श्री पल्लीवाल जैन डिजिटल पत्रिका

अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

(पल्लीवाल, जैसवाल, सैलवाल सम्बंधित जैन समाज)

आत्मविकास के क्रमिक सोपान

जैन धर्म और दर्शन:

मोह मुख्य रूप से दो प्रकार का होता है दर्शन-मोहनीय और चारित्र-मोहनीय। दर्शन-मोहनीय आत्मा को यथार्थता, सम्यक्त्व और विवेकशीलता से वंचित रखता है तथा चारित्र-मोहनीय आत्मा को विवेकयुक्त आचरण नहीं करने देता। दर्शन मोहनीय के कारण व्यक्ति की भावना, विचार-दृष्टि, चिन्तन अथवा श्रद्धा समीचीन नहीं हो पाती, जबकि चारित्र मोहनीय समीचीन-दृष्टि हो जाने पर भी आचरण में पवित्रता नहीं आने देता। इस प्रकार, यह मोह की शक्ति ऐसी है जो कि न तो सम्यक्विचार बनने देती है और न ही सम्यक् आचार। मोहनीय कर्म के प्रभावों की तरतमता से ही गुण-स्थानों का विवेचन किया गया है। आइए अब हम क्रमपूर्वक उक्त गुणस्थानों के स्वरूप पर विचार करें।

1. मिथ्यादृष्टि – यह आत्मा की अधस्तम अवस्था है। इस अवस्था वाले जीव की दृष्टि मिथ्या अर्थात् असत्य होती है।’ अतः इन्हें मिथ्यादृष्टि कहते हैं। ये अज्ञान में जीते हैं। इनमें सत्य-असत्य का विवेक नहीं होता। ऐसे जीव देह, स्त्री, पुत्र आदि बाह्य पदार्थों में अनुरक्त रहते हैं। अर्थ को ही जीवन का वास्तविक आधार मानते हैं। विषय-कषायों में लिप्त रहते हैं तथा अपने आत्म-स्वभाव से दूर रहते हैं। इनका मन अन्धविश्वासों से भरा रहता है। धर्म के क्षेत्र में प्रायः रूढ़िवादी दृष्टिकोण बनाये रखते हैं। जिस प्रकार पित्त ज्वर से ग्रसित रोगी को मधुर औषधि भी रुचिकर नहीं लगती, वैसे ही मिथ्यादृष्टि जीवों को तत्त्व के प्रति रुचि नहीं होती। इस मिथ्यादर्शन के कारण जीवात्मा उन्मार्ग की ओर जाता है तथा गलत दिशा ग्रहण कर चिरकाल तक संसार में भ्रमण करता रहता है। इसका बन्धन अत्यन्त दृढ़ होता है। इस मिथ्यात्व रूप मोह-ग्रन्थि का भेद होने पर ही आत्म-विकास की यात्रा प्रारम्भ होती है। इसीलिए मिथ्यात्व को सबसे बड़ा शत्रु बताकर महापाप निरूपित किया गया है। चैतन्य -यात्रा में यह सबसे बड़ा अवरोधक है। संसार के अधिकांश जीव इसी मिथ्यात्व से ग्रसित होने के कारण इसी भूमिका में जन्म-मरण करते रहते हैं।

2. सासादन- सम्यक्त्त्व से नीचे गिरने वाला मिथ्यात्वाभिमुख जीव का नाम सासादन सम्यक्दृष्टि है। यह आत्म-विकास की दूसरी भूमिका है। इसका काल अति अल्प है। जब कोई सम्यक्दृष्टि अनन्तानुबन्धी कषायों के उद्वेग आ जाने से अपने सम्यक्त्व से स्खलित होता है, तब यह अवस्था बनती है। सासादन का व्युत्पत्तिपरक अर्थ भी यही है। स आसादन, जो आसादन अर्थात् सम्यक्त्त्व की विराधना से युक्त है वह सासादन है। जैसे-मिठाई खाने के बाद वमन करते वक्त उसका कुछ-कुछ, आस्वाद बना रहता है, वैसे ही सम्यकत्व के छूट जाने पर भी इस अवस्था में उसका किञ्चित् आस्वाद बना रहता है इसलिए इन्हें सासादन सम्यक् दृष्टि कहते हैं।’

यद्यपि प्रथम गुणस्थान की अपेक्षा यह गुणस्थान विकासात्मक है, परन्तु यथार्थ में यह आत्मा की पतनोन्मुख दशा का द्योतक है। कोई भी जीव प्रथम गुण-स्थान से विकास कर इस गुणस्थान में नहीं आता, अपितु ऊपर के विकासात्मक गुणस्थानों से पतित होकर पुन: मिथ्यात्व को प्राप्त होने के पूर्व बीच की स्थिति में इस गुण-स्थान को प्राप्त करता है। इस गुण-स्थान से जीव उत्कर्ष नहीं कर पाता, क्षण मात्र में पतन करके प्रथम गुण-स्थान में जाना ही उसकी नियति होती है।

