गतांक से आगे –
7. अप्रमत्त-विरत – यह आत्मध्यान की भूमिका है। इस भूमिका में कदम रखते ही साधक सब प्रकार के प्रमादों पर विजय पा लेते हैं। यह एक आत्मलीन जागरूक निष्क्रियता की स्थिति है। इस दशा में स्थित साधक सतत अप्रमत्त रहते है अर्थात् आत्म-जागृति बनाये रखते हैं। अपनी इसी जागरूकता के कारण निरन्तर प्रगति पथ पर बढ़ते जाते हैं। आत्मानुभूति का स्वर्णिम प्रभात यहीं से फूटता है। प्रमाद से रहित हो जाने के कारण इन्हें अप्रमत्त-संयत कहते हैं।’
‘यद्यपि उक्त साधक सतत अप्रमत्त रहना चाहते हैं, फिर भी प्रमाद जनित संस्कार इन्हें एकदम नहीं छोड़ देते। वे बीच-बीच में उन्हें परेशान करते रहते हैं। परिणामतः वे पुनः प्रमाद अवस्था को प्राप्त हो जाते हैं। प्रमादावस्था को प्राप्त करने पर तुरन्त ही अपने आत्मध्यान के बल से अप्रमादावस्था को प्राप्त कर लेते हैं। जिस प्रकार तरंगायित जल पर पड़ा लकड़ी का टुकड़ा लहरों के उतार-चढ़ाव के कारण ऊपर-नीचे होता रहता है, उसी प्रकार इनकी नैया प्रमत्त-अप्रमत्त अवस्था के बीच डोलती रहती है। ये स्वस्थान अप्रमत्त कहलाते हैं। प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनों ही स्थितियाँ इस भूमिका में सम्भव हैं।
अनेक बार प्रमत्त-अप्रमत्त अवस्थाओं का स्पर्श करने के बाद कुछ अप्रमत्त संयत अपनी आत्म-साधना के बल से चेतना का ऊर्ध्वारोहण कर आठवें गुण- स्थान के अभिमुख हो जाते हैं, उन्हें सातिशय अप्रमत्त कहा जाता है। वे अपने परिणामों की अतिशयता से प्रमादजन्य संस्कारों को पूर्ण रूप से पराजित कर समस्त मोहनीय कर्म को नष्ट करने के लिए कमर कस लेते हैं, इस तरह यह गुण-स्थान दो प्रकार का हो जाता है।
दो श्रेणियाँ
इससे आगे बढ़कर साधक अपने विजय अभियान को और तेज कर देता है। अब वह अपने प्रगति पथ पर आरूढ़ हो, आत्मविकास की गति को और तेज कर देता है। इसे जैन-दर्शन में ‘श्रेणी’ शब्द से जाना जाता है। श्रेणी का अर्थ हैचारित्र मोहनीय कर्म के क्षय या उपशम के लिए किया जाने वाला आरोहण। श्रेणी-सीढ़ी का प्रतीक है, जिस पर आरूढ़ हो साधक, कर्म-विनाश का विशेष उपक्रम प्रारम्भकरता है। श्रेणी दो प्रकार की होती है- उपशम श्रेणी और क्षपक श्रेणी।
उपशम श्रेणी- उपशम श्रेणी में साधक मोहनीय कर्म का समूल नाश नहीं कर पाता, अपितु उसे दमित करता हुआ अर्थात् दबाता हुआ आगे बढ़ता जाता है।’ जिस प्रकार शत्रु सेना को खदेड़कर की गयी विजय-यात्रा, राज्य के लिए अहितकर होती है, क्योंकि वह कभी भी समय पाकर राज्य पर पुनः आक्रमण कर सकता है। उसी प्रकार इस विधि से प्रशमावस्था को प्राप्त कर्म-शक्ति कभी भी समय पाकर आत्मा का अहित कर सकती है। जिस प्रकार गंदले जल में फिटकरी आदि कोई केमिकल डाल देने पर उसकी गंदगी नीचे बैठ जाती है तथा जल अत्यन्त स्वच्छ और निर्मल हो जाता है, लेकिन बर्तन में थोड़ा भी हलन चलन होते ही वह गंदगी पुनः उभरकर आ जाती है। उसी प्रकार कर्मों के उपशम जन्य अल्पकालिक विशुद्धि के कारण आत्मा में स्वच्छता तो आ जाती है; लेकिन मोह के उदय हो जाने के कारण अपनी उपरिम भूमिका से फिसलकर जीव नीचे गिर जाता है। उपशम श्रेणी वाले जीव अपने कर्मोन्मूलन के पुरुषार्थ को पूर्ण कर अन्तिम सोपान तक नहीं ले जा सकते। ग्यारहवें गुणस्थान तक जाकर कर्मों के पुनः प्रकट हो जाने से अनिवार्यतः उनका पुनः पतन हो जाता है।’
