श्री पल्लीवाल जैन डिजिटल पत्रिका

अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

(पल्लीवाल, जैसवाल, सैलवाल सम्बंधित जैन समाज)

लोक अकृत्रिम है

जैन आचार्य श्री मेघनंदी के दर्शन को दूर-दूर से आए विद्वान, श्रावक और जिज्ञासु बैठे थे। बीच में ऊँचे आसन पर आचार्य श्री विराजमान थे। उनके सामने काशी के प्रसिद्ध पंडित सोमदेव खड़े थे। वे तर्कशास्त्र के बड़े विद्वान माने जाते थे और कठिन से कठिन प्रश्न उठाने के लिए प्रसिद्ध थे।

सोमदेव ने कहा,
“आचार्यवर, मेरी एक शंका है। आप कहते हैं कि यह लोक किसी ईश्वर द्वारा बनाया हुआ नहीं है, बल्कि अनादि है, स्वयं से स्थित है। पर यह बात साधारण बुद्धि को सहज नहीं लगती। हम जो कुछ देखते हैं—धरती, पर्वत, नदियाँ, अग्नि, वायु, शरीर, वृक्ष—यह सब इतनी व्यवस्था से भरा है कि मन में प्रश्न उठता है: यदि इसे किसी ने बनाया नहीं, तो फिर यह बना कैसे?”

सबकी दृष्टि आचार्य श्री पर टिक गई। आचार्य श्री ने शांत स्वर में कहा,
“सोमदेव, पहले यह समझो कि लोक क्या है। जहाँ जीव हैं, जहाँ पदार्थ हैं, जहाँ जन्म-मरण और परिवर्तन का व्यवहार है—उसी को लोक कहते हैं। यह संपूर्ण आकाश नहीं है, आकाश का एक भाग है। आकाश अनंत है, पर उसका वह भाग जहाँ जीव और अजीव द्रव्य विद्यमान हैं, वही लोक है।

“और सुनो—लोक अकृत्रिम है। इसे किसी ने बनाया नहीं। यह अनादिनिधन है—न इसका कोई आरंभ है, न ऐसा अंत कि इसकी सत्ता ही मिट जाए। इसमें रूप बदलते हैं, अवस्थाएँ बदलती हैं, पर लोक की व्यवस्था किसी कारीगर के हाथों खड़ी नहीं की गई। यह द्रव्यों के स्वभाव से सिद्ध है।”

पंडित सोमदेव ने पूछा,
“आचार्यवर, यदि लोक बना हुआ नहीं है, तो इसमें यह विविधता कहाँ से आई? धरती अलग, जल अलग, अग्नि अलग, वायु अलग—और इन सबके भीतर भी अनगिनत रूप! यदि कोई बनाने वाला नहीं, तो यह भिन्नता कैसे हुई?”

आचार्य श्री बोले,
“इसका कारण समझने के लिए द्रव्य और पर्याय का भेद समझो। द्रव्य नित्य है, पर्याय बदलती है। जो अपनी सत्ता में बना रहता है, वह द्रव्य है; और जो उसकी बदलती हुई अवस्था है, वह पर्याय है।

“सोना वही रहता है, पर कभी हार बनता है, कभी कंगन, कभी अंगूठी। रूप बदल गया, नाम बदल गया, उपयोग बदल गया—पर सोना वही रहा। इसी तरह इस लोक में द्रव्य नित्य हैं, पर उनकी पर्यायें बदलती रहती हैं। विविधता उन्हीं पर्यायों की है, द्रव्य की नहीं।”

सभा में बैठे कुछ लोग अब ध्यान से सिर हिलाने लगे। आचार्य श्री ने आगे कहा,
“इस दृश्य जगत के भौतिक रूपों को समझने के लिए पुद्गल को समझना होगा। जो रूप धारण करता है, जो मिलन और बिखराव में आता है, वह पुद्गल है। मिट्टी, पत्थर, जल, अग्नि, वायु, धूल, धुआँ, शरीर—ये सब पुद्गल के भिन्न-भिन्न रूप हैं।

“अब प्रश्न उठता है कि पुद्गल का सबसे छोटा रूप क्या है। उसका उत्तर है—परमाणु। पुद्गल का परमाणु अत्यंत सूक्ष्म है। वह एक प्रदेशी है, अर्थात् एक ही प्रदेश घेरता है। वह आँखों से दिखाई नहीं देता, पर उसकी सत्ता है।”

पंडित सोमदेव ने पूछा,
“यदि परमाणु इतना सूक्ष्म है, तो यह स्थूल संसार उससे कैसे बना?”

