श्री पल्लीवाल जैन डिजिटल पत्रिका

अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

(पल्लीवाल, जैसवाल, सैलवाल सम्बंधित जैन समाज)

लोभ पाप का बाप

किसी नगर में एक पंडित जी थे, वे पत्नि के आग्रह करने पर काशी पढ़ने गये । क्यों कि पत्नि कहती थी अगर आप पढ़े होते तो आपको पिता का पुरोहित पद प्राप्त हो जाता । पंडित जी को बात समझ में आ गई और पंडित जी काशी पढ़ने के लिये गये तथा १२ वर्ष तक काशी में पढ़कर सभी प्रकार की विद्या में निपुण हो गये। पुराने समय में गाड़ी वगैरह नहीं चलती थी, तो पैदल ही जाना पड़ता था। पंडित जी भी काशी पैदल ही गये । और काशी से पढ़ कर पैदल ही वापिस आये, उन्होंने पत्नि को सारी बात बताई कि मैं तुम्हारे कहने पर काशी से पढ़ के आ गया हूँ और सारी उपाधियाँ लेकर के आया हूँ। पत्नि खुश हो गई कि, धन्य है मेरा जीवन । एक दिन पत्नि ने कहा-हे स्वामी ! मेरा एक प्रश्न है। पंडित जी ने कहा-आपका क्या प्रश्न है कहो मैं तुम्हारे हर प्रश्न का उत्तर दूँगा? संसार का कोई भी व्यक्ति मुझे हरा नहीं सकता है। तब पत्नि ने कहा बताओ पाप का बाप क्या है ? तब पंडित जी बोले-फिर से कहो तुमने क्या कहा? पत्नि ने पुनः प्रश्न को दुहराया। पंडित जी ने जैसे ही प्रश्न को सुना वे विचार मग्न हो गये और बोले यह भी कोई प्रश्न है। मैंने इतनी पढ़ाई की, लेकिन उसमें ऐसा कोई पाठ नहीं पढ़ा है जिसमें ऐसा प्रश्न हो। फिर भी पंडित जी अपना बस्ता उठाते हैं और सारी किताबों के एक-एक पेज खोल करके देखते हैं, शब्दकोश देखते हैं लेकिन पंडित जी को कुछ नहीं मिलता। पत्नि बोली-अभी आपकी पढ़ाई पूरी नहीं हुई। पंडित जी भी स्वीकार करते हैं। पत्नि पुनः कहती है- जाओ पुनः पढ़ के आओ। पंडित जी पुनः अध्ययन हेतु गये । रास्ते में रात हो जाने से एक घर के दरवाजे पर पड़ाव डाला और उस घर की दहलान में सो गये जैसे ही सुबह हुई। उस घर की मालकिन ने दरवाजा खोला। पंडित जी को सोता देखकर वह प्रसन्न हो गई और बोली आप कौन हैं ? कहाँ से आ रहे हैं? कहाँ जा रहे हैं? पंडित जी बोले-मैं जाति से ब्राह्मण हूँ। काशी से लौटा था पढ़ के, लेकिन मेरी पत्नि … (पूरी घटना सुनाते हैं) और पुनः पढ़ने जा रहा हूँ। वह कहती है पंडित जी, मेरा घर पवित्र हो गया, आपके चरण पड़ने से। पंडित जी भी पूछ लेते है आप कौन हैं ? वह कहती है- मैं एक वेश्या हूँ। इतना सुनते ही पंडित जी कहते हैं-अरे-अरे यह क्या हो गया? मैं किसके दरवाजे पर लेट गया ? अब तो मुझे प्रायश्चित लेना पड़ेगा, पूजा-पाठ करना पड़ेगा। वह कहती है-अरे पंडित जी कोई बात नहीं, आप प्रायश्चित ले लेना, आपके पूजा-पाठ का सारा खर्च आपको मैं दे दूंगी। पंडित जी बोले ठीक है। फिर वेश्या ने कहा-पंडित जी आप स्नान करके भोजन-पानी करके जायें क्योंकि आप चलकर आये थे और चलकर जाना होगा तो थक जायेंगे फिर भोजन बनायेंगे। पंडित जी ने कहा-नहीं । वेश्या बोली- पंडित जी आपको प्रायश्चित में पूजापाठ ही करवाना है, मैं आपको एक और थैली दे दूंगी। तो पंडित जी उस भरी थैली को देखकर तैयार हो गये और बोले कि सीदा यानि आटा मेरा होगा। वह बोली-ठीक है। और पंडित जी स्नान करके भोजन बनाते हैं चूल्हे को फूँकने से परेशान, आँखे लाल हो गई। वेश्या ने जब पंडित जी को देखा तो बोली-पंडित जी एक और प्रायश्चित ले लेना और उसके लिये मैं आपको एक और थैली दे दूँगी, खाना मैं बनाये देती हूँ। और पंडित जी तैयार हो गये और वह वेश्या भोजन बना देती है। अब पंडित जी भोजन करने को तैयार होते हैं। तो वेश्या बोली- पंडित जी, मेरी एक और प्रार्थना है कि अगर मैं आपको एक ग्रास मुख में खिला दूँ तो मेरा तन-मन पवित्र हो जायेगा मैं आपको प्रायश्चित तथा पूजापाठ के लिये एक और थैली दे दूँगी, आपको जितनी बड़ी पूजा-पाठ करना है कर लेना। अतः आप एक और प्रायश्चित ले लेना । पंडित जी का लालच बढ़ जाता है वे उसे स्वीकार कर लेते हैं। वेश्या ग्रास उठाती है और पंडित जी के मुख के पास ले जाती है, जैसे ही पंडित जी मुख खोलते हैं वेश्या मुख में ग्रास देने के स्थान पर पंडित जी के गाल पर एक चाँटा मार देती है। पंडित जी बोले यह क्या किया ? वेश्या बोली-पंडित जी, यही आपके प्रश्न का उत्तर है। पंडित जी यह कैसे ? वेश्या बोली-पंडित जी आपका प्रश्न था पाप का बाप क्या है तो लोभ पाप का बाप है। अतः हमें धन के लिये चारित्र को, धर्म को नहीं खोना चाहिये ।

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