कहा जा सकता है कि हमारी सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत केवल गर्व करने की वस्तु नहीं, बल्कि उसे सुरक्षित रखने और आगे बढ़ाने की एक पवित्र जिम्मेदारी भी है। यदि हम अपने पूर्वजों के आदर्शों और जैन धर्म के सिद्धांतों को जीवन में उतार सकें, तो निश्चित ही हमारा समाज और आने वाली पीढ़ियाँ एक उज्ज्वल, संस्कारित और समृद्ध भविष्य की ओर अग्रसर होंगी।
“धर्मो मंगल मुक्किट्ठं, अहिंसा संजमो तवो।
देवा वि तं नमंसंति, जस्स धम्मे सया मणो॥”

अर्थात् – धर्म ही सर्वोत्तम मंगल है, जिसमें अहिंसा, संयम और तप समाहित हैं। जिनका मन सदा धर्म में स्थित रहता है, देवता भी उन्हें नमस्कार करते हैं।
जय जिनेन्द्र।

महावीर प्रसाद जैन
सेवा सेवानिवृत्त निदेशक सांख्यिकी
64, सूर्यनगर, तारों की कूंट, टोंक रोड,
जयपुर

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