आचार्य श्री ने कहा,
“एक-एक परमाणु अलग भी रहता है और संयोग भी करता है। जब परमाणु मिलते हैं, तो स्कन्ध बनते हैं—छोटे भी, बड़े भी। दो परमाणु मिलें तो छोटा समूह, अनेक मिलें तो बड़ा समूह। यही स्कन्ध आगे चलकर सूक्ष्म और स्थूल रूप धारण करते हैं।

“जैसे एक-एक ईंट से दीवार बनती है, और अनेक दीवारों से पूरा भवन खड़ा होता है, वैसे ही परमाणुओं के समूह से स्थूल पदार्थों की रचना होती है। एक-एक बूंद छोटी लगती है, पर वही बूंदें मिलकर घड़ा भर देती हैं। उसी प्रकार परमाणु मिलकर स्कन्ध बनाते हैं, और स्कन्ध अनगिनत रूपों में प्रकट होते हैं।”

पंडित ने कहा,
“तो क्या पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु भी इन्हीं स्कन्धों के रूप हैं?”

आचार्य श्री ने उत्तर दिया,
“हाँ। द्विप्रदेशी और उससे बड़े जितने भी स्कन्ध हैं, वे अपने-अपने परिणमन से अनेक रूप धारण करते हैं। कोई पृथ्वी रूप में प्रकट होता है, कोई जल रूप में, कोई तेज रूप में, कोई वायु रूप में। रूपों का वैभव अनंत है, पर आधार पुद्गल ही है।

“मिट्टी को देखो। वही मिट्टी कहीं घड़ा बनती है, कहीं दीया, कहीं ईंट, कहीं मूर्ति। देखने वाले को वे सब अलग वस्तुएँ लगती हैं, पर मूल में सब मिट्टी ही हैं। उसी तरह यह संसार बाहर से भले ही असंख्य रूपों में बँटा दिखाई दे, पर पुद्गल के स्तर पर वह निरंतर परिणमन करता हुआ एक ही द्रव्य है।”

सभा में बैठे एक युवक ने हाथ जोड़कर पूछा,
“गुरुदेव, क्या लोक केवल इन्हीं स्थूल पदार्थों से भरा है जिन्हें हम देख सकते हैं?”

आचार्य श्री ने उसकी ओर देखकर कहा,
“नहीं। लोक में केवल स्थूल पुद्गल ही नहीं हैं, सूक्ष्म पुद्गल भी अनंत हैं। जो आँखों से दिखता है, वह सब कुछ नहीं है। बहुत कुछ ऐसा भी है जो हमारी इन्द्रियों की पकड़ में नहीं आता, फिर भी अस्तित्व रखता है। इसलिए लोक को केवल दृश्य पदार्थों तक सीमित मत समझो।”

फिर आचार्य श्री ने सभा की ओर देखते हुए कहा,
“अब अपने प्रश्न पर लौटो, सोमदेव। तुम पूछते थे—‘यदि किसी ने लोक को बनाया नहीं, तो यह बना कैसे?’ इसका उत्तर यही है कि लोक कोई बनाई हुई वस्तु नहीं है। यह अनादि द्रव्यों का क्षेत्र है। द्रव्य अपने स्वभाव से विद्यमान हैं, और अपनी-अपनी पर्यायों में परिणमित होते रहते हैं। इसी परिणमन से तुम्हें विविधता दिखाई देती है।

“जो घड़ा बनता है, उसका कुम्हार होता है; जो वस्त्र बनता है, उसका बुनकर होता है। पर लोक घड़ा या वस्त्र नहीं है। लोक अनादि है, अकृत्रिम है। इसे किसी ने रचा नहीं, यह अपने स्वभाव से स्थित है।”

पंडित सोमदेव कुछ देर तक मौन खड़े रहे। फिर उन्होंने धीरे से कहा,
“आचार्यवर, अब मेरी भूल समझ में आ रही है। मैं लोक को भी घड़े और भवन की तरह एक बनी हुई वस्तु समझकर प्रश्न कर रहा था। इसलिए मुझे उसके पीछे कोई कर्ता चाहिए था। पर अब स्पष्ट हो गया कि लोक का प्रश्न उस प्रकार का नहीं है। यहाँ द्रव्य नित्य हैं, रूप बदलते हैं; और इसी से यह सारी व्यवस्था खड़ी है।”

आचार्य श्री ने शांत स्वर में कहा,
“जहाँ द्रव्य और पर्याय का भेद समझ में आ जाता है, वहाँ बहुत-सी शंकाएँ अपने आप शांत हो जाती हैं।”

पंडित सोमदेव ने दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम किया। सभा में बैठे लोगों के चेहरों पर संतोष था। उस दिन ज्ञान-सभा में कोई कोलाहल नहीं हुआ, कोई उत्तेजना नहीं हुई—केवल इतना हुआ कि लोक, परमाणु और पुद्गल का एक कठिन विषय सबकी समझ में कुछ और सरल होकर उतर गया।

त्रिभुवन जैन
कोटा

Leave a Reply