श्री पल्लीवाल जैन डिजिटल पत्रिका

अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

(पल्लीवाल, जैसवाल, सैलवाल सम्बंधित जैन समाज)

गुरुवर संभालते हैं

दुनियाँ में तीन प्रकार के लोग होते है –

(1) जो ठोकर खाकर संभलते है।

(2) वे जो ठोकर खाकर भी नहीं संभल पाते।

(3) ठोकर लगने के पहले ही संभल जाते है।

एक कैंसर का मरीज हास्पिटल में पड़ा है। कैंसर क्यों हुआ? तंबाकू, बीड़ी का प्रयोग किया गया। पहले सबने रोका था पहले नहीं संभले, अब कैंसर ने ठोकर लगा दी और कुछ होश आया प्रारंभिक Stage में रोग होता है तो दवाई बगैरह से ठीक हो जाता है फिर व्यक्ति कान पकड़ लेता है कि अब कभी तंबाकू नहीं खाऊँगा। वह ठोकर खाकर संभल जाता है। परन्तु जब कैंसर Last stage पर पहुँच जाता है। तब कुछ हो पाना संभव नहीं ऐसी ठोकर लग गई है कि संभलने की कोई गुंजाईश नहीं है। अब मात्र पछतावा और आँसू ही हाथ में रह जाते है। ऐसी अवस्था निर्मापित हो कि ठोकर खाकर भी न संभल पाए तो सावधान हो जाइए। इतने सावधान हो जाइए कि ठोकर लगने ही न पाए पहले ही संभल जाइए और यह तभी संभव है जब गुरु की चरण-शरण उपदेशामृत की वर्षा हो जाती है क्योंकि गुरु संस्कार देते है और समाज नगर देश में संस्कार व ज्ञान का प्रकाश फैल जाता है। इसीलिए गुरुओं को “तीर्थभूत कहा गया ये चलते फिरते तीर्थ है जो जहाँ भी जाते है संस्कारों की सुवास को सर्वत्र बिखेरते जाते है” और वे संस्कार इतने सृदृढ़ होते है कि व्यक्ति को ठोकर लगने के पूर्व ही बचा लेते है। कि हे भव्य ! तुम धर्म को धारण करो वही आत्मा का सबसे बड़ा रक्षक है। पाँचों पापों का त्याग करो जो आत्मा के सबसे बड़े शत्रु है। आगे पत्थर पड़ा है ठोकर लगेगी गिर जाओगे इसलिये प्रज्ञा चक्षुओं को खोलो ताकि तुम कर्म रुपी बड़े-बड़े पत्थरों को देखते हुए चल सको और ठोकर लगने के पूर्व ही संभल जाओ।

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