क्षपक श्रेणी- जो साधक अपनी विशुद्धि के बल पर चारित्र मोहनीय कर्म का समूल विच्छेद करते हुए आगे बढ़ते हैं, वे क्षपक श्रेणी वाले कहलाते हैं। इसमें कर्म शत्रुओं का उपशम नहीं होता, अपितु समूल विध्वंस कर दिया जाता है। इसी कारण यह पुनः जागृत नहीं हो पाते। इस श्रेणी वाले साधकों का अधःपतन नहीं होता। क्षपक श्रेणी पर आरूढ़ होने वाले साधक अपना आत्मिक विकास करते हुए समस्त कर्मों का समूल नाश कर अन्तिम सिद्धि को प्राप्त कर लेते हैं।
दोनों ही श्रेणियाँ आठवें गुणस्थान से प्रारम्भ होती हैं। उपशम श्रेणी में आरूढ़ साधक ग्यारहवें गुणस्थान तक जाकर नीचे गिर जाते हैं, जबकि क्षपक श्रेणी में आरूढ़ साधक दसवें गुणस्थान से सीधे बारहवें गुणस्थान को प्राप्त करते हुए मुक्ति की यात्रा को पूर्ण करते हैं।
8. अपूर्वकरण- यह आठवीं भूमिका है। जब साधक अपने चरित्र बल को विशेष रूप से बढ़ा लेते हैं और प्रमाद-अप्रमाद अवस्था के इस संघर्ष में विजयी बनकर स्थायी अप्रमत्त अवस्था (सातिशय अप्रमत्त) को प्राप्त कर लेते हैं, तब वे एक ऐसी शक्ति प्राप्त कर लेते हैं जिससे रहे सहे मोह बल को नष्ट या उपशमित किया जा सके। इस अवस्था में पहुँचते ही साधक असीम आनन्द के सरोवर में निमग्न हो जाता है। उसके बाहर के सारे सम्बन्ध छूट जाते हैं। इस भूमिका से वापसी की कोई सम्भावना नहीं रहती। वह प्रतिक्षण आगे ही बढ़ता चलता है। उसके साधना के नये-नये द्वार खुलते जाते हैं। उसमें अपूर्व वीर्योल्लास जगता है तथा असाधारण सामर्थ्य प्रकट होती जाती है। वह प्रतिक्षण पूर्व में अननुभूत आत्मशुद्धि का अनुभव करने लगता है। उसे हर क्षण नयी-नयी अनुभूतियाँ होने लगती हैं। इसीलिए इस गुणस्थान को अपूर्वकरण गुणस्थान कहते हैं।
परिणामों की इस विशुद्धि के बल से साधक के अन्दर एक अपूर्व शक्ति जागृत होती है तथा कषायों के विरुद्ध भावी संघर्ष यात्रा का शुभारम्भ होता है, जो कि दसवें गुण-स्थान तक जारी रहता है।
9. अनिवृत्तिकरण- अष्टम गुणस्थान को पार कर साधक इस नवमें गुणस्थान में आता है और चारित्र मोहनीय के शेष अङ्गों को उपशमन करने अथवा क्षीण करने के कार्य को विशेष गति देता है। इस भूमिका में आने के बाद इतनी समता आ जाती है कि शरीरगत भेद होते हुए भी समान काल में प्रविष्ट होने वाले विभित्र साधकों के परिणाम भी सदृश हो जाते हैं। परिणामों गत निवृत्ति अर्थात् भेद न होने के कारण ही इस गुणस्थान को अनिवृत्तिकरण कहते हैं।’
पूर्व में की गयी समस्त साधनाओं का फल यहाँ स्पष्ट दिखने लगता है। इस गुणस्थान में आकर साधक अपने प्रबल साधना के प्रभाव से मोह सेना को नष्ट या उपशमित कर स्थूल कषायों को नष्ट व उपशान्त कर देता है तथा सूक्ष्म काम-वासनाएँ भी यहाँ विनष्ट हो जाती हैं। इसीलिए इसको बादर-साम्पराय गुणस्थान भी कहा जाता है।
