श्री पल्लीवाल जैन डिजिटल पत्रिका

अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

(पल्लीवाल, जैसवाल, सैलवाल सम्बंधित जैन समाज)

धर्म का सही स्वरूप ?

किसी ने महाराज जी से पूछा की धर्म की सबसे सूक्ष्म परिभाषा क्या है ? महाराज जी ने कहा अधर्म ना करना ही धर्म है ! सबसे पहले अधर्म करना बंद करो फिर महाराज जी ने कहा आप जो भी काम करो उसके साथ पूर्ण न्याय करो यही धर्म है अर्थात आप जब परिवार के साथ हो तो वहां अपने सभी कर्तव्यों का निर्वाहन पूर्ण न्याय के साथ करो ! इसी प्रकार जब आप व्यापार करो तो उसके साथ न्याय करो ! जब आप नौकरी करो तो उसके साथ न्याय करो, जब आप धर्म करो तो पूर्ण भाव के साथ करो यानी कि आप जो भी काम करो पूर्ण निष्ठा और ईमानदारी के साथ करो यही धर्म है ! उदाहरण के तौर पर अगर आप अध्यापक है तो आपका कर्तव्य है कि आप सभी बच्चों को बिना किसी भेदभाव के अध्यापन करवाए, अगर आप चिकित्सक है तो आपका कर्तव्य हैं मरीज का सही इलाज करना, अगर आप न्यायाधीश है तो आपका कर्तव्य है अपराधी को दंड देना और अगर आप फौजी हैं तो आपका कर्तव्य है आक्रमणकारी को सबक सिखाना यानी कि जब जो काम कर रहे हो उस काम के साथ पूर्ण न्याय करना ही धर्म है !

फिर उसने पूछा कि अगर यह धर्म है तो फिर लोग मंदिर में क्या करने जाते हैं तो महाराज जी ने कहा अभी तक आप धर्म की बहुत सूक्ष्म व्याख्या पूछ रहे थे अब धर्म को विस्तृत तरीके से समझना होगा !धर्म इतना सूक्ष्म नहीं है धर्म बहुत व्यापक है अब तक आपने जो कुछ सुना है वह सब परमार्थिक धर्म है, मानवता के धर्म है यह सब करने से आप एक अच्छे इंसान बन सकते हो लेकिन इससे भी ऊपर आध्यात्मिक धर्म होता है जो इंसान को भगवान बना सकता है !

फिर उसने पूछा की क्या धर्म करने के लिए अपने शरीर को कष्ट देना जरूरी है तो महाराज जी ने उत्तर दिया दूध को जब हम तपाते हैं तो पहले बर्तन तप्ता है उसके बाद दूध तप्ता है आत्मा की शुद्धि के लिए शरीर को तपाना आवश्यक होता है लेकिन आप जिसे कष्ट कहते हैं संत को उसमें आनंद की अनुभूति होती है ! तप और साधना कष्ट नहीं आनंद है ! कष्ट तो संसार में है जैसे ही आप संसार से विरक्त हो जाते हैं फिर आपके अंदर आनंद ही आनंद है ! आज सभी सांसारिक व्यक्ति परेशान है लेकिन साधु अपनी मस्ती में आनंदित रहता है क्योंकि सांसारिक व्यक्तियों के पास लाखों झमेले हैं और साधु इन झमेलो से दूर है !

फिर उसने पूछा महाराज जी इस पंचम काल में तो मोक्ष ही नहीं है फिर आप साधु क्यों बने तो महाराज जी ने उत्तर दिया मैं मोक्ष प्राप्त करने के लिए साधु नहीं बना ! मैं मोक्ष मार्ग के लिए साधु बना हूं ! माना की पंचम काल में मोक्ष नहीं है लेकिन जब भी मोक्ष मिलेगा रास्ता तो यही है, तो अगर हमने रास्ता पकड़ लिया तो एक दिन मंजिल जरूर प्राप्त होगी !
धन्यवाद

महेंद्र कुमार जैन (लारा)
शिवाजी पार्क अलवर

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