शल्य : जो कांटे की तरह सदैव चुभती है वह शल्य कहलाती है। शरीर व मन के अन्दर जो बाधा उत्पन्न करती है। वह शल्य है। माया, मिथ्या, निदान रुप परिणाम आत्मा को विकृत करते है। जैसे कांटा पैर में चुभ जाये तो तकलीफ देता है उसी प्रकार शल्य आत्मा में चुभती रहती है। एक बार की बात है एक गांव में डकैती हो गई, चोर को पकड़ना था। अब क्या करें। युक्ति अपनायी गई कि सभी चोरों को पकड़ कर इकट्ठा किया जाए। सारे चोरो को लाईन से खड़ा कर दिया गया और कहा गया कि ऐसी सूचना प्राप्त हुई कि बड़ा डकैत वह है जिसकी दाढ़ी में तिनका है। जैसे ही सब चोरो ने सुना तो जो वास्तविक डकैत था सबसे पहले उसी का हाथ दाढ़ी पर गया जल्दी से तिनका झड़ाया बस डकैत की पकड़ हो गई ठीक ऐसी ही दशा माया शल्यी की होती है। मायाचारी व्यक्ति को सदैव डर बना रहता है कहीं किसी ने देखा तो नहीं, कोई कुछ कहेगा तो नहीं। क्योंकि मायाचारी की है तो कोई भी क्रिया करों वही विकल्प बना रहेगा, किसी ने कही गलत काम करते देख तो नहीं लिया, कोई गुरु जी से शिकायत न कर दें। जो मायाचारी से रहित है उसके कोई भय नहीं रहता, विकल्प नहीं रहते है और सामायिक आदि क्रियाएँ निर्विकल्प रुप से होती है।
निदान का अर्थ है– आगामी काल में भोगों की आकांक्षा करना। कि मैं विद्याधर होऊँ, स्वर्ग में बड़ा देव होऊँ, सारे सुख सम्पत्ति की प्राप्ति हो जाए। निदान भी शल्य है क्योंकि यह भी आत्म विशुद्धि से गिराता है। निदान इहलोक व परलोक की चाहना को पैदा करता है और जहाँ चाहे प्रारम्भ हो जाती है वहाँ साधना वास्तविक नहीं होती। क्योंकि सच्ची साधना में मात्र समर्पण होता है। चाहना नहीं होती है और जहाँ चाहना है वह निदान शल्य है और आत्मा में यह कांटे की तरह चुभती रहती है। विकल्पों को उत्पन्न करती है और जहां विकल्प उत्पन्न हो गये है वहाँ ध्यान संभव नहीं, निर्विकल्प सामायिक, स्वाध्याय आदि क्रियायें संभव नहीं है। तीसरी शल्य मिथ्यात्व है। जहाँ मिथ्यात्व रुपी कांटा चुभा है। वहाँ देव शास्त्र-गुरु के प्रति श्रद्धा ही समीचीन नहीं रहती फिर मिथ्यात्व के साथ किये व्रत समीचीन रुप से कैसे पल सकते है देव की वाणी पर विश्वास नहीं तो वे जो कुछ कहेगे तो लगेगा ये सही है या नहीं। कैसे चलूँ, व्रतों को कैसे पालूँ श्रद्धा सही नहीं है तो डमाडोल स्थिति रहेगी। कभी सर्वज्ञ की बात सही लगेगी तो कभी किसी और की। और ऐसी अवस्था में संकल्प विकल्प उत्पन्न होगे और विकल्प जहाँ है वे आत्मा में कांटे की तरह चुभते ही रहते है। इसलिये मिथ्यात्व शल्य भी व्रतों के पालन में बाधक है। इसलिये कहा जाता है कि जो इन शल्यों से रहित हो गया है। वही समीचीन रुप से रहित हो गया है वही समीचीन रुप से व्रतों का पालन कर सकता है। इसलिये शल्यों को छोड़ निःशल्य हो जाओ। क्योंकि आचार्य भगवन् उमास्वामी ने स्पष्ट ही कह दिया है तत्वार्थ सूत्र ग्रंथ में –
अर्थात् जो व्यक्ति इन माया, मिथ्या, निदान रुप शल्यों से रहित है वही व्रती है और अपने गुणस्थान को यथावत् बनाये रख सकता है। अतः अंतर की चुभन को मिटा दो तभी आत्मा सच्चा शाश्वत सुख प्राप्त कर सकेगी