10. सूक्ष्म-साम्पराय – अनिवृत्तिकरण गुणस्थान में समस्त स्थूल-कषायों को उपशान्त अथवा क्षीण कर एक मात्र संज्वलन लोभ (वह भी अत्यन्त सूक्ष्म) के साथ साधक इस दसवें गुणस्थान में प्रवेश करता है। इसीलिए इसे सूक्ष्म-साम्पराय कहते हैं। जैसे-गुफा से शेर के चले जाने के बाद भी गुफा में शेर की गन्ध बनी रहती है अथवा पानी की धार सूख जाने के बाद भी उसके निशान बने रहते हैं। ऐसी ही स्थिति यहाँ बनती है। कषायों की धार तो पूर्व में ही सूख चुकी अब उसका निशान भर बचा है। वह इतनी सूक्ष्म होती है कि दिखाई नहीं पड़ती पर आत्मा को प्रभावित करती रहती है। इस गुणस्थान के अन्त समय में उक्त सूक्ष्म-लोभ को भी उपशमित अथवा श्रीण कर ग्यारहवें अथवा बारहवें गुण-स्थान में प्रवेश किया जाता है।
11. उपशान्त मोह– समस्त मोहनीय कर्म को उपशमित करने वाले साधक इस ग्यारहवीं भूमिका में प्रवेश करते हैं।’ चूँकि यहाँ कषायें पूर्ण रूप से उपशान्त रहती हैं, अतः साधक को कुछ क्षण के लिए यहाँ वीतरागता का अनुभव तो होता है, लेकिन भस्माच्छादित अग्नि की तरह भीतर कषायों के दबे रहने के कारण वे कुछ क्षणों में पुनः उदय को प्राप्त हो जाते हैं, जिससे साधक पुनः नीचे की भूमिकाओं में आ जाता है। इस गुणस्थान से पतन करने वाला साधक प्रथम ‘मिथ्यात्व’ गुणस्थान तक भी आ सकता है, लेकिन पुनः अपने प्रयास के द्वारा ऊपर उठकर कषायों को प्रशमित अथवा विनष्ट कर प्रगति भी कर सकता है। साधना के क्रम में ऐसा फिसलना-सम्हलना अनेक बार हो सकता है।
12. क्षीण-मोह – दसवें गुणस्थान में सूक्ष्म लोभ का क्षय करने वाले साधक इस गुणस्थान में आते हैं। समस्त मोहनीय कर्म का क्षय हो जाने के कारण इसका ‘क्षीण-मोह’ यह सार्थक नाम है। समस्त कर्मों में मोहनीय कर्म ही प्रधान है। जिस प्रकार संग्राम में सेनानायक के आहत होते ही समस्त सेना स्वतः ही समर्पित हो जाती है। उसी प्रकार मोहनीय कर्म के क्षीण हो जाने से साधक इस भूमिका में प्रवेश कर शेष ज्ञानावरण, दर्शनावरण एवं अन्तराय संज्ञक घातिया कर्मों का भी नाश कर देता है। इस गुण-स्थानवर्ती साधकों का कभी पतन नहीं होता।
कषाय के क्षीण हो जाने से इनमें पूर्ण वीतरागता आ जाती है, किन्तु अभी इनकी छद्मस्थावस्था दूर नहीं होती। छद्म अर्थात् लेश मात्र भी अज्ञान जिनमें हो, उन्हें छद्मस्थ कहते हैं। अतः इस गुणस्थान को ‘ क्षीण-कषाय वीतराग-छद्मस्थ’ भी कहते हैं।
13. सयोग केवली- यह साधक की परमात्म दशा की उपलब्धि का आरोहण है। इस अवस्था में आते ही साधक परमात्म दशा को प्राप्त कर लेते हैं। उन्हें भगवत्ता की उपलब्धि हो जाती है। ये ही अरिहन्त या अरहन्त कहलाते हैं। बारहवें गुणस्थान में घातिया कर्मों का क्षय हो जाने के कारण इस गुणस्थान में प्रवेश करते ही उन्हें अनन्त दर्शन, अनन्त ज्ञान, अनन्त सुख और अनन्त वीर्य की सहज उपलब्धि हो जाती है। यही पूर्ण ज्ञानी कहलाते हैं। भूत, भविष्य और वर्तमान के समस्त पदार्थों का प्रत्यक्ष ज्ञान हो जाने के कारण इन्हें सर्वज्ञ और सर्वदर्शी भीकहते हैं। ये जन्म और मरण रूप संसार के परिभ्रमण से मुक्त हो जाते हैं। अन्य दर्शनों में इन्हें जीवन-मुक्त कहा जाता है। इसे ही भाव-मुक्ति भी कहते हैं। ये परम वीतरागी होते हैं।
योग सहित होने के कारण ये ‘सयोगी’ तथा केवलज्ञान होने के कारण ‘केवली’ कहलाते हैं। कर्मों को जीतकर ही यह अवस्था प्राप्त होती है, इसलिए इस गुण-स्थान को ‘सयोग केवली जिन’ कहते हैं।’
