श्री पल्लीवाल जैन डिजिटल पत्रिका

अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

(पल्लीवाल, जैसवाल, सैलवाल सम्बंधित जैन समाज)

दीक्षा के लिए न्यूनतम आयु सीमा का निर्धारण अत्यावश्यक

कुछ वर्ष पूर्व आदरणीय डा. कन्छेदीलाल जैन की हत्या हो गई। हत्या किसने की? यह तथ्य अभी तक आम जनता के सामने नहीं आ पाया है। कईयों का कहना है कि इस हत्या के पीछे किसी मुनि का हाथ था। स्व. कन्छेदीलाल जी ने उन्हें संदिग्ध अवस्था में देख लिया था। इसी कारण मुनि ने उनकी हत्या करवा दी। इस घटना पर जैन समाज ने पर्दा डालने का पूरा प्रयत्न किया। डा. कन्छेदीलाल जी तो नहीं रहे, लेकिन मुनि अब भी मुनि अवस्था में हैं।

एक प्रकरण इन्दौर की एक साध्वी का भी सामने आया था। अभी हाल में एक नया प्रकरण आचार्य सन्मति सागर द्वारा एक आर्यिका के साथ बलात्कार के आरोपों के साथ प्रारम्भ हुआ। देश के सभी प्रमुख समाचार पत्रों ने इस घटना का पूर्ण विवरण प्रकाशित किया तथा आचार्य सन्मतिसागर की निन्दा भी की। लेकिन हमारी समाज का कुछ भाग अभी तक आँखे मूँद कर बैठा है। एक और कुछ लोगों ने इस घटना की तीव्र निन्दा की है और अब भी कर रहे हैं, लेकिन दूसरी और कुछ लोग आचार्य के पक्ष में यह कह रहे हैं कि आर्यिका झूठ बोल रही है। यह एक आम धारणा है कि हिन्दुस्तान की (खासकर जैन समाज की) नारी अभी इतनी नहीं गिरी है कि यदि उसके साथ बलात्कार न हुआ हो तब भी वह आम जनता के बीच यह कहे कि उसके साथ बलात्कार हुआ है। सामान्यतः तो बलात्कार होने पर भी बदनामी के डर से नारी चुप ही रही आती है, यह कहने की हिम्मत भी नहीं करती है। और यदि कोई नारी इस प्रकार के काण्ड को उजागर करने का साहस करती है तो समाज का यह कर्तव्य है कि वह उसे हिम्मत बँधाये, न कि उसे हतोत्साहित करे। इस मामले में यह आरोप किसी सामान्य नारी ने नहीं, बल्कि जैन साध्वी ने लगाया है। फिर भी कुछ लोग आचार्य की करतूतों पर पर्दा डालने की कोशिश कर रहे हैं और आचार्य खुले आम घूम रहे हैं। इस प्रकार किसी साधु को छूट दे देना एक बहुत ही गम्भीर मामला है तथा पूरी समाज के लिए एक शर्मनाक बात है।

एक बार मैं आचार्य सन्मति सागर से सन् 1986 में फिरोजाबाद में चातुर्मास के समय मिला था। उस समय वे मात्र क्षुल्लक थे। मैं उनसे मिलने उनके कमरे में गया तो पाया कि क्षुल्लकजी चारों और जवान बाल-ब्रह्मचारणियों से घिरे हुए थे। हँसी-मजाक का सा हल्का-फुल्का माहौल था। मैंने क्षुल्लकजी से निवेदन किया कि मैं आपसे कुछ बात करना चाहता हूँ। इतने में सब ब्रह्मचारणियाँ चली गई। उन्हीं दिनों मैं एक लेख भी लिखने वाला था, जिसका शीर्षक है ‘मुनि बनने से पहले, बने सच्चे श्रावक’ (‘तीर्थंकर, इन्दौर के जनवरी 1988 के अंक में प्रकाशित)। मैंने क्षुल्लकजी से निवेदन किया कि वे मुनि बनने की जल्दी न करें। ये जहाँ हैं, वहीं रहें। फिर मैंने अपने उस लेख का भी जिक्र किया। क्षुल्लकजी ने मेरी बात हँसी में टाल दी। उन्हें तो बड़ा पद पाने की जल्दी थी। वैसे भी मैं समाज का कोई बड़ा नेता तो था नहीं जिसका उन पर असर पड़ता। लेकिन मन में मैं अवश्य सोचता रहा कि क्षुल्लक जी का रसिक स्वभावी होना उचित नहीं है। आज उसका नतीजा हमारे सामने है।

इन सब घटनाओं पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। ऐसी घटनाएं अभी तो इक्का-दुक्का नजर आती हैं। आगे आने वाले दिनों में तो स्थिति और अधिक गंभीर होने वाली है। हमारा देश पश्चिमी सभ्यता की और उन्मुख है। टेलीविजन तथा चलचित्रों में प्रदर्शित फिल्मी गानों से तथा उत्तेजक/भड़कीली पोशाकों से प्रभावित हुए बगैर समाज नहीं रह सकता है। इस भौतिकवादी युग में जवान युवक-युवतियों का प्रभावित होना बहुत स्वाभाविक है। और यदि कहीं जवान दिगम्बर मुनि तथा जवान बाल-ब्रह्मचारिणियों या आर्यिकायें साथ-साथ रहे तो यह सम्भावना और अधिक हो जाती है कि कहीं कोई गलत कार्य न हो जाय। आचार्य सन्मतिसागर के मामले में कुछ ऐसा ही हुआ है।

