श्री पल्लीवाल जैन डिजिटल पत्रिका

अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

(पल्लीवाल, जैसवाल, सैलवाल सम्बंधित जैन समाज)

क्यों होते हैं असफल सामाजिक आन्दोलन/अभियान

पिछले कुछेक वर्षों में अनेक आन्दोलन/अभियान जैन समाज द्वारा चलाये गये। कुछ अभियान संतो द्वारा प्रेरित थे तो कुछ अन्य नेताओं या व्यक्ति विशेष द्वारा प्रेरित। लेकिन यह देखने में आया कि प्रत्येक अभियान प्रायः असफल ही रहे। इन असफल आन्दोलनों / अभियानों की सूची लम्बी है। लाल किले से मांस उत्पादन के विरोध में आह्वान, मांस निर्यात का विरोध, बूचड़खाने खुलने का विरोध, गिरनार आन्दोलन, अल्पसंख्यक मुद्दा आदि कुछ ऐसे कार्य हैं जो स्पष्टत यह बतलाते है कि हम अपने मकसद में सफल नहीं हो पाये हैं।

अच्छे कार्यों के लिए आन्दोलन करना, अभियान चलाना या आह्वान करना अच्छी बात है। सफल न भी हों तो कोई बात नहीं, कम से कम प्रयास तो किया; यह सोचकर ही हम आये दिन कुछ न कुछ नए आन्दोलन, अभियान आह्वान आदि की बातें सुनते रहते हैं, करते रहते हैं। लेकिन कभी हम तनिक ठहरकर यह नहीं सोचते कि आखिर ये आन्दोलन/अभियान असफल क्यों होते रहे हैं? हम इन कारणों की जड़ तक नहीं पहुँच पाए हैं जिनकी वजह से हम असफल रहे हैं। मैं तो यह मानता हूँ कि हम उन कारणों की जड़ तक पहुँचना ही नहीं चाहते हैं।

अधिकतर अभियान या आन्दोलन व्यक्ति विशेष, वर्ग विशेष, साधु विशेष या आचार्य विशेष द्वारा प्रेरित या प्रारंभ किए गए होते हैं। इनमें से बहुत से तो ऐसे महानुभावों द्वारा प्रेरित होते है जो सुन्दर पोस्टर छप जाने सुन्दर पाण्डाल लग जाने तथा हजार पांच सौ की भीड़ इकट्ठी हो जाने को ही अपनी बहुत बड़ी सफलता मानते हैं तथा अपनी पीठ अपने आप ही थपथपा लेते हैं। साथ ही स्वयं को यह कहकर संबोधित करा जाना पसंद करते हैं (अमुक) आन्दोलन प्रवर्तक’ आदि। कुछ संत या व्यक्ति अपने को इस बात से धन्य मान लेते हैं कि इस आन्दोलन से कुछ प्राप्त हो या न हो, मेरे संपर्क में चार-पांच राष्ट्रीय स्तर के राजनेता तो आ ही गये। कुछ संत इन आन्दोलनों के कारण आचार्य पद भी पा लेते हैं। लेकिन इस प्रकार के व्यक्तिगत लाभ से व्यक्ति-विशेष खुश हो ले, नुकसान तो जैन धर्म का ही होता है।

हमने यह महसूस किया है कि प्रत्येक चाहता है कि वह सुन्दर महल सरीखा दिखे जिसे देखकर हर कोई उसकी तारीफ करे, कोई भी इस सुन्दर महल की नींव का पत्थर नहीं बनना चाहता है। प्रत्येक चाहता है कि अमुक आन्दोलन मैंने चलाया है, अतः मैं ही इसका अगुआ रहूँ, इस संबंध में मैं ही एकमात्र प्रवक्ता व नेता रहूँ। बाकी सब लोग मेरा अनुसरण करें और जब आन्दोलन असफल होता है तो गाते फिरते हैं कि अच्छे कार्यों में भी लोग सहयोग नहीं देते हैं। मैं उनसे ही पूछना चाहता हूं कि लोग आपको सहयोग क्यों दें? क्या कोई कदम उठाने से पहले आपने उन लोगों का विश्वास प्राप्त किया था? क्या आपने लोगों को इन कार्यों के लिए आगे आने के लिए प्रेरित किया था? या फिर स्वयं ‘एकला चालो रे’ की तर्ज पर चल पड़े? एकला चालो तब ही और सिर्फ तब ही सफल होगा जब हम स्वयं को नींव का पत्थर बनायें।