जीवन-मुक्ति और देह-मुक्ति में अन्तर
जीवन-मुक्त होते ही वे मुक्ति का अनुभव करने लगते हैं, वे पूर्ण स्वतन्त्र हो जाते हैं। जैसे कोई अपराधी वर्षों तक कारागृह में कैद रहने के बाद मुक्त किया जाता है, तब वह अपने बैरक से निकलते ही स्वतन्त्रता का अनुभव करने लगता है, क्योंकि अब वह कैदी नहीं रहा। उसकी बेड़ियाँ अलग कर दी गयी हैं। जेल की ड्रेस परिधान भी छूट गयी है, वह सजा से मुक्त हो चुका है। यद्यपि वह कारागृह में ही है, फिर भी जेलर के अनुशासन से वह मुक्त हो चुका है, अब वह जेल से निकलने को है, पर चौकीदार अभी चाबी लेकर द्वार पर नहीं पहुँचा है। जब तक दरवाजा नहीं खुलता तब तक वह कारागृह से बाहर नहीं निकल पाता। फिर भी रहता तो स्वतन्त्र ही है। द्वार खुलते ही वह बाहर आ जाता है। जीवन मुक्ति देह के कारागृह से मुक्ति की घोषणा है। आयु-कर्म के द्वार खोलने की प्रतीक्षा है। जब तक आयु-कर्म देह-मुक्ति की चाबी लेकर नहीं आ जाता, तब तक देह के कारागृह से बाहर नहीं निकला जा सकता। जीवन-मुक्ति और देह-मुक्ति में यही अन्तर है।
14. अयोग केवली- आत्मिक विकास का यह अन्तिम चरण है। जीवन-भर की साधना का यह चरम पड़ाव है। तेरहवें गुणस्थानवर्ती ‘सयोग-केवली-जिन’ अपने जीवन के अन्तिम क्षणों में देह से मुक्ति पाने के लिए विशुद्ध-ध्यान के बल से योगों का पूर्ण रूप से निग्रह कर लेते हैं। तब वह आत्मिक विकास की पराकाष्ठा पर पहुँच जाते हैं। योगातीत हो जाने के कारण इस गुणस्थानवर्ती साधक को ‘अयोग-केवली’ कहते हैं। इस अवस्था में साधक आत्मा अपने उत्कृष्टतम शुक्ल ध्यान के द्वारा पर्वत की तरह निष्प्रकम्प अवस्था प्राप्त कर लेते हैं। अन्त में देहत्याग पूर्वक सिद्ध अवस्था को प्राप्त कर लेते हैं। कर्मों का आत्यन्तिक क्षय इसी अवस्था में होता है। कर्मों का क्षय होते ही वे संसार के बन्धन से पूर्ण रूप से मुक्त हो जाते हैं। इस दशा में आत्मा पूर्ण विकसित और कृतकृत्य हो जाता है। इस प्रकार आध्यात्मिक विकास के इस क्रम से यह स्पष्ट हो जाता है कि जैन-दर्शन में प्रत्येक जीव अपने आत्म-विकास की इन सीढ़ियों पर आरूढ़ होकर स्वयं परमात्म दशा को प्राप्त कर सकता है। अनादि सिद्ध परमात्मा को नहीं स्वीकारा गया है।
गुण-स्थानों से आरोह-अवरोह का क्रम
इस प्रकार इन चौदह गुण-स्थानों से होता हुआ जीव अपनी आत्मविकास की यात्रा को पूर्ण करता है। आत्मिक परिणति से जुड़े होने के कारण गुणस्थान अत्यन्त सूक्ष्न होते हैं। हम अपनी बुद्धि से इन गुणस्थानों को पहचान नहीं सकते। इन्हें तो अपने अनुभव द्वारा ही जाना जा सकता है। इतना अवश्य है कि इन गुणस्थानों के प्राप्त होने पर कथित गुण हमारे आचरण में अवश्य आ जाते हैं। उन आचरणों के आधार पर ही गुणस्थानों का अनुमान लगाया जा सकता है। हमारे भावों के उतार-चढ़ाव के अनुरूप इनमें क्षण-क्षण में परिवर्तन होते रहते हैं। इनमें आरोहण एवं अवरोहण का भी एक निश्चित क्रम है। आइए एक दृष्टि हम उन पर भी डालें-
गुणस्थानों के नाम

इस प्रकार जैन दृष्टि से आत्मविकास के क्रम का यह सामान्य दिग्दर्शन है इसके विशेष परिज्ञान के लिए जैन कर्म साहित्य (करणानुयोग) पढ़ना चाहिये।
१०८ मुनि श्री प्रमाणसागर जी महाराज