लोभी की दशा
कुछ समय पूर्व की बात है उज्जैनी नगरी में एक परिवार गरीब और कठिन परिस्थितियों से जीवन यापन करने वाला था। उसी परिवार में दो बेटे हुए एक का नाम हीरालाल और दूसरे का नाम बहादुरसिंह था। दोनों भाई लकड़ी बेचकर अपनी उदरपूर्ति करते थे। विशेषता यह थी कि हीरालाल जब लकड़ी बाजार में ले जाता था तो तत्काल अच्छे दामों में बिक जाती थी। बहादुरसिंह भी वैसी ही मेहनत करके हीरालाल से अच्छी और अधिक लकड़ी लाता था किन्तु वह देर से और कम दामों में बिकती थी। जिससे बहादुर परेशान था। अब वह हीरालाल से द्वेष रखने लगा एक दिन उसने सोचा कि हीरालाल को मार डाला जाये फिर बाजार में मेरी लकड़ी अच्छे दामों में बिक जायेगी । गर्मी के दिन थे दोनों भाई घर से जंगल साथ में गये, रास्ते में बहादुरसिंह अनेक प्रकार की बातें करता हुआ बोला-भैया आज पहले आप अपना पानी खर्च कर लीजिए बाद में मैं अपना खर्च कर लूँगा। हीरालाल तो सरल और निर्लोभी था उसने कहा ठीक है। बहादुर ने उसका पूरा पानी खर्च कर दिया थोड़ी देर बाद जब हीरालाल को प्यास लगी तो भैया से पानी माँगा। बहादुरसिंह ने कहा कि मैं पहले आपकी एक आँख फोडूंगा तब पानी दूँगा। उसने सोचा कि यह मजाक कर रहा है मेरा भाई आँख नहीं फोड़ सकता। हीरालाल ने सहज में कह दिया फोड़ लीजिए लेकिन पानी दे दीजिये मेरा कण्ठ सूख रहा है। बहादुर ने वास्तव में भाई की एक आँख फोड़ दी। उसके बदले में एक अंजुलि पानी दे दिया। हीरालाल को मरण तुल्य कष्ट हो रहा था किन्तु निर्दयी भाई ने संवेदना तक प्रकट नहीं की। और अपनी लकड़ी इकट्ठी करने लगा, हीरालाल ने पुनः भैया से पानी माँगा तो बहादुर ने कहा कि मैं अब पानी तब दूंगा जब तुम्हारी दूसरी आँख फोड़ दूंगा। उसने सोचा कि मेरा भैया मुझे अंधा नहीं बना सकता। उसने सहज में कह दिया फोड़ लीजिए। उसने सचमुच दूसरी आँख भी फोड़ दी, इसके बदले में एक अंजुलि पानी देकर घर आ गया । बेचारा हीरालाल तड़फता रहा। यह है लोभी प्राणी की दशा ।
लोभ-अनर्थकारी
कौशाम्बी नगर में समुद्रदत्त नामका सेठ रहता था, उसकी स्त्री का नाम समुद्रदत्ता और उसके सागर दत्त नाम का पुत्र था। पुत्र उम्र में छोटा था लेकिन कुशाग्र बुद्धि का था। सेठानी अपने बेटे को स्वर्णाभूषणों से अलंकृत रखती थी क्योंकि उसका इकलौता बेटा था उसके पड़ोस में एक गोपायन नाम का यादव रहता था । उसका बेटा सोमक गरीब था। फटे-पुराने कपड़े पहनता, रूखा-सूखा भोजन करता और श्रेष्ठि पुत्र सागरदत्त के साथ खेलता था। दोनों एक दूसरे के घर भी जाते थे। बालकों के हृदय सच्चे और सरल होते हैं उनको खेलने से प्रयोजन चाहे गरीब का घर हो या अमीर का। एक दिन सागर दत्त सोमक के घर खेलने आया, सोमक की माँ गोपा श्रेष्ठी पुत्र के गले में स्वर्ण का हार देखकर उसे प्राप्त करने की सोचने लगी। गोपा के हृदय में वह हार बसा हुआ था। उसने सागर दत्त को घर बुलाया और कुछ खिलोने और पकवानों का लालच दिखाकर कमरे में बन्द करके मार डाला। उसकी लाश को कमरे के अन्दर ही गाड़ दिया, यह हाल सोमक देख रहा था। सेठ जी का बेटा जब घर नहीं आया तो खोजना प्रारम्भ कर दिया लेकिन कहीं भी उसका पता न चला। सेठ-सेठानी दोनों के ऊपर वज्र पात सा हो गया। एक दिन सेठानी के पास सोमक आया, उससे पूछा-बेटा सोमक, तुम्हारा मित्र सागर दत्त कहाँ गया ? उसने अपनी तोतली भाषा में कहा कि-सागर भैया हमारे घर में गड़ा है, हमारी माँ ने चाकू से मार कर जमीन में गाड़ दिया है। इस बात को सुनकर सेठानी ने पता लगाया तो वास्तव में सागर की लाश गोपा के घर में प्राप्त हुई। राजा ने इस बात को सुनकर गोपा से सागर दत्त के मारने का कारण पूछा तो उसने कहा कि मैं गरीब हूँ अपनी उदर पूर्ति के लिये बच्चे को मारा है। राजा ने फैसला दिया कि गोपा को मृत्यु शय्या पर सुलाया जाये इस प्रकार वह संक्लेश परिणामों से मर कर नरक गति को प्राप्त हुई ।
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