जवानी के दिनों में भिन्न लिंग के प्रति आकर्षण होना एक स्वाभाविक क्रिया है। और यदि अवसर प्राप्त हो तो आपस में सम्बन्ध भी स्थापित हो सकता है। इसीलिए जो युवावस्था में ब्रह्मचर्य व्रत धारण कर लेते हैं, तो उन्हें बहुत सावधानी से रहना होता है, विपरीत लिंग से प्रथक रहने की सलाह दी जाती है। यह सब पहले जमाने में सम्भव हो सकता होगा, लेकिन आज इसकी सम्भावना बहुत कम होती जा रही है। आज जंगलों का अभाव है। त्यागी, व्रती और मुनियों को घनी बस्तियों के बीच रहना पड़ता है। आज दुनियाँ भी अधिक ग्लेमरस होती जा रही है। जब युवा साधु साध्वी इस ग्लैमर को देखेंगे तो उससे प्रभावित हुये बगैर रह पाना बहुत कठिन हो गया है। अतः आज यह अत्यावश्यक प्रतीत होता है कि साधु साध्वी बनने की एक ऐसी न्यूनतम आयु सीमा निर्धारित की जाय जिस पर किसी प्रकार के ग्लैमर के प्रभाव की सम्भावना को घटाया जा सके।

इस संदर्भ में मेरा समस्त साधु, साध्वियों तथा श्रावकों से निवेदन है कि साधु या साध्वी बनने की एक ऐसी आयु सीमा निर्धारित करें जहाँ तक पहुँचने पर व्यक्ति दुनिया को अच्छी तरह से देख-समझ ले। यह आयु सीमा पैतालीस या पचास वर्ष रखी जा सकती है। इस तक पहुँचने पर व्यक्ति के उन ग्लैमरस परिस्थितियों से प्रभावित होने की संभावना को भी कम किया जा सकता है। अन्यथा कईयों के पग डगमगा जाते हैं।
यहाँ कोई यह प्रश्न कर सकता है कि कोई युवावस्था में ही इतना ज्ञान प्राप्त करले कि उसे दुनिया से विरक्ति हो जाय तब भी क्या वह दीक्षा धारण नहीं करे? मैं पुनः वही कहूंगा कि फिर भी वह पैतालीस पचास वर्ष से पूर्व दीक्षा न ले। यदि कहीं अधिक ही विरक्ति हो गई हो तो वह या तो किसी साधु संघ में, या किसी तीर्थ स्थान पर या फिर किसी आश्रम में एक आम व्यक्ति की तरह रहे। और अधिक ज्ञान प्राप्त करे। अपने घर-परिवार से भी सम्बन्ध रखे। एकदम स्वच्छन्द न हो जाय। आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत लेने की जल्दी न करे। नियम/व्रत लेना आसान है, लेकिन उन्हें अच्छी तरह निभा पाना बहुत कठिन है।

जो साधु साध्वी या मुनि अपना प्रभाव दिखाकर नव-युवक तथा नव-युवतियों को आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत धारण करवा देते हैं, वे समाज का अधिक भला नहीं कर रहे हैं। हमें वर्तमान परिस्थितियों को सदा ध्यान में रखना चाहिए। कुछेक एकल-विहारी मुनियों को देखा है कि वे अपना एक, ‘निजी सहायक’ ढूंढते रहते हैं तथा कई बार किसी युवक को ब्रह्मचारी बना लेने में सफल हो जाते हैं जो उनके निजी सहायक का कार्य भी करता रहता है। आगे चलकर वे उसे दीक्षा देकर मुनि भी बना देते हैं और स्वयं भी पदोन्नति पाकर आचार्य बन जाते हैं।

मुनियों द्वारा इस प्रकार बहला-फुसलाकर ब्रह्मचारी बना देना तथा समाज द्वारा उसका समर्थन कर देना अनुचित है। समुचित ज्ञान के अभाव में नव-युवक तथा नव-युवतियों को बाल-ब्रह्मचारी या बाल-ब्रह्मचारिणी बना देना उसी प्रकार का अपराध है जिस प्रकार किसी बच्चे को बाल-श्रमिक/मजदूर बना देना। बाल-श्रमिक से उसका बचपन छिन जाता है तथा बाल-ब्रह्मचारी या बाल-ब्रह्मचारिणी से उनका बचपन और जवानी। जब कोइ युवक या युवती एक बार आजीवन व्रत ले ले तो उसे यह बोझ जिन्दगी भर ढोना पड़ता है। कई बार जवानी के आवेग को दबाने से एक खास किस्म की कुण्ठा भी उत्पन्न हो सकती है।
इस प्रकार, वर्तमान परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुये यह बहुत जरुरी है कि हर स्तर पर दीक्षा देने के लिए पात्र की न्यूनतम आयु सीमा निर्धारित की जाय। इस बात पर प्रत्येक साधु तथा श्रावक को गंभीरता से विचार करना चाहिए।

डॉ. अनिल कुमार जैन
D-197, मोती मार्ग, बापू नगर, जयपुर

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