आज मेरे दिमाग में आया कि मांसाहार गलत है। तमाम जीवों की हत्या होती है, अतः जीवदया की भावना से प्रेरित होकर मुझे मांसाहार विरोध का अभियान छेड़ देना चाहिए और साथ ही यह भी विचार बना लिया कि बस कल ही मैं इस कार्य में सफल हो जाऊंगा। तमाम पर्चे छपवा दिए पत्र-पत्रिकाओं में अपने नाम से विज्ञप्ति छपवा दीं तो आप क्या सोचते हैं कि सभी लोग मेरे नेतृत्व को स्वीकार करके मेरे साथ हो लेंगे। कदापि नहीं। मांसाहार का विरोधी मात्र मैं नहीं हूँ, या मात्र जैन समाज ही नहीं है, अन्य धर्मों के लोग भी मांसाहार के विरोधी है। यदि मैं तहेदिल से चाहता हूं कि मांसाहार का विरोध हो तो मेरा उद्देश्य मात्र एक होना चाहिए इस अभियान की सफलता, न कि स्वयं का प्रचार। यदि यह अभियान किसी व्यक्ति विशेष या संत विशेष द्वारा प्रेरित है तो उसे चाहिए कि पहले वह अपने समाज के सभी वर्गों, अपने धर्म के सभी सम्प्रदायों के लोगों का नेताओं का तथा साधु संतों का विश्वास प्राप्त करे। इसके पश्चात् जो अन्य धर्मों के नेता, धर्म गुरु है उनका विश्वास प्राप्त करे तथा इन सबों में जो अधिक कद्दावर है उसे उस अभियान का नेता बनायें, तब तो अभियान सफल होगा अन्यथा नहीं। लोग इस मार्ग को नहीं अपनाते हैं क्योंकि ऐसा करने में अन्य नेताओं / धर्मगुरुओं के सामने स्वयं को बोना पाते हैं। वस्तुतः जो लोग कुण्ठा से ग्रस्त हैं वे दूसरों की श्रेष्ठता कभी स्वीकार नहीं करते हैं और यदि ऐसा है तो समझ लेना चाहिए कि उनकी रुचि अभियान के सफल होने से अधिक स्वयं के प्रचार की ही है।

मुझे एक बात याद आई है, कुछ समय पहले हमने एक छोटी सी सूचना जैन पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित करवाई थी कि हवाई जहाजों में जैन भोजन की व्यवस्था रहती है, अतः हवाई यात्रा के दौरान हमको जैन भोजन ही मांगना चाहिए। साथ ही हमने उन नेताओं का भी आभार माना जिनके श्रम से ऐसा संभव हो पाया। यह पढ़कर भोपाल के हमारे वरिष्ठ श्री सुरेश जी जैन (रिटायर्ड आईएएस) का पत्र मिला। उन्होंने स्पष्ट किया कि हवाई यात्रा के दौरान जो जैन भोजन की व्यवस्था उपलब्ध है वह वस्तुतः किसी जैन के प्रयासों का फल नहीं है (जैनों को यह सब सोचने की फुर्सत ही कहाँ है)। यह तो ‘हरे रामा, हरे कृष्णा’ (ISKON) वालों के प्रयासों का फल है कि हवाई यात्रा के दौरान ऐसा भोजन उपलब्ध हो पा रहा है। और यही उनकी उदारता है कि उन्होंने उस मोजन का नाम ‘जैन भोजन’ देना सहर्ष स्वीकार कर लिया, उन्होंने यह आग्रह नहीं रखा कि उसका नाम इस्कोन भोजन रखा जाये। हुआ यूँ कि अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर एक प्रस्ताव आया कि ISKON के अनेक अनुयायी हवाई यात्रायें करते हैं लेकिन उनको इन यात्राओं में शुद्ध भोजन नहीं मिल पाता है। शुद्ध भोजन से उनका तात्पर्य था कि शुद्ध शाकाहारी बिना प्याज लहसुन आदि के। उनके इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया गया। लेकिन समस्या यह थी कि इस भोजन को नाम क्या दें। जब इस बात पर विचार चल रहा था तभी संयोग से श्री सुरेश जैन भी वहीं थे। उन्होंने कहा कि ऐसा भोजन तो जैन भी करते हैं अतः इसे ‘जैन भोजन’ नाम दिया जा सकता है। यह प्रस्ताव ISKON वालों के पास पहुंचा तब उन्होंने कहा कि इससे हमें क्या फर्क पड़ता है कि उसे क्या नाम दिया जाए, हमारा उद्देश्य तो मात्र अपने लोगों को हवाई यात्रा के दौरान शुद्ध भोजन उपलब्ध करवाना है। उनकी इस निस्वार्थ एवं उदार भावना के कारण ही आज हवाई जहाजों में ‘जैन भोजन’ उपलब्ध है।