3. सम्यक् मिथ्यादृष्टि- तृतीय गुणस्थान आत्मा की वह मिश्रित अवस्था है, जिसमें न केवल सम्यदृष्टि रहती है, न मिथ्यादृष्टि। इसमें सम्यक्त्त्व और मिथ्यात्व की मिश्रित दशा रहती है; जिसके कारण आत्मा में तत्त्व व अतत्त्व को समझने की क्षमता नहीं रहती। यह एक दुविधात्मक अवस्था है। इसमें जीव सत्य और असत्य के मध्य ही झूलता रहता है। न वह सत्य की ओर उन्मुख हो पाता है और न ही असत्य को स्वीकार कर पाता है। वह सत्य को सत्य समझने के साथ-साथ असत्य की भी सत्य रूप स्वीकार करने लगता है। इस अवस्था वाले साधक सम्यक्त्व से लगाव होने के साथ-साथ मिथ्यात्व की ओर झुकाव बनाये रखते हैं। जैसे एक बहुत बड़े हाल में छोटा-सा टिमटिमाता दीपक रख देने पर वहाँ प्रकाश और अँधेरे का धुंधलापन दिखाई पड़ता है। न तो वहाँ इतना प्रकाश है कि हम पुस्तक को पढ़ सकें, न ही इतना अँधेरा रहता है कि पुस्तक दिखाई ही न दे। वहाँ पुस्तक तो दिखाई देती है पर अक्षर नहीं दीखते। न वहाँ इतना अँधेरा है कि चलते में ठोकर खाकर गिर पड़े, न इतना प्रकाश है कि सुई में डोरा डाल सकें। प्रकाश और अँधेरे की ऐसी ही मिश्रित अवस्था को जहाँ सम्यक्त्त्व का प्रकाश होने के साथ-साथ मिथ्यात्व का अँधेरा भी है, जैनागम में सम्यक् मिथ्यादृष्टि कहा गया है।

इस गुणस्थान में जीव की विवेकशक्ति पूर्ण विकसित नहीं हो पाती। यह अवस्था अधिक काल तक नहीं चलती। उसकी अनिश्चयात्मक अवस्था के समाप्त होने पर यदि मिथ्यात्वाभिमुख हो जाता है तो मिथ्यादृष्टि हो जाता है, तथा सम्यक् बोध प्राप्त कर लेने पर सम्यक् दृष्टि हो जाता है। श्रद्धान और अश्रद्धानात्मक अवस्था होने से इसे मिश्र-गुणस्थान भी कहते हैं। जैनागम में इस गुण-स्थान की निम्नांकित विशेषताएँ बतायी गयी हैं-

1. इसमें श्रद्धान और अश्रद्धान युगपत् विद्यमान रहते हैं।

2. इस गुणस्थान वाले जीव न तो “सकल संयम” प्राप्त कर सकते हैं और न ही “देश संयम।”

3. इस गुणस्थान में जीव की मृत्यु नहीं होती। सम्यक्त्त्व या मिथ्यात्व परिणामों के होने पर पहला या चौथा गुणस्थान प्राप्त करके ही मृत्यु होती है।

4. इसमें आयु कर्म का बन्ध और मारणान्तिक समु‌द्घात नहीं होता।।

4. अविरत सम्यक् दृष्टि- यह विकास की चतुर्थ भूमिका है। मिथ्यादृष्टि को सम्यक्बोध प्राप्त होने पर इस गुणस्थान की प्राप्ति होती है। सम्यक् बोध प्राप्त हो जाने के बाद भी जीव अपनी कमजोरी वश या पर्यायगत अपात्रता के कारण संयम अङ्गीकार नहीं कर पाते, इसीलिए असंयत सम्यक् दृष्टि कहलाते हैं। अनुकूल संयोगों के जुटने पर जीव अपने पुरुषार्थ से मोह-ग्रन्थि को भेदकर जब मिथ्यात्व पर विजय प्राप्त करता है, तब यह अवस्था प्राप्त होती है। इस अवस्था में मोह की शिथिलता के कारण सम्यक् श्रद्धा अर्थात् सद्विवेक तो प्राप्त हो जाता है, परन्तु सम्यक्चारित्र का अभाव रहता है। इस अवस्था में विचार-शुद्धि का सद्भाव रहते हुए भी आचार शुद्धि का असद्भाव रहता है।

यद्यपि चारित्र मोहनीय के उदय से असंयत सम्यक्दृष्टि संयम ग्रहण नहीं कर पाता, फिर भी दृष्टि में समीचीनता आ जाने से, उसमें कुछ विशिष्ट गुण प्रकट हो जाते हैं। वे हैं प्रशम, संवेग, अनुकम्पा और आस्तिक्य।’

