अलम नसीबों ! रोना छोड़ो, हंसना सीखो ।
हक के खातिर, जीना सीखो, मरना सीखो ॥
हर राह जाके, मिलती है मुकाम से।
रुक मत जाना कभी, कांटों के नाम से ॥
मंजिल मिलेगी, चलना सीखो, बढ़ना सीखो ।
अलम नसीबों ! रोना छोड़ो, हंसना सीखो ॥
हक के खातिर, जीना सीखो, मरना सीखो ।
मेहनत से प्यारे, बिगड़ी तकदीर बदलती है ।।
यदि हौसला बुलन्द हो, तो दुनिया झुकती है।
चलो, उठो ! सोना छोड़ो, जगना सीखो ॥
अलम नसीबों ! रोना छोड़ो, हंसना सीखो ।
हक के खातिर, जीना सीखो, मरना सीखो ॥
मरने से गर डरोगे, तो लड़ोगे कैसे,
दुश्मन के सामने, फिर टिकोगे कैसे ।
जीत मिलेगी, डरना छोड़ो, लड़ना सीखो ।।
अलम नसीबों ! रोना छोड़ो, हंसना सीखो ।
हक के खातिर, जीना सीखो, मरना सीखो।।
(अलम = दुःख)
रचयिता:-
धरम चन्द जैन
रि. अधिशाषी अभियंता
अलवर