एक प्रश्न स्वयं से
क्या कभी हमने स्वयं से यह प्रश्न किया है कि हम जो जीवन जी रहे हैं, वह वास्तव में सही दिशा में है या केवल भौतिक उपलब्धियों की दौड़ में भाग रहे हैं?
क्या हमारे निर्णय, हमारे विचार हमारे कर्म सत्य और विवेक पर आधारित हैं या केवल मोह, राग और अज्ञान के परिणाम हैं?
जैन धर्म का स्पष्ट उत्तर है।
जब तक दृष्टिकोण सम्यक नहीं होगा, तब तक जीवन की दिशा भी सम्यक नहीं हो सकती ।
इसीलिए जैन दर्शन में “सम्यक दृष्टिकोण” को मोक्ष मार्ग का प्रथम द्वार कहा गया है। सम्यक दृष्टिकोण क्या है ?
सम्यक दृष्टिकोण केवल देखना नहीं, बल्कि “सही तरीके से देखना ” है । यह सत्य को स्वीकार करने की क्षमता है, भले ही वह हमारे अहंकार या आदतों के विपरीत क्यों न हो ।
जैन आगमों में कहा गया है:
“सम्यग्दर्शन ज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः” अर्थात् सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र – ये तीनों मिलकर मोक्ष का मार्ग हैं।
परंतु विचार करें, यदि दृष्टि ही गलत हो, तो ज्ञान भी गलत दिशा में जाएगा और आचरण भी ।
सम्यक दृष्टिकोणः अज्ञान से जागृति की यात्रा
सम्यक दृष्टिकोण वह क्षण है जब आत्मा पहली बार स्वयं को पहचानती है।
यह वह जागृति है, जब मनुष्य समझता है कि-
मैं केवल यह शरीर नहीं हूँ
मैं अनादि अनंत आत्मा हूँ
मेरे कर्म ही मेरे भविष्य का निर्माण करते हैं
भगवान महावीर ने कहा:
“अप्पा सो परमप्पा” अर्थात् आत्मा ही परमात्मा है। जब यह भाव हृदय में उतर जाता है, तब जीवन की दिशा ही बदल जाती है।
सम्यक दृष्टिकोण के बिना जीवन क्यों अधूरा है?
कल्पना कीजिए कि एक व्यक्ति अंधेरे में चल रहा है । वह जितनी भी तेज़ी से चले, वह सही मार्ग पर नहीं पहुँच सकता। इसी प्रकार, मिथ्या दृष्टिकोण ( गलत सोच ) के साथ जीवन जीने वाला व्यक्ति चाहे कितनी भी सफलता प्राप्त कर ले, वह अंततः अशांति और असंतोष में ही रहेगा ।
आज का आधुनिक मनुष्य इसका उदाहरण है-
>साधन हैं, लेकिन शांति नहीं > सुविधा है, लेकिन संतोष नहीं
> संबंध हैं, लेकिन प्रेम नहीं
> क्यों? क्योंकि दृष्टिकोण सम्यक नहीं है।
सम्यक दृष्टिकोण जीवन को कैसे श्रेष्ठ बनाता है?
1. राग-द्वेष से मुक्ति
सम्यक दृष्टि व्यक्ति को यह सिखाती है कि हर परिस्थिति अस्थायी है। इससे वह राग (आसक्ति) और द्वेष (घृणा) से मुक्त होने लगता है ।
2. अहिंसा की भावना का विकास
जब हम सभी जीवों में आत्मा को देखते हैं, तब हिंसा करना असंभव हो जाता है। यही कारण है कि जैन धर्म में अहिंसा को सर्वोच्च धर्म कहा गया है।
3. निर्णयों में स्पष्टता
सम्यक दृष्टिकोण व्यक्ति को सही और गलत में अंतर करना सिखाता है । वह परिस्थितियों का दास नहीं, बल्कि विवेक का स्वामी बन जाता है ।
4. संतोष और शांति
सम्यक दृष्टि वाला व्यक्ति बाहरी वस्तुओं में सुख नहीं खोजता, बल्कि अपने भीतर शांति का अनुभव करता है।
भगवान महावीर के जीवन में अनेक कष्ट आए, उन्हें अपमानित किया गया, कष्ट दिए गए, लेकिन उन्होंने कभी अपना सम्यक दृष्टिकोण नहीं छोड़ा। एक बार किसी ने उन्हें अत्यंत पीड़ा पहुँचाई, फिर भी उनके मुख से केवल यही शब्द निकले “सब जीव सुखी हों” यह केवल शब्द नहीं थे, बल्कि सम्यक दृष्टिकोण की पराकाष्ठा थी ।
सम्यक दृष्टिकोण कैसे प्राप्त करें ?
यह केवल पढ़ने या सुनने से नहीं आता, बल्कि साधना से आता है:
> सत्संग – सही लोगों के साथ रहना स्वाध्याय – शास्त्रों का अध्ययन
> आत्मचिंतन – स्वयं का निरीक्षण
> संयम – इंद्रियों पर नियंत्रण
> गुरु मार्गदर्शन – सही दिशा में चलना
प्रश्न यह है कि
क्या हम इसके लिए प्रयास करने को तैयार हैं? आधुनिक युग में इसकी आवश्यकता – आज का युग भौतिक प्रगति का है, लेकिन मानसिक अस्थिरता का भी है। हर व्यक्ति दौड़ रहा है, लेकिन कहाँ, यह उसे भी नहीं पता।
> सम्यक दृष्टिकोण हमें यह सिखाता है कि जीवन का उद्देश्य केवल कमाना नहीं, बल्कि समझना है।
> सफलता केवल पद या धन नहीं, बल्कि आत्मिक शांति है ।
> सम्यक दृष्टिकोण केवल एक दार्शनिक विचार नहीं, यह जीवन को बदलने वाली शक्ति है ।
> यदि हम वास्तव में अपने जीवन को श्रेष्ठ बनाना चाहते हैं, तो हमें अपने दृष्टिकोण को बदलना होगा ।
आइए, आज हम स्वयं से एक संकल्प लें
> हम सत्य को स्वीकार करेंगे
> हम आत्मा को पहचानने का प्रयास करेंगे
> हम अपने जीवन को सम्यक दृष्टिकोण से जीने का प्रयास करेंगे
> क्योंकि “दृष्टि बदलती है तो सृष्टि बदल जाती है । ”
एम.पी. जैन
सेवा सेवानिवृत्ति निदेशक सांख्यिकी
64, सूर्यनगर, तारों की कूंट, टोंक रोड,
जयपुर