श्री पल्लीवाल जैन डिजिटल पत्रिका

अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

(पल्लीवाल, जैसवाल, सैलवाल सम्बंधित जैन समाज)

सच्ची-अच्छी माँ

जीवन में अंक अवश्य हो। अंक यानि माँ की गोद। अंक है तो सब कुछ है अन्यथा कुछ नहीं। जो संस्कार एक अच्छी व सच्ची माँ देती है। वह 100 शिक्षक मिलकर भी नहीं दे सकते। जो सुंदर सुंदर कपड़े पहने, श्रृंगार करे वह अच्छी तो हो सकती है परन्तु सच्ची हो ही यह अनिवार्य नहीं। सच्ची माँ ईमानदार होती है। वह बच्चे के प्रति लापरवाही नहीं करती। माँ पर दो जिम्मेदारी है- (1) बच्चा स्वस्थ हो जीवित रहे। (2) बच्चा अच्छा बने, उठे, छायादार वृक्ष बन जाए।

माँ-लालन-पालन तो सभी माताएँ कर लेती हैं। तिर्यंचिनी माँ भी ऐसा कर लेती है। रास्ते में एक पक्षी ने अंडा दिया और उसकी रक्षा के लिए 3 दिन तक उसी स्थान पर बैठी रही। भोजन किया कि नहीं यह भी पता नहीं। हिरणी बच्चे को जनम देती है। फिर खूंखार सिंह के आने पर भी प्राणपन से उसकी रक्षा करती है। बच्चे की प्रीति के कारण शक्ति न होते हुए भी सिंह से मुकाबला करने तैयार हो जाती है।

माँ का हृदय अत्यंत कोमल व ऊँचा होता है। छोटी सी चिड़ियाँ दाना लाती है और बच्चे के मुख में देती है। शेरनी भी शिकार से अधिक बच्चों पर दृष्टि रखती है। माँ बच्चों के स्वास्थ्य का ध्यान रखती है, डॉ. वैद्य को दिखाती, कपड़े अच्छे से अच्छा पहनाती है। स्वयं अभाव में रह लेती है परंतु बच्चों की मांग पूरी की जाती है। परंतु यह प्रकृति का सहज गुण-ममता है जो हर माँ में होता ही है। परंतु संस्कार देने वाली माँ विरली होती है। माँ की गोद बच्चे की प्राथमिक पाठशाला है। माँ बच्चे को बाल्यकाल में ही णमोकार मंत्र, प्रभु पतित पावन की विनती आदि सिखा देती है। जिस माँ ने अपने बालक को प्रभु का परिचय करा दिया कि देखो बेटा! ये हमारे भगवान् है वह माँ अच्छी तो है ही सच्ची भी है। जो माँ बालक के प्रश्नों का समाधान देती है वह माँ सच्ची है। जो माँ न तो स्वयं मंदिर जाए, न बच्चे को जाने दे वह न तो अच्छी है न सच्ची है क्योंकि उसने सुसंस्कारों को अवरुद्ध कर दिया है। सच्ची माँ तो बच्चे को पाठशाला भी भेजती है और मंदिर भी। सच्ची माँ कहती है- भगवान का दर्शन नहीं करेगा तो भोजन नहीं दूंगी। माँ को संस्कार देने के लिए कठोरता भी रखनी पड़ती है तभी वह सच्ची बन पाती है।

माँ व गुरु जीवन के सांचे हैं उन्हें न तो किशमिश बनना चाहिए न सुपारी। उन्हें तो नारियल बनना चाहिए। नारियल में दो गुण है (1) कठोरता (2) नम्रता। नारियल बाहर से कठोर व अंदर से मुलायम है। माँ कठोर न बने तो बच्चे के अंदर अच्छे संस्कार नहीं आ सकते। गुरु कठोर न हो तो शिष्य का विकास नहीं होगा, देश का शासक कठोर नहीं है तो देश की उन्नति नहीं होगी। देश की रक्षा संभव नहीं। जैसे नारियल का ऊपरी सतह कठोर न हो नारियल के अंदर के पानी व गूदे की रक्षा संभव नहीं। आज तुमने बच्चों को संस्कारों के सांचे में नहीं ढाला तो वृद्धावस्था में परेशान हो जाओगे। जो माँ बच्चों को गुरु चरणों में ले जाती है वह माँ बच्चे की जीवन निर्माता है। परंतु जहाँ संस्कार नहीं वहाँ बेटा, बाप का शत्रु है जान का दुश्मन बना है। माँ को बेटा वृद्धाश्रम की राह दिखा देते हैं। अखबार दुर्घटनाओं के समाचारों से भरे रहते हैं। इसका कारण हमारी ही ढ़ील, हमारा ही प्रमाद है, सत्य तो यह है कि आप स्वयं संस्कारवान नहीं तो बच्चों को क्या दे सकेंगे। आज की माता बच्चों को टी.वी., सिनेमा में भेजने से नहीं संकुचाती जबकि गुरु के पास भेजने में standard low हो जाता है। तो सोचिए? आपकी गति क्या होगी? जीवन का वास्तविक निर्माण तो गुरु चरणों में ही होता है। जब तक समाज में साधु संतों का सम्मान है वहाँ संस्कारों की हरियाली बनी रहेगी। क्योंकि गुरु अच्छे-अच्छे संस्कार जीवन में भर देते हैं। विनय, शिष्टाचार, भक्ति, सेवा सब गुरुओं का ही प्रसाद है। गुरु चरणों में जाने वाला सम्मान के साथ देखा जाता है। संस्कारवान परिवार बन जाता है। जहाँ आपने संस्कार के बीज नहीं बोये और वृद्धावस्था में सोचो कि मेरे घर भी आहार हो, मैं भी विधान पूजन करूँ। तो मात्र सोचते रहो अब सहयोगी कोई नहीं क्योंकि बीज तो बोये नहीं, वृक्षोत्पत्ति कैसे हो। यदि बचपन से ही आप स्वयं बच्चों को गुरु चरणों में ले जाते तो ये दिन न देखते।

माँ के अंक में बैठा बालक फिल्मी गाने न सीखे, Actor के, खिलाड़ियों के नाम न सीखे अपितु भगवान का नाम सीखे।
माँ में बालक व बालक में माँ दिखे। कहा भी गया है-

“Like mother like daughter

Like father like son

Like preceptor like student”.

माँ की झलक बच्चों में दिख जाती है। माँ संस्कारवान है तो उसके संस्कारों की झलक उसके बच्चों में दिखाई देती है। वैसे संस्कार बहुत से होते हैं। श्रावकों के 53 संस्कार होते हैं, विवाहिता के 16 संस्कार होते हैं और आजकल संस्कार चैनल प्रचलन में है। परंतु संस्कार वह महत्त्व का है जो आत्मा को दिया जाता है। बाह्य संस्कारों (सजाना, धजाना) से हमारी शोभा नहीं होती। अंदर से संस्कार, आत्मा को संस्कारित करते हैं।

अतः अपनी आत्मा को संस्कारित करने का प्रयत्न और प्रयास करें, तथा उन्हें बच्चों को भी दें। संस्कारों की कीमत करें तथा सच्ची व अच्छी माँ बन कर उनके जीवन का विकास व निर्माण करें।

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