एक ओर तो काम करवाने में यह भावना है दूसरी ओर भावना यह है कि काम हो या न हो, नाम मेरा ही होना चाहिए। पता नहीं बहुत पहले अंग्रेजी नाटककार व लेखक शेक्सपियर क्यों लिख गया कि ‘नाम में क्या रखा है। आज तो लगता है कि नाम में ही सब कुछ रखा है।

अभी हाल के दिनों में गिरनार आन्दोलन भी चलाए गए और प्रायः हम असफल ही रहे। व्यक्ति विशेष या संत विशेष द्वारा दो चार हजार लोगों को लेकर जुलूस निकाल लेने या अनशन पर बैठ जाने से काम चल ही नहीं सकता। एक सौ चालीस करोड़ की आबादी वाले भारत में ऐसी छोटी-मोटी घटनायें तो आये दिन होती ही रहती हैं। यदि हम इस कार्य में सफल होना चाहते हैं तो सबसे पहले सब दिगम्बरों को एकहोना होगा। सभी को विश्वास में लेना होगा। नेतृत्व और मार्गदर्शन उसका ही स्वीकार करना होगा जो प्रभावक और कद्दावर है। हर कोई अपने को नेता न समझे। हर कोई सिपाही हो सकता है, सेनापति नहीं। इसके पश्चात् श्वेताम्बरों को भी विश्वास में लेना होगा, भले ही पांचवी टोंक पर वे अपना (जैन) का अधिकार वर्षों पहले ही छोड़ चुके हों। ध्यान रहे, गुजरात में जैनों की जनसंख्या चार प्रतिशत से अधिक है। अनेक जैन यहाँ की राजनीति में अच्छी दखल रखते हैं। जैनों का गुजरात के अन्दर कोई भी अभियान बिना श्वेताम्बर भाईयों के सहयोग के हो ही नहीं सकता है। अतः पहले आपस में बैठकर एकमत होना होगा तभी सफलता मिल सकती है।

अन्त में मैं सभी से यह निवेदन करना चाहता हूँ कि यदि हम भविष्य में कभी कोई राष्ट्रीय स्तर का आन्दोलन/अभियान प्रारंभ करना चाहते हैं तथा उसको हम सफल होते देखना चाहते हैं तो निम्न बातों का अवश्य ध्यान रखा जाये-

आन्दोलन प्रारंभ करने से पहले जैन समाज के सभी वर्गों, घटकों एवं आम्नायों आदि का विश्वास प्राप्त करा जाये।

सर्वसम्मति से किसी विशिष्ट प्रभावशाली व्यक्ति को इसका नेता बनाया जाये। विशेष मुद्दों को पंथ और आम्नाय से ऊपर उठकर देखा जाये।शाकाहार जैसे मुद्दों पर जैनेतर लोगों का भी विश्वास प्राप्त किया जाये क्योंकि मांसाहार के विरोधी मात्र जैन ही नहीं हैं।

आत्मप्रशंसा या प्रसिद्धि के बजाए जिनशासन की प्रभावना का ध्यान रखा जाये।

कोई भी कदम बहुत सोच समझकर सभी संभावनाओं को ध्यान में रखकर उठाया जाये। आमरण अनशन जैसे गंभीर कदम को उठाने से पहले कई बार विचार किया जाये।

कोई भी कदम उठाने से पहले या वापस लेने से पहले यह अवश्य ध्यान रखा जाये कि उससे जैनधर्म की अवमानना न हो, मजाक न बने। यदि हम कुछ इसप्रकार की बातों को ध्यान में रखकर कोई आन्दोलन या अभियान छेड़ेंगे तो निश्चित रूप से हमें सफलता मिलेगी।

डॉ. अनिल कुमार जैन
D-197, मोती मार्ग, बापू नगर, जयपुर

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