सम्यक्दृष्टि हो जाने के बाद उसके क्रोधादिक का अतिशय उद्रेक नहीं आता। वह अपने सद्विवेक से अपनी भाव-धारा को सँभाले रहता है, यही उसका ‘प्रशम’ गुण है। विवेक की वृद्धि हो जाने से तथा निरन्तर संसार से भयभीत रहने के कारण उसमें विषयों से विरक्ति का भाव जगने लगता है। यह उसका ‘संवेग’ गुण है। उसका मन दया से भीगा हुआ रहता है, वह दीन-दुःखियों की पीड़ा को देखकर स्वयं काँप उठता है तथा यथासम्भव उनकी सेवा करता है, यही उसका अनुकम्पा गुण है तथा वह तत्त्वों की श्रद्धापूर्वक सबके अस्तित्व को स्वीकार कर सह-अस्तित्व का जीवन जीने लगता है, यही उसका ‘आस्तिक्य’ गुण है। इस गुण-स्थान वाले जीव में निम्नांकित अन्य विशेषताएँ भी उपलब्ध रहती हैं-
1. निरीह और निरपराध जीवों की हिंसा नहीं करता।

2. अपने दोषों की निन्दा तथा गर्दा करता है।

3. गुण-ग्राही दृष्टि रखता है।

4. सच्चे देव, गुरु और धर्म पर श्रद्धा रखता है। उनके प्रति पूर्णरूप से समर्पित रहता है।

5. पुत्र, स्त्री, धन, वैभव आदि बाह्य पदार्थ को अशाश्वत मानकर उन पर गर्व नहीं करता है।

6. संवेगादिक गुणों से युक्त होने के कारण वह विषयों में अधिक अनुरागी नहीं होता, अपितु उनकी ओर हेय दृष्टि बनाये रखता है।

5. संयतासंयत– यह पाँचवीं भूमिका है। इसे विरताविरत अथवा देश-संयम भी कहते हैं। इसमें व्यक्ति की आत्मिक शक्ति कुछ और विकसित हो जाती है। यह असंयत सम्यक्दृष्टि से एक कदम आगे बढ़ जाता है तथा वह पूर्वोक्त सम्यक्-दृष्टि के गुणों के साथ-साथ कुछ अंशों में संयम का भी पालन करने लगता है। वह पूर्ण रूप से तो संयम अंगीकार नहीं कर पाता, किन्तु आंशिक रूप से संयम का पालन अवश्य करता है। इस अवस्था में स्थित साधक को जैन-शास्त्रों में ‘उपासक’ अथवा ‘ श्रावक’ भी कहा गया है। आंशिक रूप से व्रतों के पालन करने के कारण ही इस गुणस्थान को देश संयम कहते हैं।’ चूँकि इस अवस्था के जीव स्थूल पापों से विरक्त रहते हैं, अतः संयत अथवा विरत हैं तथा सूक्ष्म पापों का त्याग न कर पाने के कारण वे असंयत अथवा अविरत कहलाते हैं। इसी अपेक्षा से इस गुणस्थान में संयतासंयत अथवा विरताविरत रूप परिणाम युगपत् पाये जाते हैं। नैतिक जीवन का वास्तविक विकास इसी गुणस्थान से प्रारम्भ हो पाता है।

6. प्रमत्त विरत- छठे गुणस्थान में साधक की आत्म-शक्ति इतनी बढ़ जाती है कि वह देश-विरति अर्थात् अंश-विरति से सर्वविरति अर्थात् पूर्ण विरति की ओर जाता है। अब वह अणुव्रती या उपासक न कहलाकर महाव्रती साधक अथवा श्रमण कहलाने लगता है। इस भूमिका में उसके हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रह इन पाँचों पापों का पूर्ण रूप से परित्याग हो जाता है। इस अवस्था को नग्न दिगम्बर मुनि ही प्राप्त कर पाते हैं। सम्यक्‌चारित्र प्रकट हो जाने से यहाँ पूर्ण मोक्षमार्ग बन जाता है। वस्तुतः मुक्ति-यात्रा का वास्तविक शुभारम्भ यहीं से होता है।

इतना कुछ होते हुए भी, प्रमाद युक्त होने के कारण, उनके आचरण में कुछ शिथिलता बनी रहती है. इसलिए इन्हें चित्रलाचरणी भी कहा गया है।’ साधक अपनी आध्यात्मिक परिस्थितियों के अनुसार इस भूमिका से ऊपर भी उठ सकता है तथा नीचे भी गिर सकता है।

१०८ मुनि श्री प्रमाणसागर जी महाराज

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